यूक्रेन युद्ध का फायदा उठाने की फिराक में इस्लामिक स्टेट कितना सफल होगा | दुनिया | DW | 21.05.2022

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दुनिया

यूक्रेन युद्ध का फायदा उठाने की फिराक में इस्लामिक स्टेट कितना सफल होगा

चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट का कहना है कि वो पश्चिमी देशों का ध्यान यूक्रेन युद्ध की ओर होने का फायदा उठाने की फिराक में है. हालांकि इस युद्ध से उसे जो फायदा होगा वह आतंकवाद से ज्यादा अर्थशास्त्र से जुड़ा है.

15 अप्रैल के आस-पास चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट ने एक धमकी भरा संदेश जारी किया था. इस्लामिक स्टेट ने अपने उस नेता की मौत का ‘बदला लेने के लिए एक एक अभियान' छेड़ने की घोषणा की थी जो फरवरी में सीरिया में हुए अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में मारे गए थे.

ठीक उसी समय, इस्लामिक स्टेट ने अपने समर्थकों से यूक्रेन में चल रहे युद्ध से उत्पन्न परिस्थितियों का लाभ उठाने की भी अपील की. इस्लामिक स्टेट ने अपने इस धमकी भरे संदेश में समर्थकों को यह भी सुझाव दिया कि जब ‘काफिर' पश्चिमी देश में व्यस्त थे, ‘इस्लामिक स्टेट' के समर्थक उस पर हमला कर सकते थे. इस्लामिक स्टेट जिस वक्त अपनी ताकत के लिहाज से सर्वोच्च स्थिति में था, उस वक्त उसका सीरिया और इराक के करीब एक तिहाई हिस्से पर नियंत्रण था.

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इस बीच, अल-कायदा का खुले तौर पर समर्थन करने वाली एक पत्रिका ने अल-कायदा के समर्थकों को सुझाव दिया कि यूक्रेन में नागरिकों को अपनी सुरक्षा के लिए जो हथियार मुहैया कराए गए हैं, उन्हें वो किसी भी तरह से हासिल कर लें और उनका उपयोग वो यूरोपियन लोगों के खिलाफ करें. अल-कायदा भी एक चरमपंथी संगठन है और साल 2013 में इस्लामिक स्टेट ने खुद को इससे दूर कर लिया था.

हालांकि पश्चिमी यूरोप में यूक्रेन युद्ध की हलचल की वजह से इन संगठनों के चरमपंथी हमले के विचार से शायद यूरोपीय देशों पर अब तक कोई फर्क नहीं पड़ा है. अफ्रीका से लेकर एशिया के विभिन्न हिस्सों में इस्लामिक स्टेट से संबद्ध करीब एक दर्जन समूह हैं और इनकी वजह से फिलहाल ज्यादातर हिंसक गतिविधियां अफ्रीका में ही जारी हैं.

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यूक्रेन युद्ध की वजह से इस्लामिक स्टेट, अल-कायदा और इस तरह के कुछ अन्य चरमपंथी संगठनों को कुछ अन्य तरीकों से लाभ हो सकता है.

सामाजिक अशांति का लाभ उठाने की फिराक में

मिस्र से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक अल अब्राहम के मुख्य संपादक इज्जत इब्राहिम यूसेफ ने हाल ही में अबू धाबी के थिंक टैंक ट्रेंड्स रिसर्च में प्रकाशित एक रिपोर्ट के जरिए चेतावनी दी कि ये चरमपंथी कोविड संकट के भीषण दौर से गुजर रहे समाज में यूक्रेन युद्ध के जरिए जो सामाजिक अशांति पैदा हुई है, उसका फायदा उठाने की फिराक में हैं.

इस्लामिक स्टेट समूह से लड़ने के लिए बने अंतरराष्ट्रीय सहयोग समूह की पिछले दिनों मोरक्को में हुई बैठक के दौरान भी इन आशंकाओं पर चर्चा हुई. 22 देशों के समूह अरब लीग ने ऐसी ही चेतावनी जारी की थी. मिस्र के एक वरिष्ठ राजनयिक अहमद अबुल घाइत ने सावधान किया है कि युद्ध और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न परिस्थितियों का इस्लामिक स्टेट जैसे समूह गलत फायदा उठा सकते हैं.

दरअसल, यूरोप में युद्ध के नतीजे उन देशों में पहले से ही मौजूद कई संकटों का सामना कर रहे देशों पर कठिनाई की एक और परत चढ़ा रहे हैं. अनाज की कमी, पेट्रोल और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें, मुद्रास्फीति जैसी समस्याओं से जूझ रहे लेबनान, सीरिया, ट्यूनीशिया, लीबिया और यमन जैसे देशों के सामने अब एक बड़ा संकट यह भी है कि उन्हें मदद दे रहे कई संगठनों का ध्यान अब यूक्रेन पर ज्यादा है.

