कश्मीर में अब भी जारी है पंडितों की अनदेखी | भारत | DW | 29.09.2020

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भारत

कश्मीर में अब भी जारी है पंडितों की अनदेखी

घाटी में रह रहे कश्मीरी पंडितों का कहना है कि वे दशकों से ठगे जा रहे हैं. राज्य का विशेष दर्जा खत्म होने के बाद नौकरशाह मनमानी कर रहे हैं और हालात अधिक बिगड़े हैं.

तीस साल पहले पलायन के वक्त घाटी में ही रह गए कश्मीरी पंडितों के करीब 800 परिवारों का कहना है कि धारा 370 के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा खत्म होने के बाद भी उनके हालात में कोई बदलाव नहीं आया और स्थानीय प्रशासन द्वारा उनकी प्रताड़ना जारी है. ये पंडित परिवार रोजगार और मासिक वित्तीय सहायता समेत अपनी मांगों को लेकर श्रीनगर में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इनके संगठन कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के अध्यक्ष संजय टिक्कू पिछली 20 सितंबर से आमरण भूख हड़ताल पर बैठे हैं.

श्रीनगर के हब्बा कदल स्थित गणेश मंदिर में उपवास पर बैठे संजय टिक्कू कहते हैं कि बयानबाजी करना और आंसू बहाना तो सबको आता है लेकिन घाटी में रह गए कश्मीरी पंडितों की असल में अब तक किसी सरकार ने नहीं सुनी. इन पंडित परिवारों ने राज्य की आपदा प्रबंधन और राहत-पुनर्वास कमेटी पर आरोप लगाया है कि वह इनकी समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दे रही है. कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति का कहना है कि ऐसा लगता है जैसे राहत-पुनर्वास कमेटी के लिए संसदीय समिति की सिफारिशें, हाइकोर्ट के आदेश और केंद्र सरकार के निर्देश कोई मायने नहीं रखते.

भूख हड़ताल पर बैठे संजय टिक्कू ने डीडब्लू से खास बातचीत में कहा कि पिछले साल 5 अगस्त को सरकार ने धारा 370 के तहत मिले विशेष दर्जे को खत्म किया लेकिन उससे कश्मीरी पंडितों की दशा में अब तक कोई बदलाव नहीं आया. टिक्कू ने डीडब्लू को बताया, "हमें उस फैसले से कोई  राहत नहीं मिली. अगर राहत मिली होती तो मैं अनशन पर क्यों बैठता? केवल टीवी न्यूज चैनलों ने (धारा 370 को लेकर) हौव्वा खड़ा किया हुआ है लेकिन हमारे हाल वैसे ही हैं जैसे पहले थे, बल्कि पहले से भी अधिक खराब हुए  हैं. पहले तो अगर किसी को कोई तकलीफ होती थी, तो वह राजनीतिक पार्टियों के नुमाइंदों के पास जा सकता था लेकिन आज यहां पूरी तरह सियासी खालीपन है और जनता के प्रतिनिधि भी डरे हुए हैं.” 

कश्मीर में नई डोमिसाइल नीति से नाराजगी

केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद हालात 

कश्मीरी पंडितों के मांग पत्र में कहा गया है कि कोर्ट के आदेश और केंद्रीय गृह मंत्रालय की सिफारिश के अनुसार बेरोजगार कश्मीरी पंडितों को नौकरियां दी जाएं और यहां रह रहे 808 पंडित परिवारों को मासिक वित्तीय सहायता दी जाए. इनमें से कई पंडित परिवारों को आवास चाहिए और इनके लिए गैर-प्रवासी पहचान प्रमाण पत्र देने की मांग भी संघर्ष समिति कर रही है.

टिक्कू कहते हैं कि कश्मीर पंडितों के लिए हालात कल भी वैसे ही थे और आज भी उसी तरह हैं लेकिन पिछले एक साल से केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद नौकरशाहों का बोलबाला हो गया है और वे अपने को "खुदा” समझने लगे हैं. शनिवार को नेशनल कांफ्रेंस के नेताओं ने धरना स्थल पर जाकर कश्मीरी पंडितों के साथ एक-जुटता दिखाई. मुख्य सचिव ने भी अधिकारियों को पंडितों से बातचीत के लिए भेजा लेकिन अब तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया है.

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति का कहना है कि ऐसा लगता है कि स्थानीय प्रशासन घाटी में रह रहे पंडितों को अपना घर न छोड़ने की सजा दे रहा है. कश्मीर में रह रहे 808 परिवार घाटी के दस जिलों में करीब 200 अलग अलग स्थानों पर बिखरे हुए हैं. इनमें से करीब 350 परिवार ऐसे हैं जिनकी रोजी रोटी प्राइवेट सेक्टर पर टिकी थी लेकिन कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश घोषित करने के बाद घाटी में पैदा हुए हालात और फिर कोरोना महामारी की वजह से इन लोगों का रोजगार भी खत्म हो गया.

सवा साल से घाटी में लॉकडाउन

कश्मीर मामलों के जानकार और कश्मीरी पंडितों पर पुस्तक लिख चुके अशोक कुमार पाण्डेय कहते हैं कि यह बहुत निराशाजनक है कि घाटी में रह रहा यह अतिसूक्ष्म पंडित समुदाय लगातार नजरअंदाज होता रहा है. उनके मुताबिक चाहे दक्षिणपंथी राजनेता हों या आजादी समर्थक राजनीति करने वाला वर्ग, हर कोई पंडितों की घाटी में वापसी के लिए जुबानी जमा खर्च तो करता है लेकिन उन पंडितों की समस्या पर आंख मूंद लेता है जो बरसों से कठिन हालात में वहां रह रहे हैं.

अशोक कुमार पाण्डेय का कहना है, "पहले राज्य का विशेष दर्जा खत्म करने से पैदा हालात और फिर कोविड के चलते पिछले करीब सवा साल से घाटी में लॉकडाउन है जिससे अर्थव्यवस्था तबाह हो गई है और इसकी वजह से परेशान घाटी का पंडित समाज जिन मुश्किल हालात से गुजर रहा है, उसमें अगर उनके लिए पुनर्वास और राहत की व्यवस्था न की गई तो बाहर से वापसी की बात छोड़िए, जो अभी हैं वे भी पलायन पर मजबूर हो जाएंगे.”

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