लास्ट मैन ऑन दी मून: कहानी, चांद पर इंसान के आखिरी फुटप्रिंट की
टिक..टिक..टिक..नासा के ऐतिहासिक आर्टेमिस 2 की लॉन्चिंग का काउंटडाउन शुरू हो चुका है. इंसान एक बार फिर चांद के सफर पर रवाना हो रहा है. चांद पर उतरने का इंतजार तो अभी खत्म नहीं होगा, लेकिन इसकी राह जरूर बनेगी.

चलो, फिर चांद चलो...
1 अप्रैल की शाम घड़ी जब 06:24 का वक्त देगी, तब इस मिशन के चांद रवाना होने की एक खिड़की खुलेगी. अगर सब दुरुस्त रहा, तो आर्टेमिस 2 चार अंतरिक्षयात्रियों को साथ लेकर 10 दिन की चांद यात्रा पर रवाना हो जाएगा. पहले इस अभियान को फरवरी में रवाना होना था, लेकिन स्पेस लॉन्च सिस्टम रॉकेट (एसएलएस) में दिक्कत के कारण तारीख आगे खिसक गई.
चांद पर फिर उतरने की घड़ी तो नहीं आई, लेकिन...
मौसम में खराबी या किसी और तकनीकी गड़बड़ी के चलते अगर 1 अप्रैल को लॉन्च ना हो पाया, तो 2 से 6 अप्रैल और उसके बाद 30 अप्रैल को फिर कोशिश की जाएगी. इस मिशन की मंजिल चांद की जमीन नहीं है. इसे चांद के आसपास सफर करके वापस अपने ग्रह लौट आना है.
चांद पर आखिरी फुटप्रिंट
हमें चांद पर पैर धरने वाले शुरुआती पुराधाओं का नाम रटा हुआ है: मिशन कमांडर नील आर्मस्ट्रॉन्ग और लूनर मॉड्यूल पायलट एडविन बज आल्ड्रिन. मगर, आज मुनासिब है हम उन्हें भी याद करें जिन्होंने आखिरी दफा वहां पांव रखे थे. क्योंकि, एक लंबे अंतराल बाद वह शृंखला आगे बढ़ने जा रही है. आर्टेमिस 2 से शुरू हुई यात्रा का भविष्य काल फिर उसी चांद की जमीन का गंतव्य साधेगा.
आधी सदी बीत गई...
19 दिसंबर 1972 की तारीख गुजरे करीब 54 साल बीतने को हैं. उस यादगार दिन अपोलो 17 के एस्ट्रोनॉट्स ने प्रशांत महासागर में लैंडिंग के साथ चांद से वापसी का अपना सफर पूरा किया. यह इंसानों को चांद पर लैंड कराने के अभियानों की कड़ी में छठा और अंतिम अपोलो अभियान था. अपोलो 17 पर सवार थे मिशन कमांडर यूजीन सेरनन, कमांड मॉड्यूल पायलट रॉनल्ड बी. एवन्स और लूनर मॉड्यूल पायलट हैरिसन श्मिट.
"इट्स ऑरेंज"
रॉनल्ड बी. एवन्स जहां ऊपर ऑर्बिट कर रहे थे, वहीं सेरनन और श्मिट को चांद पर उतरने का मौका मिला. श्मिट चंद्रमा जाने वाले पहले प्रशिक्षित भूविज्ञानी भी थे. वो श्मिट ही थे, जिन्होंने चांद पर नारंगी मिट्टी देखी थी. उन्होंने सेरनन से कहा था, "यहां नारंगी मिट्टी है. सब जगह है. ऑरेंज!" इस खोज की खुशी से मगन कारनेन ने जवाब दिया, "हां, ये है! मैं यहां से देख सकता हूं!"
