जातीय जनगणना पर क्यों अड़ा है बिहार | भारत | DW | 12.08.2021

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भारत

जातीय जनगणना पर क्यों अड़ा है बिहार

भारत के बीजेपी शासित राज्यों में आबादी पर नियंत्रण के लिए कानून बनाने की पहल हो रही है तो बिहार में बीजेपी के साथ शासन कर रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जाति आधारित जनगणना की मांग कर रहे हैं. आखिर ये विवाद है क्यों?

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रोजगार के लिए बिहार के लोग दूसरे राज्यों में जाते हैं

बिहार में बीजेपी के साथ सरकार चला रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जनसंख्या नियंत्रण कानून को गैर जरूरी बताकर जाति आधारित जनगणना की मांग कर रहे हैं. केंद्र सरकार के साफ इनकार के बावजूद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा है और उनसे मिलने का इंतजार कर रहे हैं. इसे लेकर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद यादव के फिर मुखर होने से सियासत तेज हो गई है. बिहार में एनडीए सरकार की प्रमुख सहयोगी भाजपा पसोपेश में है और वह पार्टी की रणनीति के तहत जनसंख्या नियंत्रण कानून की हिमायत कर रही है. दरअसल, सारा खेल अन्य पिछड़ी जातियों के वोट बैंक का है. इनकी आबादी 52 फीसद बताई जाती है. राजनीतिक दलों के बीच ओबीसी के सच्चे हितैषी का क्रेडिट लेने की होड़ लग गई है.

अंग्रेजों के शासन में आखिरी जातीय जनगणना

भारत में आखिरी बार 1931 में जातिगत आधार पर जनगणना की गई थी. द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ जाने के कारण 1941 में आंकड़ों को संकलित नहीं किया जा सका था. आजादी के बाद 1951 में इस आशय का प्रस्ताव तत्कालीन केंद्र सरकार के पास आया था, लेकिन उस समय गृह मंत्री रहे सरदार वल्लभ भाई पटेल ने यह कहते हुए प्रस्ताव खारिज कर दिया था कि इससे समाज का ताना-बाना बिगड़ सकता है. 1951 के बाद से लेकर 2011 तक की जनगणना में केवल अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति से जुड़े आंकड़े प्रकाशित किए जाते रहे. 2011 में इसी आधार पर जनगणना हुई, किंतु अपरिहार्य कारणों का हवाला देकर इसकी रिपोर्ट जारी नहीं की गई. कहा जाता है कि करीब 34 करोड़ लोगों के बारे में जानकारी गलत थी.

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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

कमोबेश, हर जनगणना के पहले जातीय जनगणना की मांग की जाती रही है. किंतु, बिहार विधानसभा में पहली बार 18 फरवरी, 2019 में तथा फिर 27 फरवरी, 2020 में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर मांग की गई कि 2021 में होने वाली जनगणना जाति आधारित हो. एक बार फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने केंद्र से इस पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है. 1931 की जनगणना के अनुसार देश में अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) की आबादी 52 प्रतिशत है. मंडल कमीशन ने भी इसी आंकड़े को आधार बनाया था, जिसकी रिपोर्ट 1991 में लागू की गई.

ओबीसी की आबादी का सही आंकड़ा मिलने से क्षेत्रीय दलों को राजनीति का नया आधार मिल सकता है. क्षेत्रीय दल हमेशा से जातीय जनगणना की मांग करते रहे हैं. किंतु, इस मुद्दे पर केंद्र में रही कोई भी सरकार अपने हाथ नहीं जलाना चाहती है. इसलिए 2010 में जब केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी तब भी लालू, शरद यादव व मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं ने इस आधार पर जनगणना की मांग की थी और उस समय पी. चिदंबरम सरीखे नेताओं ने इसका जोरदार विरोध किया था. सरकार को आशंका है कि जाति आधारित जनगणना के बाद तमाम ऐसे मुद्दे उठेंगे, जिससे देश में आपसी भाईचारा व सौहार्द बिगड़ेगा तथा शांति व्यवस्था भंग होगी. जिस जाति की संख्या कम होगी, वे अधिक से अधिक बच्चे की वकालत करेंगे. इससे समाज में विषम स्थिति पैदा होगी.

क्या कहना है पार्टियों का

जनसंख्या नियंत्रण कानून का विरोध कर रहे जेडीयू का कहना है कि केवल कानून बनाने से जनसंख्या नियंत्रित नहीं हो जाएगी. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहते हैं, "जब महिलाएं पूरी तरह पढ़ी-लिखी होंगी तो प्रजनन दर कम हो जाएगी. हमें लगता है कि 2040 तक जनसंख्या में वृद्धि नहीं होगी और फिर यह घटना शुरू हो जाएगी. चीन को देख लीजिए, वहां अब क्या हो रहा है. महिलाओं के शिक्षित होने से समाज के हर वर्ग पर असर होगा." हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के प्रमुख व पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने भी इस मुद्दे पर नीतीश का साथ देते हुए ट्वीट किया.

