11 साल में रेप, 13 साल में मां, गुलाम बनाई यजीदी लड़की के पास अब भी लौटने को घर नहीं | दुनिया | DW | 10.02.2022

डीडब्ल्यू की नई वेबसाइट पर जाएं

dw.com बीटा पेज पर जाएं. कार्य प्रगति पर है. आपकी राय हमारी मदद कर सकती है.

  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

दुनिया

11 साल में रेप, 13 साल में मां, गुलाम बनाई यजीदी लड़की के पास अब भी लौटने को घर नहीं

इस्लामिक स्टेट ने हजारों यजीदी महिलाओं और लड़कियों को गुलाम बनाया. यजीदी समाज जहां इन महिलाओं को वापस अपना रहा है, वहीं बलात्कार और जबरन बनाए गए संबंधों से हुए बच्चों को अपनाने के लिए वह तैयार नहीं है.

Syrien | Roza Barakat in einem Safehouse in Hassakeh

रोजा 11 साल की थीं, जब इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने 2014 में उन्हें गुलाम बना लिया था. उनकी बड़ी बहनों को भी गुलाम बाजार में बेचा गया. रोजा अब आजाद हैं, लेकिन उनके परिवार की कोई खबर नहीं है.

रोजा बरकत के गुनहगार हराये जा चुके हैं. मगर उन्होंने अतीत में जो अत्याचार किए, उसके आतंक से रोजा आज भी आजाद नहीं हो सकी हैं. वह 11 साल की थीं, जब इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने पकड़कर उन्हें गुलाम बना लिया था. 2014 में इस्लामिक स्टेट ने उत्तरी इराक पर अपना नियंत्रण बनाने के बाद हजारों की संख्या में यजीदी महिलाओं और लड़कियों को गुलाम बनाया. रोजा इनमें से ही एक थीं.

कौन हैं यजीदी?

यजीदी एक प्राचीन धर्म है. यह एक ईश्वर में यकीन करता है. इसकी जड़ें ईसाई धर्म की शुरुआत से भी करीब 2,000 साल पुरानी हैं. यजीदी अपने धर्म में शैतान की अवधारणा को नहीं मानते. उनका यकीन है कि सर्वशक्तिमान ईश्वर इतना कमजोर नहीं कि शैतान जैसे किसी और ताकतवर का अस्तित्व सहन करे. ऐसे में शैतान की बात करना या फिर यह कहना कि शैतान जैसी कोई चीज होती है, यजीदियों में ईशनिंदा मानी जाती है.

यजीदियों के धार्मिक विश्वास के केंद्र में एक फरिश्ता है, जिन्हें 'मेलेक टाउस' कहा जाता है. यजीदी इन्हें ही धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि मानते हैं. इनका चित्रण मोर के रूप में किया जाता है. यजीदी जन्म से इस धर्म का हिस्सा होते हैं. यानी, किसी और का यजीदी में धर्मांतरण संभव नहीं है. अगर कोई यजीदी किसी और धर्म के अनुयायी से शादी कर ले, तो उसके पार्टनर का धर्म ही उसका धर्म मान लिया जाएगा. यजीदियों की सबसे पवित्र धार्मिक जगह 'लालिश' है. यह शहर उत्तरी इराक के एक पहाड़ की घाटी में बसा है.

क्या हुआ यजीदियों के साथ?

2014 में पड़ोसी सीरिया से आगे बढ़ते हुए इस्लामिक स्टेट का इराक में भी विस्तार शुरू हुआ. आईएसआईएस यजीदियों को काफिर मानता था. उसका मानना था कि यजीदियों का या तो धर्मांतरण कर देना चाहिए, या फिर उन्हें मार देना चाहिए. चूंकि याजिद कुर्दिश एथनिक समूह का भी हिस्सा हैं, इसलिए भी उन्हें लंबे समय से प्रताड़ना झेलनी पड़ रही थी. आईएसआईएस के आने से स्थितियां और बदतर हो गईं. ऐसे में बड़ी संख्या में यजीदी इराक छोड़कर भागने लगे.