लास्ट मैन ऑन दी मून
यूजीन सेरनन को 'लास्ट मैन ऑन दी मून' की पहचान मिली. उन्हीं के जूतों ने चंद्रमा पर इंसानों का आखिरी पदचिह्न छोड़ा. वो बूट्स अमेरिका के 'नेशनल एयर एंड स्पेस म्यूजियम' में रखे हैं.
सेरनन को तकलीफ भी थी
कितना रोमांचकारी है ये जानना (नासा के शब्दों में) कि वो जूते, इंसानों की पहनी आखिरी चीज थी जिसने दूसरी दुनिया को छुआ. साल 1999 में सेरनन ने जब अपना संस्मरण छापा, तो उसके लिए भी यही शीर्षक चुना. वैसे उन्हें इस पहचान का अफसोस भी था. बाद के सालों तक वह कहते रहे कि 'लास्ट मैन ऑन दी मून' होना उन्हें निराश करता है.
"इंसान का एक छोटा कदम, इंसानियत के लिए महान छलांग"
नील आर्मस्ट्रॉन्ग और बज आल्ड्रिन के चांद पर उतरने की अमर गाथा वहां यूं दर्ज की गई, "यहां, पृथ्वी ग्रह से इंसानों ने सबसे पहले चांद पर पांव रखा. जुलाई 1969 ए.डी. हम पूरी मानवता की ओर से शांति का संदेश लेकर आए."
"ईश्वर ने चाहा तो हम लौटेंगे"
अपोलो 11 की उस अविस्मरणीय उपलब्धि के दूसरे (और अब तक के आखिरी) छोर पर, 14 दिसंबर 1972 को चांद से वापसी का कदम उठाते हुए सेरनन ने कहा: और जब हम टॉरस-लिट्रो (चंद्रमा की एक घाटी) से चांद छोड़कर जा रहे हैं, हम वैसे ही जा रहे हैं जैसे आए थे, और ईश्वर ने चाहा, तो हम लौटेंगे, पूरी मानव जाति के लिए शांति और उम्मीद साथ लेकर.
इंसानों को फिर चांद पर उतरने में अभी कुछ साल हैं
अपोलो 11 से अपोलो 17 का फासला पार करने के बाद इंसान की सशरीर चंद्रमा यात्रा पर एक लंबा विराम लग गया. मानव अभियान बंद हो गए. आर्टेमिस 2 के साथ यह इंतजार खत्म तो नहीं होगा, लेकिन उसकी राह जरूर तैयार होगी. नासा, इन अभियानों की कड़ी में आर्टेमिस 4 मिशन के साथ साल 2028 में मून लैंडिंग की तैयारी कर रहा है.
आर्टेमिस 2: अंतरिक्ष में पहले कभी इतनी दूर नहीं गया इंसान
आर्टेमिस 2 का क्रू चंद्रमा के कितने पास से उड़ेगा, यह लॉन्च पर निर्भर करेगा. मगर ये दूरी चंद्रमा की सतह से 4,000 से 6,000 मील ऊपर तक हो सकती है. अंतरिक्षयात्री 'फार साइड ऑफ दी मून' को भी देखेंगे, उसकी तस्वीरें लेंगे. यानी, वो चांद के उस हिस्से को देख सकेंगे जिसे इंसानी आंखों ने पहले कभी नहीं देखा.
एक दिन चांद पर भी इंसानों का एक स्थायी पता होगा
आर्टेमिस 2 मिशन में शामिल हैं: मिशन कमांडर रीड वाइसमैन, विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टिना कॉख और जेरमा हैनसन. कॉख, चंद्रमा के पास जाने वालीं पहली महिला और ग्लोवर पहले ब्लैक एस्ट्रोनॉट होंगे. आर्टेमिस अभियानों का सबसे बड़ा लक्ष्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर एक स्थायी बेस बनाना है. और मानव की हद बस चांद तक क्यों हो, नासा तो 2030 के दशक तक इंसानों को मंगल ग्रह तक ले जाने का इरादा कर रहा है.