नीतीश कुमार जातीय जनगणना को जरूरी बताते हैं. उनका मानना है कि इस तरह की जनगणना से सभी जातियों को मदद मिलेगी और उनकी सही संख्या का पता चलने से उस आधार पर नीतियां बनाई जा सकेगी. पार्टी का मानना है कि इससे पता चल सकेगा कि किस इलाके में किस जाति की कितनी आबादी है. इसी आधार पर उनके कल्याण के लिए काम हो सकेगा, साथ ही सरकारी नौकरियों तथा शिक्षण संस्थानों में उन्हें उचित प्रतिनिधित्व दिए जाने का रास्ता साफ हो सकेगा. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने तो लोकसभा में साफ कह दिया कि जब तक जातीय जनगणना नहीं होगी, तब तक ओबीसी को पूर्ण न्याय नहीं मिल सकेगा.

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विकास का लाभ सबों को नहीं मिल रहा है

राजद प्रमुख लालू प्रसाद ने भी इसे लेकर बड़ा दांव खेल दिया है. उन्होंने कहा है कि अगर 2021 में अगर जातीय जनगणना नहीं होगी तो बिहार ही नहीं, देश के सभी पिछड़ों-अति पिछड़ों के अलावा दलित व अल्पसंख्यक समाज के लोग जनगणना का बहिष्कार कर सकते हैं. बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव कहते हैं, "90 साल से विभिन्न जातियों की आबादी के बारे में सटीक जानकारी नहीं है. कमजोर वर्गों की उन्नति संबंधी सारी नीतियां पुराने आंकड़ों के आधार पर बनाए जा रहे हैं, जो कतई उचित नहीं कहा जा सकता."

भाजपा का रूख जातीय जनगणना पर साफ है. राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों को ओबीसी की सूची बनाने का अधिकार देने वाले विधेयक को राज्यसभा में पास कराने के पहले यह साफ कर दिया कि फिलहाल जाति जनगणना कराने का कोई इरादा नहीं है और न ही 2011 के जाति जनगणना के आंकड़ों को सार्वजनिक किया जाएगा. आरएसएस भी जातिगत जनगणना का विरोध करता रहा है.

सभी दलों की अपनी-अपनी रणनीति

बिहार, यूपी व हरियाणा जैसे राज्यों में क्षेत्रीय दल काफी मजबूत स्थिति में हैं और उनकी राजनीति ही जाति पर आधारित है. वैसे भी देश की राजनीति में पिछड़े वर्ग का दखल बढ़ा है. एक अनुमान के मुताबिक बिहार में ओबीसी की आबादी 26 प्रतिशत है. नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को अति पिछड़ी वर्ग की जातियों के अलावा ओबीसी में यादव को छोड़ अन्य जातियों का साथ मिलता रहा है, हालांकि 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में यह तीन नंबर पर आ गई. इधर, राजद भी 2020 में मिले वोट को एकजुट रखना चाहता है, इसलिए अपने जनाधार में जदयू की सेंध से बचने के लिए ओबीसी का सच्चा हितैषी बनने की जुगत में है.

Patna, Bihar, Indien

राजद नेता तेजश्वी यादव

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) जो कभी सवर्णों तथा बनियों की पार्टी समझी जाती थी, अन्य जातियों में अपना जनाधार बढ़ा चुकी है. इसलिए वह अब अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के साथ ओबीसी को लामबंद करना चाहती है. साथ ही बीजेपी गरीब सवर्णों को आरक्षण व जनसंख्या नियंत्रण जैसे कानून के सहारे हिंदुओं को एकजुट करने की कोशिश भी कर रही है. हालांकि, बिहार भाजपा में भी अब जातीय जनगणना के स्वर उभरने लगे हैं. भाजपा कोटे से राजस्व व भूमि सुधार मंत्री बने रामसूरत राय ने कहा कि जातीय जनगणना भी हो और जनसंख्या नियंत्रण कानून भी बने. शायद यही वजह है कि प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष डॉ संजय जायसवाल ने भी 19 अगस्त से प्रदेश में जन आर्शीवाद यात्रा शुरू करने की घोषणा के साथ कहा कि जातीय जनगणना के सभी पहलुओं पर केंद्र सरकार विमर्श कर रही है, इसके बाद इस पर कोई निर्णय लिया जाएगा.

जातीय जनगणना तथा जनसंख्या नियंत्रण कानून के मुद्दे पर एनडीए में नूरा-कुश्ती जारी है. जानकारों का मानना है कि जनसंख्या नियंत्रण कानून भले ही हाशिए पर जा सकता है किंतु जातीय जनगणना का जिन्न तो राजनीतिक दलों को सताता ही रहेगा, क्योंकि भारतीय समाज में जाति का वजूद जल्द खत्म होता नहीं दिख रहा है. पत्रकार सुकेश पांडेय कहते हैं, "देश के अखबारों में छपने वाले वैवाहिक विज्ञापन देख लीजिए. लोग 21वीं सदी में भी अपनी ही जाति के वर-वधू ढूंढते हैं. जाति समाज पर किस हद प्रभावी है, इसे समझने को यह काफी है."

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