पाकिस्तान में कई हिंदू क्यों मनाते हैं मुहर्रम?
पाकिस्तान में रहने वाले कई हिंदू मुहर्रम के मौके पर शिया मुसलमानों के साथ मिलकर इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं. इसमें 52 वर्षीय राजू राठौड़ भी शामिल होते हैं, जो अपनी मां को याद करते हुए हर साल ताजिया बनाते हैं.

ताजिया बनाने की पूरी तैयारी
मुहर्रम के महीने में शिया मुसलमान इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं और उनकी याद में ताजिया निकालते हैं. कराची में रहने वाले हिंदू कारीगर राजू राठौड़ भी अपने घर पर ताजिया बना रहे हैं. ताजिया इमाम हुसैन के मकबरे का प्रतीक होता है, जिसे मुहर्रम के जुलूसों में झांकी की तरह निकाला जाता है.
एक मन्नत से कैसे शुरू हुआ यह सिलसिला?
राजू राठौड़ बताते हैं कि उनके माता-पिता 1947 में भारत के गुजरात से पाकिस्तान आए थे. उस समय जब उनके घर में बच्चा नहीं हो रहा था, तब उनकी मां ने एक दरगाह पर मन्नत मांगी कि अगर उन्हें बच्चा हुआ तो वह बच्चा इमाम हुसैन की याद में ताजिया बनाएगा. राजू पिछले 45 सालों से ताजिया बना रहे हैं. राजू कहते हैं, "मुहर्रम मेरे लिए बहुत खास है. मैं जब तक जिंदा हूं, तब तक इसे मनाऊंगा."
दोनों धर्मों का सम्मान
दक्षिण एशिया में लंबे समय से ऐसे समुदाय मौजूद हैं, जो हिंदू और शिया, परंपराओं का सम्मान करते हैं. पाकिस्तान में भी कई हिंदू इमाम हुसैन को श्रद्धा से याद करते हैं और मुहर्रम के कार्यक्रमों में शामिल होते हैं.
पाकिस्तान में कितने हिंदू हैं?
पाकिस्तान की 2023 की जनगणना के मुताबिक, देश में करीब 39 लाख हिंदू रहते हैं. वे पाकिस्तान का सबसे बड़ा धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय भी हैं. राजू राठौड़ का कहना है, "मैं हिंदू हूं, लेकिन यह सिर्फ धर्म की बात नहीं है. हमारे कई हिंदू भाई भी इमाम हुसैन का बहुत सम्मान करते हैं."
छाती पीटकर दुख का इजहार
मुहर्रम में जुलूस के दौरान छाती पीटकर इमाम हुसैन की शहादत पर दुख जाहिर किया जाता है. इसमें कई हिन्दू समुदाय के लोग भी शामिल होते हैं. एक अन्य पाकिस्तानी हिंदू भरत कुमार कहते हैं, "हमारा धर्म हमें कभी नहीं सिखाता कि दूसरे धर्मों की परंपराओं का सम्मान न करें. जैसे हम अपने त्योहार मनाते हैं, वैसे ही मुहर्रम में भी पूरी श्रद्धा के साथ भाग लेते हैं."
कागज, गत्ते और कांच से बनता है ताजिया
राजू राठौड़ और भरत कुमार अपने खर्चे पर ताजिया तैयार करते हैं. ताजिया बनाने में कागज, गत्ता, कांच और अन्य सजावटी सामान का इस्तेमाल होता है. परिवार के लोग पूरे साल समान इकट्ठा करते हैं ताकि मुहर्रम से पहले ताजिया तैयार किया जा सके. राजू कहते हैं, "मैं पिछले 45 साल से ताजिया बना रहा हूं. जब तक मुझमें ताकत रहेगी, मैं यह काम करता रहूंगा.”