जेन गोडॉल: चिंपैंजियों के बीच रहकर सबकुछ जान लिया
जेन गोडॉल ने अपना पूरा जीवन जानवरों को समझने और संरक्षित करने में बिताया. 91 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया. चिंपैजियों के बीच रहकर उन्होंने जो पता लगाया, उसने इंसान और जानवरों के व्यवहार के बारे में बहुत कुछ बताया.

जुबली पहला साथी
जेन गोडॉल का जन्म 3 अप्रैल 1934 को लंदन में हुआ था. उन्हें बचपन से ही जानवरों और प्रकृति से गहरा लगाव था. जब वह एक साल की थीं, तब उनके पिता ने उन्हें एक खिलौने वाला चिंपैंजी दिया था, जिसका नाम जुबली था.
चिंपैंजियों को समझने के लिए गईं अफ्रीका
चिंपैजियों को करीब से समझने के लिए जेन, साल 1960 में तंजानिया के गोम्बे चिंपैंजी रिजर्व पहुंचीं. वहां उन्होंने वर्षों तक चिंपैजियों के व्यवहार का अध्ययन किया और उनके साथ लंबा समय बिताया.
औजार का इस्तेमाल करते हैं चिंपैंजी
जेन ने बताया कि चिंपैंजी किस तरह औजार बनाते और इस्तेमाल करते हैं. अपनी स्टडी के दौरान उन्होंने देखा कि चिंपैंजी, कीड़े निकालने के लिए पतली टहनियों का इस्तेमाल करते हैं.
नंबर नहीं, हर चिंपैंजी को एक नाम दिया
किसी भी तरह के शोध के दौरान जानवरों को अलग-अलग नंबरों के जरिए पहचाना जाता है. लेकिन जेन ने हर चिंपैंजी को एक नाम दिया और स्टडी के दौरान उन्हें नाम से पहचाना. जेन मानती थीं कि इससे उनके व्यवहार को समझना आसान हो जाता है. अध्ययन के इस तरीके पर कई शोधकर्ताओं ने आपत्ति जताई थी.
मांसाहारी होते हैं चिंपैंजी
उछल-कूद करने वाले चिंपैंजियों को भले ही शाकाहारी समझा जाता है, लेकिन वो मांस भी खाते हैं. जेन ने पता लगाया कि चिंपैंजी शिकार करके कई बार मांस खाते हैं. उनके शोध से ही यह पुख्ता तौर पर पता लगा कि चिंपैंजियों में भी इंसानों की तरह भावनाएं होती हैं.
बिना ग्रैजुएशन मिली पीएचडी
जेन गोडॉल ने 1965 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से एथोलॉजी (जानवरों के व्यवहार का अध्ययन) में पीएचडी हासिल की. उनके काम की वजह से बिना ग्रैजुएशन के ही यूनिवर्सिटी में एडमिशन दे दिया गया.
जब दुनिया ने पहचाना
साल 1963 में नेशनल जिओग्रैफिक में छपे उनके लेख से दुनिया को उनके काम के बारे में पता चला. उनसे प्रभावित होकर नेशनल जिओग्रैफिक ने उनके काम को फिल्माने का फैसला लिया और एक कैमरा टीम भेजी.
काम के दौरान हुआ प्यार
जेन के काम को फिल्माने के लिए फिल्ममेकर बैरन ह्यूगो वाल लाविक को भेजा गया था. काम के दौरान ही दोनों को प्यार हो गया और दो साल बाद उन्होंने शादी कर ली.
चिंपैंजियों के लिए छोड़ा सबकुछ
साल 1986 में एक सम्मेलन के बाद जेन ने चिंपैंजियों के विलुप्त होने के खतरे को महसूस किया. इसके बाद उन्होंने सारा काम छोड़कर वैश्विक संरक्षण कार्यकर्ता बनने का फैसला किया.
मिले कई सम्मान
साल 2002 में उन्हें संयुक्त राष्ट्र का शांति दून बनाया गया था. 2004 में ब्रिटेन में महिलाओं को दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान, ब्रिटिश साम्राज्य की 'डेम' नियुक्त किया गया. साल 2025 में उन्हें अमेरिका के 'प्रेजिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम' से सम्मानित किया गया था.
जेन गोडॉल ने अपना पूरा जीवन जानवरों को समझने और संरक्षित करने में बिताया. 91 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया. चिंपैजियों के बीच रहकर उन्होंने जो पता लगाया, उसने इंसान और जानवरों के व्यवहार के बारे में बहुत कुछ बताया.