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Indien Statue von Vir Kunwar Singh im Museum von Jagdishpur
बाबू वीर कुंवर सिंह 1857 के स्वाधीनता संग्राम के मुख्य सेनानियों में हैं. 23 अप्रैल को उनकी जयंती के मौके पर जगदीशपुर, भोजपुर में बड़ा महोत्सव हो रहा है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अलावा गृहमंत्री अमित शाह और नित्यानंद राय भी इस कार्यक्रम में शामिल होंगे. तस्वीर: बाबू वीर कुंवर सिंह स्मृति संग्रहालय तस्वीर: Manish Kumar/DW

वीर कुंवर सिंह को याद करने के बहाने वोट बैंक पर नजर

मनीष कुमार
२२ अप्रैल २०२२

बिहार में राजनीतिक दलों द्वारा महापुरुषों को याद करने के बहाने जाति विशेष के वोट बैंक साधने की परंपरा चल पड़ी है. ऐसा पहले भी होता रहा है, मगर इस बीच कई ऐतिहासिक शख्सियतें अचानक ही पार्टियों के लिए अहम हो गई हैं.

https://www.dw.com/hi/bjp-to-celebrate-birth-anniversary-of-indias-freedom-fighter-babu-veer-kunwar-singh/a-61563455

कभी राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के बहाने भूमिहारों को, तो कभी सम्राट अशोक के बहाने लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) को, तो अब 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा बाबू वीर कुंवर सिंह के बहाने क्षत्रियों (राजपूतों) को अपना बताने की पार्टियों में होड़ मची है. इसके पीछे तर्क होता है, इन शख्सियतों को वह सम्मान दिलाना जो उन्हें नहीं मिला और जिसके वे हकदार थे. पार्टियां इसके बहाने सच्चा हितैषी होने का संदेश तो देती ही हैं, साथ ही शक्ति परीक्षण भी करती हैं.

23 अप्रैल को भारतीय जनता पार्टी आजादी के अमृत महोत्सव पर बड़े जोर-शोर से बिहार में बाबू वीर कुंवर सिंह की जन्मस्थली भोजपुर (आरा) जिले के जगदीशपुर में विजयोत्सव मना रही है. इस मौके पर आयोजित कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी शिरकत कर रहे हैं. पार्टी का कहना है कि हाथों में तिरंगा लेकर सवा लाख लोग सड़क पर उतरकर बिहार की धरती से पूरे देश को राष्ट्रीय एकता व अखंडता का संदेश देंगे. पार्टी ने एक साथ सर्वाधिक झंडे फहराने का विश्व कीर्तिमान बनाने का दावा भी किया है. इसके लिए गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के कर्मचारियों की टीम भी जगदीशपुर में मौजूद रहेगी.

बिहार भाजपा के अध्यक्ष डॉ. संजय जायसवाल कहते हैं, ‘‘अभी तक गिनीज बुक में एक साथ सबसे ज्यादा 57,632 झंडे फहराने का विश्व रिकॉर्ड पाकिस्तान के खाते में दर्ज है. अब बिहार भाजपा सवा लाख झंडे फहराकर विश्व रिकॉर्ड बनाएगी. देशभर के युवा जानें कि बाबू वीर कुंवर सिंह का देश की आजादी में क्या योगदान था.इसलिए इस कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है.''

इस अभियान पर पत्रकार आलोक वैभव टिप्पणी करते हैं, ‘‘मान लिया भारतीय जनता पार्टी यह कीर्तिमान अपने खाते में दर्ज कर लेगी, लेकिन इससे आमजन को क्या मिलेगा. इतनी शिद्दत से किए जा रहे इस आयोजन से आम जनता की किस समस्या का समाधान निकलेगा. अमित शाह गरीबों के लिए कौन सी नई घोषणा करेंगे? हां, शायद यह कहने को मिल जाए कि हमने एक बार फिर पाकिस्तान को हरा दिया.''

पहले भी होती आई है ऐसी राजनीति

इससे पहले कुशवाहा, यानी कुर्मी-कोइरी जाति के वोट बैंक को लेकर भी मौर्य वंश के शासक सम्राट अशोक के बहाने खूब राजनीति हुई. देखते-ही-देखते जातीय संगठनों द्वारा मनाया जाने वाला आयोजन बड़ी पार्टियों द्वारा हाईजैक कर लिया गया. इन दोनों जातियों के लिए प्रदेश में लव-कुश शब्द का प्रयोग भी किया जाता है. सम्राट अशोक को इसी जाति का बताया जाता है, हालांकि इस दावे के पक्ष में कोई ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद नहीं है. भाजपा ने बीते आठ अप्रैल को उनकी जयंती मनाई, तो उसकी सहयोगी पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने उसके अगले दिन कार्यक्रम का आयोजन किया. जदयू के नेता कहते हैं कि नीतीश कुमार सम्राट अशोक के आदर्शों पर चलकर ही राज्य का नेतृत्व कर रहे हैं. भाजपा के नेता इससे दो कदम आगे बढ़कर दावा करते हैं कि शौर्य, करुणा व विकास के जो गुण सम्राट अशोक में मौजदू थे, वही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में भी हैं. इस गोलबंदी की वजह यादवों के वोट बैंक के मुकाबले अन्य पिछड़ा वर्ग में लव-कुश को साथ लेकर राजनीतिक हैसियत बढ़ाने की भी है.