रोजा अब सीरिया के एक सेफ हाउस में रह रही हैं.

रोजा अब सीरिया के एक सेफ हाउस में रह रही हैं. वह अपने शहर सिंजर लौटकर जाने से डरती हैं

उत्तरी इराक में सिंजर नाम की एक जगह है. यह जगह सिंजर नाम की एक पहाड़ी श्रृंखला के पास बसी है. सिंजर में यजीदी अल्पसंख्यकों की काफी बसाहट थी. अगस्त 2014 में आईएसआईएस ने सिंजर पर हमला किया और यहां बड़े स्तर पर नरसंहार किया. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, यहां लगभग 5,000 यजीदी पुरुष मार डाले गए. लगभग 7,000 महिलाओं और बच्चों को अगवा कर लिया गया. इन्हें गुलाम बनाकर कई-कई बार खरीदा और बेचा गया. बलात्कार किया गया. पकड़े गए यजीदी लड़कों को भी भीषण यातनाएं दी गईं. उन्हें मारकर, भूखा रखकर जबरन युद्ध लड़ने को मजबूर किया गया.

क्या जीवन पहले जैसा हो पाएगा?

रोजा भी सिंजर की रहने वाली थीं. अगस्त 2014 में आईएसआईएस उन्हें गुलाम बनाकर सीरिया ले गया. उन्हें कई बार बेचा गया. कई बार उनका बलात्कार किया गया. इतनी कम उम्र में रोजा मां बन गईं. अब वह 18 साल की हैं. उनका बच्चा मर चुका है. इन सालों की यातनाओं ने रोजा से बहुत कुछ छीन लिया है. यहां तक कि वह अपनी मातृभाषा 'कुरमांजी' भी बहुत कम बोल पाती हैं.

2019 में आईएसआईएस की हार हुई. बड़ी संख्या में उसके लड़ाके गिरफ्तार कर लिए गए. उनकी पत्नियों और बच्चों को डिटेंशन कैंपों में बंद कर दिया गया. रोजा जैसी गुलाम बनाई गई यजीदी महिलाएं आजाद तो हुईं, लेकिन सामान्य जीवन में लौट पाना अब भी बहुत मुश्किल था. एक तरफ सालों तक झेली गई यातनाओं की पीड़ा थी. वहीं, एक बड़ी तकलीफ यह भी थी कि इनमें से ज्यादातर महिलाओं के पास वापस लौटकर जाने के लिए कोई घर नहीं था. उनके सामने एक बड़ा सवाल यह था कि उनका परिवार और समाज उन्हें अपनाएगा या नहीं.

रोजा के नाखूनों पर लगा लाल नेल पॉलिश मिटने लगा है. उंगलियां घबराहट में उनकी बंधी हुई चोटी को टटोलती हैं. वह कहती हैं, "मुझे नहीं पता कि लौटकर मैं अपने लोगों का सामना कैसे करूंगी." आईएसआईएस के जिन लड़ाकों ने सालों तक उन्हें गुलाम रखा, वे कहते थे कि रोजा के लिए अब वापस लौटने के सारे दरवाजे बंद हो चुके हैं. अगर वह लौटती भी हैं, तो परिवार और समाज उन्हें वापस नहीं अपनाएगा. रोजा ने इन बातों पर यकीन कर लिया था.

रोजा की कहानी, उनकी मनोस्थिति उन जैसी सैकड़ों यजीदी महिलाओं की मौजूदा जिंदगी का सारांश है. ये महिलाएं सालों तक झेली गई यातनाओं से अब भी आतंकित हैं. उनके साथ जो हुआ, वे अब तक उससे नहीं उबर सकी हैं. वहीं उन्हें वापस अपनाने के सवाल पर अब भी यजीदी समाज ऊहापोह में उलझा है. 'यजीदी हाउस' उत्तरपूर्वी सीरिया में काम कर रही एक संस्था है. इसके उपप्रमुख फारुक तुजु बताते हैं, "जिसके साथ 12 की उम्र में बलात्कार हुआ, 13 साल में वह मां बन गई, ऐसी बच्ची से आप क्या उम्मीद करते हैं? इतनी यातनाएं और दहशत झेलने के बाद वे अब किसी पर भी यकीन नहीं कर पाती हैं. वे कहीं की नहीं हैं."