बहुत संभव है कि जैसे-जैसे यूक्रेन युद्ध आगे बढ़ेगा, पहले से ही अस्थिरता से जूझ रहे देशों में हालात और खराब होते जाएंगे. ऐसी जगहों पर ‘इस्लामिक स्टेट' जैसे संगठन अपने एजेंडे को चलाकर और यहां की परिस्थितियों का लाभ उठाकर स्थानीय लोगों को अपने साथ जोड़ सकते हैं. 

लेबनान बहुत कठिन आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रहा है

लेबनान बहुत कठिन आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रहा है

ना कोई नौकरी नहीं, ना सामाजिक सुरक्षा 

वापस 2015 की ओर चलें तो इस्लामिक स्टेट ने राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे देश ट्यूनीशिया में सबसे ज्यादा लड़ाकों को अपने संगठन में शामिल कर लिया था. यह वही समय था जब आईएस अपनी शक्ति के चरम पर था और ये लोग दुनिया भर से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहे थे.

वैश्विक सुरक्षा सलाहकार सौफान ग्रुप के मुताबिक, उस वर्ष आईएस में 6,000 ट्यूनीशियाई थे जबकि दूसरे देशों में 2,500 रूसी, 2,400 सऊदी, 1,700 फ्रांसीसी और760 जर्मन नागरिकथे.

इतने सारे विदेशी नागरिकों के इस्लामिक स्टेट से जुड़ने के कई अलग-अलग कारण थे. मसलन, कई लोग जो यूरोप से सीरिया और इराक लौटे थे उन्हें मुसलमानों की दशा देखते हुए एक वास्तविक इस्लामिक देश की अवधारणा ने काफी प्रभावित किया. हालांकि बाद में, कुछ इंटर्व्यू में कई लड़ाकों ने बताया कि आईएस में शामिल होने के लिए उन्हें पैसे दिए गए थे और उसमें शामिल होने के पीछे यह भी एक महत्वपूर्ण कारण था.

अमेरिका के इंटरनेशनल सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ वायलेंट एक्स्ट्रीमिज्म यानी आईसीएसवीई की निदेशक एनी स्पेकहार्ड ने आईएस के कई पूर्व लड़ाकों का साक्षात्कार किया है. वो कहती हैं, "ट्यूनीशिया में बड़ी संख्या में युवाओं को आर्थिक मुद्दों ने आईएस में शामिल होने के लिए प्रेरित किया.”

ट्यूनीशिया के तमाम युवाओं के पास ना तो पैसे थे और ना ही उनके पास रोजगार और वो शादी करने या फिर परिवार को छोड़कर कहीं बाहर जाने में अक्षम थे. डीडब्ल्यू से बातचीत में स्पेकहार्ड कहती हैं, "इस स्थिति में इस्लामिक स्टेट उन्हें नौकरियां दे रहा था, मुफ्त आवास दे रहा था, शादियों और यहां तक कि सेक्स गुलाम बनाने तक के लिए महिलाएं उपलब्ध कराने की पेशकश कर रहा था.”

ट्यूनीशिया में राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता लगातार बनी हुई है

ट्यूनीशिया में राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता लगातार बनी हुई है

गुस्सा और नाउम्मीदी

इस बात के कुछ संकेत पहले से ही मिल रहे थे कि आईएस मध्य पूर्व में मौजूदा आर्थिक मुद्दों का आज भी इसी तरह फायदा उठा रहा है. लेबनान के उत्तरी शहर त्रिपोली के बारे में हाल में आई एक रिपोर्ट में चर्चा की गई है कि इस साल की शुरुआत में इस शहर के चालीस से ज्यादा युवा ‘लापता' हो गए थे.

उनके परिवारों को भी इस बारे में तब पता चला जब उन्होंने सुना कि इराकी रेगिस्तान में आईएस के प्रशिक्षण शिविरों में कुछ लोग मारे गए हैं. लेबनान गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है और स्थानीय अधिकारियों ने पत्रकारों को बताया कि इस्लामिक स्टेट समूह ने ऐसे लड़ाकों के लिए हर महीने पांच सौ डॉलर से भी ज्यादा देने की पेशकश की है.

इसी तरह की कहानियां अफगानिस्तान में आईएस समूह के तालिबान विरोधी शाखा से आई हैं, जिसे आईएसआईएस-खुरासान के नाम से जाना जाता है. यह समूह कम आय वाले सीमावर्ती जिलों में बेरोजगार स्थानीय युवकों को संगठन से जुड़ने के बदले में 270-450 डॉलर प्रतिमाह देने की पेशकश कर रहा है.

आसीएसवीई की डायरेक्टर स्पेकहार्ड कहती हैं, "आईएस समूह अभी भी आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को अपने साथ जोड़ने के एवज में वित्तीय प्रोत्साहन दे रहा है. हालांकि ऐसे संगठनों की यह पेशकश उन लोगों को आकर्षित कर सकती जो गरीब हैं और अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें लगता है कि आईएस ज्यादा न्यायपूर्ण शासन दे सकने में समर्थ हैं लेकिन जो लोग उच्च शिक्षित हैं और उनके पास खाने के लिए तो है लेकिन नौकरियां नहीं हैं, वो ऐसे चरमपंथी समूहों की पेशकश से नाराज हो सकते हैं.”

