कीचड़ में सने हुए लोग केले के पत्ते लपेटकर चर्च क्यों गए
एशिया के सबसे बड़े कैथोलिक देश फिलीपींस के एक छोटे से गांव में हर साल मनाया जाने वाला ‘ताओंग पुतिक’ त्योहार कुछ ऐसा दिखता है.

भोर में ही शुरू हो जाता है त्योहार
फिलीपींस के बिबिक्लाट गांव में लोग सुबह करीब 4 बजे खेतों में जाकर नरम मिट्टी इकट्ठा करते हैं और उसे अपने शरीर पर लगाते हैं. फिर सूखे केले के पत्तों से खुद को ढक लेते हैं. यहां मिका कैस्टिलो (बीच में) और उनका परिवार धान के खेत में अपने शरीर पर मिट्टी लगा रहे हैं.
कीचड़ और केले का पत्ता लपेटकर चर्च चलो
तैयार होने के बाद गांव वाले नंगे पैर बस मोबाइल फोन और जलती हुई मोमबत्तियां लेकर सेंट जॉन द बैपटिस्ट चर्च की ओर जाते हैं और प्रार्थना शुरू होने का इंतजार करते हुए मोमबत्तियां जलाकर भजन गाते हैं.
भेदभाव से बचने से हुई शुरुवात
स्थानीय चर्च की माने तो यह परंपरा 1800 के दशक में शुरू हुई थी. उस समय किसान गरीबी के चलते होने वाले भेदभाव से बचने के लिए केले के पत्तों से अपना चेहरा और पहचान छिपा लेते थे.
संत जॉन का चमत्कार
लेकिन अब इस त्योहार को स्थानीय संत के चमत्कार से जोड़ा जाता है. कहा जाता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी कब्जे के समय कुछ पुरुषों को फांसी होनी थी, लेकिन तभी अचानक आई तेज बारिश हुई और उन पुरुषों की जान बच गई. स्थानीय लोगों का मानना है कि यह संत जॉन का चमत्कार था.
हजारों लोगों आते हैं यहां
इस त्योहार में शामिल होने वालों का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं रखा जाता, लेकिन स्थानीय कैथोलिक पादरी, रेव एल्मर विलामायोर का अनुमान है कि इस त्योहार में करीब 3,000 लोग हिस्सा लेते हैं.
कीचड़ का त्योहार
‘ताओंग पुतिक’ त्योहार नाम के इस त्योहार मड पीपल यानी कीचड़ सने लोगों के नाम से भी जाना जाता है. श्रद्धालु स्थानीय संत के चमत्कारों के प्रति आभार जताने और अपनी मनोकामनाएं पूरी होने पर इसमें भाग लेते हैं.