Syrien | Roza Barakat in einem Safehouse in Hassakeh

अगस्त 2014 ने इस्लामिक स्टेट ने उत्तरी इराक के सिंजर में यजीदियों का नरसंहार किया

बार-बार बिकने से बचने के लिए धर्म बदला

पिछले हफ्ते उत्तर-पश्चिमी सीरिया में अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज ने एक विशेष ऑपरेशन किया. इसमें आईएसआईएस का सरगना अबू इब्राहिम अल-हाशिमी अल-कुरैशी मारा गया. 3 फरवरी, 2021 को अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने उसके मारे जाने की जानकारी दी. 2019 में अबू बकर अल-बगदादी के मारे जाने के बाद अबू इब्राहिम ने खुद को खलीफा घोषित किया था. माना जाता है कि यजीदी महिलाओं को गुलाम बनाने में अबू इब्राहिम की बड़ी भूमिका थी.

उसके मारे जाने के बाद न्यूज एजेंसी एपी ने रोजा से मुलाकात की. वह 'यजीदी हाउस' द्वारा चलाए गए एक सेफ हाउस में रहती हैं. अबू इब्राहिम की खबर सुनकर रोजा ने कहा कि अब इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता है. वह अपनी आपबीती सुनाती हैं. बताती हैं कि सबसे पहले उन्हें जिस इराकी ने खरीदा था, वह उनके पिता से भी बड़ा था. उसने रोजा को मजबूर किया था कि वह उसकी पत्नी को 'मां' कहें. यह वाकया बताते हुए रोजा अब भी कांप जाती हैं.

कुछ महीने बाद उस इराकी ने रोजा को किसी और के हाथों बेच दिया. बार-बार बेचे जाने की यातना से बचने के लिए रोजा ने धर्म परिवर्तन कर लिया. तब आईएसआईएस के लड़ाकों ने रोजा की शादी लेबनान के एक शख्स से करवा दी. वह आदमी आईएसआईएस के लिए खाने और हथियारों की आपूर्ति करता था. रोजा बताती हैं, "वह बाकियों से बेहतर था." 13 साल में रोजा मां बनीं. बेटे का नाम रखा, हूद.

वे आईएसआईएस की राजधानी रक्का में रहती थीं. एक बार रोजा ने यह पता लगाने की जिद की कि उनकी बड़ी बहनों के साथ क्या हुआ. रोजा की बहनें भी उन्हीं की तरह गुलाम बना ली गई थीं. रोजा जानना चाहती थीं कि उनकी बहनें और माता-पिता जिंदा भी हैं कि नहीं. कुछ हफ्तों के बाद रोजा का पति एक तस्वीर लेकर आया. यह तस्वीर रक्का के गुलाम बाजार की थी, जहां यजीदी लड़कियां बेची जाती थीं. इस तस्वीर में बेची जा रही एक यजीदी महिला दिख रही थी. वह रोजा की ही बहन थी. रोजा वह तस्वीर याद करते हुए बताती हैं, "वह कितनी बदल गई थी."

बेटे का क्या हुआ?

2019 की शुरुआत में जब आईएसआईएस का नियंत्रण कमजोर होने लगा, तो रक्का से लोग भागने लगे. रोजा भी अपने पति के साथ भागकर पहले देर अल-जोर और फिर बगूज चली आईं. बगूज आईएसआईएस का आखिरी मजबूत ठिकाना था. 2019 में अमेरिका के समर्थन वाली कुर्दिश डेमोक्रैटिक फोर्सेज ने बगूज को घेर लिया. औरतों और बच्चों को सुरक्षित बाहर आने की जगह दी गई. इसी समय रोजा भी सामने आ सकती थीं. अपनी यजीदी पहचान बताकर सुरक्षा मांग सकती थीं. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.