स्पेकहार्ड हाल ही में न्यूयॉर्क के बफैलो में हुई सामूहिक गोलीबारी का उल्लेख करती हैं जहां एक अमेरिकी किशोर ने एक सुपरमार्केट में दस दुकानदारों की हत्या कर दी थी. मनोचिकित्सा की प्रोफेसर स्पेकहार्ड कहती हैं, "ऐसे समय में जबकि गोरे और वर्चस्ववादी लोग नौकरी की पेशकश नहीं कर रहे हैं और आर्थिक विफलताओं समेत जीवन में दूसरी विफलताओं के लिए किसी और को दोषी ठहरा रहे हैं, ऐसे समय में आईएस समूह अपनी रणनीति का इस्तेमाल कर रहा है. आर्थिक कमजोरी युवाओं को आईएस में शामिल होने को प्रेरित कर सकती हैं.”

स्पेकहार्ड के मुताबिक, बेरोजगारी और बढ़ती कीमतों जैसे मुद्दे, राजनीतिक मुद्दों और कोविड महामारी की वजह से पैदा हुई परेशानियों को किसी अन्य पर थोपने की कोशिश की जा रही है.

इस्लामिक स्टेट की अफगान शाखा ने काबुल में हमला कर 170 लोगों की जान ले ली

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लंबे समय की रणनीति

इस्लामिक स्टेट ने राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक समस्याओं के कारण उत्पन्न हुए सत्ता के खालीपन को भी अतीत में अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया है.

आईएस समूह के विशेषज्ञ और यूनाइटेड किंगडम में एक्सट्रैक में अनुसंधान निदेशक चार्ली विंटर कहते हैं कि यह जानने में कुछ समय लगेगा कि क्या चरमपंथियों को यूक्रेन युद्ध से फायदा होगा. एक्सट्रैक संस्थान, सुरक्षा विश्लेषण के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करता है. 

डीडब्ल्यू से बातचीत में वो कहते हैं, "यूक्रेन युद्ध के कारण इसके प्रभाव दूसरे या तीसरे चरण में तो पड़ सकते हैं लेकिन फिलहाल आईएस समूह की क्षमताओं या नए समर्थकों को जुटाने की उसकी क्षमता और यूक्रेन युद्ध के बीच एक सीधा संबंध साबित करना मुश्किल है.”

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विंटर नीदरलैंड स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर काउंटर टेररिज्म में असोसिएट फेलो भी हैं. वो कहते हैं कि कोविड संकट जब से शुरू हुआ है, तभी से आईएस ने ऐसे बयान देने शुरू कर दिये थे कि महामारी, विरोधियों के संसाधनों को खत्म कर देगी, सुरक्षा खर्च को कम कर देगी और चरमपंथियों को उन पर हमले का मौका मिल जाएगा. लेकिन जानकारों के मुताबिक, इसे उन लोगों ने एक दीर्घकालीन योजना के तौर पर देखा था.

इस्लामिक स्टेट के हमले में सैनिक की मौत का मातम मनाते मिस्रवासी

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विंटर कहते हैं, "उन जगहों पर सामाजिक और आर्थिक रूप से और सामान्य सुरक्षा के लिहाज से हालात बिगड़ते जा रहे हैं जहां आईएस समूह ने पहले से ही नेटवर्क स्थापित कर लिया है. ऐसी स्थिति में वो अपने उद्देश्यों को पूरा भी कर सकता है. हालांकि कई चीजें ऐसी भी हैं जो इन्हें आगे बढ़ने से रोक सकती हैं. मसलन, आईएस समूह अब काफी कमजोर हो गया है और उनके पास संसाधन और लड़ाके दोनों ही कम हो गये हैं. दूसरी बात, अफ्रीका में युवाओं तक आसानी से पहुंच बनाने के लिए क्षेत्रीय स्तर पर कोई खलीफा  नहीं है.”

स्पेकहार्ड कहती हैं, "इन सबके अलावा आईएस समूह ने कई लोगों को अपना वास्तविक गैर-इस्लामी और भ्रष्ट स्वभाव दिखाया है, जिन्हें अब मूर्ख नहीं बनाया जा सकेगा.”

अपनी बात को खत्म करते हुए विंटर कहते हैं, "सबसे खराब स्थिति यही हो सकती है कि यूक्रेन युद्ध के कारण कुछ लोग इन चरमपंथी समूहों की विचारधारा की ओर आकर्षित हो जाएं लेकिन मुझे लगता है कि पहले जितने बड़े पैमाने पर इन संगठनों की ओर लोगों का झुकाव नहीं हो पाएगा.”

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