युद्ध नहीं छोड़ रहा पीछा: अफगानिस्तान से भागे, यूक्रेन में फंसे | दुनिया | DW | 03.03.2022

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दुनिया

युद्ध नहीं छोड़ रहा पीछा: अफगानिस्तान से भागे, यूक्रेन में फंसे

एक साल पहले अफगानिस्तान छोड़ यूक्रेन में पनाह लेने वाले अजमल रहमानी के लिए मुसीबतें पीछा नहीं छोड़ रही हैं. एक बार फिर उन्हें युद्धरत देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

अपने बच्चों के साथ अजमल रहमानी

अपने बच्चों के साथ अजमल रहमानी

अफगानिस्तान के रहने वाले अजमल रहमानी को कुछ दिनों पहले तक लगता था कि उन्हें यूक्रेन में शांति मिल गई है, लेकिन यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद उन्हें एक बार फिर जान बचाकर भागने को मजबूर होना पड़ा. रूसी बमबारी से बचने के लिए उनका नया ठिकाना पोलैंड बना.

युद्ध से बचकर फिर भागे

पोलैंड की सीमा में दाखिल होने के बाद उन्होंने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, "मैं एक युद्ध से भागते हुए दूसरे देश में आया और वहां दूसरा युद्ध शुरू हो गया है. बहुत दुर्भाग्य है." रहमानी जब अपना दर्द बयां कर रहे थे तो उनके बगल में खड़ी उनकी सात साल की बेटी मारवा हाथों में खिलौना पकड़े उन्हें देख रही थी. बम और बारूद भी नहीं तोड़ पाए प्यार का बंधन

मारवा के साथ उसकी मां मीना और 11 साल का भाई उमर भी हैं. परिवार ने करीब 30 किलोमीटर लंबी यात्रा पैदल ही तय की. यूक्रेन की सीमा पार कर ये लोग पोलैंड के मेदयका पहुंचे हैं, जहां से अन्य शरणार्थियों के साथ वे बस में सवार होकर सबसे करीबी शहर प्रेजेमिसली गए.

सैन्य संघर्ष शुरू होने के साथ ही यूक्रेन से लोग जान बचाकर पड़ोसी देशों, मुख्य रूप से पोलैंड, हंगरी और रोमानिया में जाकर पनाह ले रहे हैं. अधिकांश शरणार्थी यूक्रेनी हैं, उनमें अफगानिस्तान, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, भारत और नेपाल समेत कई देशों के छात्र और प्रवासी श्रमिक भी शामिल हैं.

शून्य पर लौटे रहमानी

40 साल के रहमानी कहते हैं कि उन्होंने अफगानिस्तान में नाटो के लिए काबुल एयरपोर्ट पर 18 साल तक काम किया. अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की निकासी से चार महीने पहले रहमानी ने देश छोड़ने का फैसला किया था, क्योंकि उन्हें धमकियां मिल रही थीं और वह इतना डर गए कि उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया था.

रहमानी कहते हैं, "इससे पहले अफगानिस्तान में मेरा जीवन अच्छा था. मेरा अपना घर था, मेरे पास कार थी, अच्छी तनख्वाह थी." वह आगे बताते हैं, "मैंने अपनी कार, अपना घर, अपना सब कुछ बेच दिया. मैंने सब कुछ खो दिया है."

रहमानी ने कहा कि उन्होंने अफगानिस्तान छोड़ने के लिए वीजा पाने के लिए बहुत संघर्ष किया और यूक्रेन जाने का फैसला इसलिए किया क्योंकि यह एकमात्र देश था जो उन्हें दाखिल होने देता.

रहमानी परिवार ने ओडेसा शहर में अपना आशियाना बसाया था. लेकिन उन्हें क्या पता था एक दिन रूस हमला कर देगा. रूसी हमले के बाद उन्हें दोबारा घर छोड़कर 1,110 दूर सीमा पर जाना पड़ा.

पोलैंड में एक चैरिटी के साथ काम करने वाले वकील टोमाश पेयच्राक ने बताया कि रहमानी और उनके परिवार जैसे हजारों लोग जो बिना वीजा पोलैंड पहुंचे हैं, ऐसे लोगों के पास खुद को रजिस्टर कराने के लिए 15 दिनों का समय है. पेयच्राक का कहना है कि पोलैंड को तत्काल इस नियम को बदलना पड़ेगा. यूएन: रूसी हमले के बाद एक सप्तााह के भीतर 10 लाख लोग देश से भागे

रहमानी कहते हैं कि वह भविष्य के बारे में चिंतित हैं लेकिन सीमा पार कर पोलैंड पहुंचने वाले शरणार्थियों की सहायता करने वाले स्वयंसेवकों और अधिकारियों द्वारा गर्मजोशी से स्वागत से वे प्रोत्साहित हुए हैं.

एए/वीके (एएफपी)

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