काम भी चाहती है जनता

राजनीतिक प्रेक्षक एसके विश्वास कहते हैं, ‘‘यह कहना मुश्किल है कि ऐसे आयोजनों से वोट बैंक एकमुश्त उस पार्टी विशेष की ओर चला जाता है. अगर ऐसा ही होता, तो बीते दिनों काफी धूमधाम से रामधारी सिंह दिनकर की जयंती मनाने का सीधा लाभ सत्तारूढ़ गठबंधन को मिलता. लेकिन, मुजफ्फरपुर जिले के बोचहां उपचुनाव परिणाम से साफ है कि भूमिहारों ने भाजपा प्रत्याशी बेबी कुमारी को वोट नहीं दिया और अंतत: वह पराजित हो गईं.''

शायद इसलिए पूर्व मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने ट्वीट कर सवर्ण समाज के एक वर्ग का वोट खिसक जाने को अप्रत्याशित बताते हुए इस पर एनडीए द्वारा मंथन किए जाने की बात कही है. वाकई, मतदाता अब इन बातों से प्रभावित नहीं होते हैं. उन्हें इलाके में जन प्रतिनिधियों से काम करने की अपेक्षा रहती है और उसी के आधार पर वे उनका मूल्यांकन भी करते हैं. अन्यथा पिछले दिनों हुए पंचायत चुनाव में करीब 80 प्रतिशत से अधिक मुखिया बदल नहीं दिए गए होते. फिर भी पार्टियां इस प्रत्याशा में ऐसे काम करती हैं कि सच्चे हितैषी होने का दावा करके वे उस वर्ग विशेष को अपने पाले में कर लेंगी. हालांकि चुनाव के वक्त जातीय ध्रुवीकरण होने से उन्हें इसका फायदा मिल भी जाता है. पार्टियां चुनाव में उन्हें ही प्रत्याशी बनाना पसंद करती हैं, जिनकी जाति विशेष में पहचान हो और वह बहुलता में हो.

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मुद्दों की राजनीति से दूर हैं पार्टियां

एक शोध के मुताबिक, साल 2050 तक सबसे अधिक युवा आबादी बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान व झारखंड जैसे राज्यों की होगी. वहीं 2011 की जनगणना के अनुसार बिहार की औसत उम्र 20 साल है. यह राष्ट्रीय औसत 24 साल से काफी कम है. साफ है कि बिहार की आबादी में ज्यादा नौजवान हैं, जो विकास और खुशहाली की ओर जाना पसंद करेंगे.

यह तभी संभव हो सकेगा जब उन्हें रोजगार मिलेगा, गरीबी कम होगी, महंगाई नियंत्रित होगी तथा तकनीकी क्षमता बढ़ेगी.राजनीति शास्त्र के अवकाश प्राप्त व्याख्याता एस एन शर्मा कहते हैं, ‘‘राजनीतिक दल जिस तरह से वोट बैंक को लेकर आक्रामकता दिखाते हैं वैसा आर्थिक, सामाजिक या पर्यावरणीय दृष्टिकोण से आम लोगों की स्थिति बेहतर बनाने को लेकर कभी दिखाया हो! मुझे तो याद नहीं है कि रोजगार सृजन के उपायों, आधारभूत संरचना के विकास, बढ़ती महंगाई, शिक्षा की स्थिति या पलायन के दर्द को लेकर किसी भी पार्टी ने कभी राज्यव्यापी तो छोड़िए, जिला स्तर पर भी जोरदार आंदोलन किया हो. हां, इनमें से कुछ कभी-कभी चुनावी मुद्दे जरूर बन जाते हैं.''

इन्हीं मानकों के आधार पर बिहार नीति आयोग की नजर में भी काफी नीचे है. इसको लेकर भी राजनीति होती है, किंतु कोई ठोस कार्ययोजना किसी भी पार्टी के पास नहीं है, जिसे लागू करने के लिए वे आंदोलन कर सकें.हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं है कि नीतीश सरकार ने राज्य में कई क्षेत्रों की तस्वीर बदली है, किंतु अभी भी ये प्रयास नाकाफी हैं. सरकारी दावों से इतर, बेहतर शिक्षा के लिए विद्यार्थियों का और रोजी-रोटी की तलाश में कामगारों का दूसरे राज्यों में पलायन जारी है. उद्योग-धंधे में भी निवेश एक हद तक ही हो सका है. संभावनाओं का 50 फीसदी भी अभी हासिल नहीं किया जा सका है.

वाकई, बिहार के लिए यह यक्ष प्रश्न है कि पूरे विश्व को राजनीति का पाठ पढ़ाने वाला बिहार अर्थशास्त्र में ही फिसड्डी क्यों है. पहचान की राजनीति जब तक विकास की राजनीति पर हावी रहेगी, तब तक मुद्दों की बात बेमानी ही रहेगी.

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