मार्च 2019 में अपने बेटे हूद को साथ लेकर वह आईएसआईएस लड़ाकों की पत्नियों के साथ शहर से भाग गईं. आईएसआईएस समर्थकों की मदद से उन्होंने एक स्मगलिंग रूट पकड़ा और उत्तर-पश्चिमी सीरिया के इदलिब प्रांत में आ गईं. रोजा का पति बगूज की लड़ाई में मारा गया था. इसलिए इदलिब में रोजा आईएसआईएस सदस्यों की विधवाओं के एक ठिकाने पर रहने लगीं. इसके आगे रोजा के साथ क्या हुआ, यह स्पष्ट नहीं है. शुरुआत में रोजा ने अधिकारियों को बताया था कि उन्होंने अपने बेटे को इदलिब में छोड़ा और काम की तलाश में निकल गईं. मगर न्यूज एजेंसी एपी से बात करते हुए रोजा ने कहा कि उनका बेटा एक हवाई बमबारी में मारा गया. जब एपी ने उनसे स्पष्टीकरण मांगी, तो रोजा का जवाब था, "यह बहुत मुश्किल है. मैं इस बारे में बात नहीं करना चाहती हूं."

एक तस्वीर से सामने आया अतीत

रोजा बताती हैं कि एक तस्कर की मदद से वह देर अल-जोर पहुंचीं. यहां उन्हें काम भी मिल गया. वह तुर्की जाकर नई जिंदगी शुरू करना चाहती थीं. इसके लिए वह पैसे भी जोड़ रही थीं. मगर फिर जनवरी 2021 में कुर्दिश फोर्सेज ने रोजा को पकड़ लिया. गिरफ्तारी के समय वह एक घर में छुपी हुई थीं. यहां से वह तस्करों की मदद लेकर सीरिया-तुर्की सीमा पार करना चाहती थीं. रोजा को कई दिनों तक हिरासत में रखकर पूछताछ की गई. इस पूछताछ के बारे में वह बताती हैं, "मैं अपनी यजीदी पहचान को छुपाने की हर मुमकिन कोशिश की." रोजा ने जांचकर्ताओं से कहा कि देर अल-जोर की हैं. इलाज के लिए तुर्की जाना चाहती हैं.

मगर जांचकर्ताओं को रोजा की बातों पर भरोसा नहीं हुआ. उन्हें रोजा के मोबाइल में एक पुरानी तस्वीर मिली. इसमें एक यजीदी लड़की गुलाम बाजार में बेची जाती दिख रही थी. जांचकर्ताओं ने जब इस तस्वीर पर रोजा से स्पष्टीकरण मांगा, तब जाकर कहानी खुली. यह रोजा की बहन की तस्वीर थी. वही तस्वीर, जो कभी रोजा के पति ने उन्हें दिखाई थी.

वीडियो देखें 04:35

बार बार बेचा गया और नोंचा गया

रोजा कहती हैं, "मेरे मुंह से निकल गया कि वह मेरी बहन है." रोजा की यजीदी पहचान का पता लगने के बाद जांचकर्ताओं ने उन्हें सीरिया के बरजान गांव में बने एक सेफ हाउस में पहुंचा दिया. यहां यजीदी समुदाय ने रोजा का स्वागत किया. उस अनुभव को याद करते हुए रोजा बताती हैं, "उन्होंने इतने अपनेपन से मुझसे बात की. उनका लगाव देखकर, उनका प्यार देखकर मैं हैरान थी. मैं जैसी हूं, उसी रूप में मेरा स्वागत किया गया था."

बच्चों का क्या होगा?

आईएसआईएस की हार को दो साल से ज्यादा समय हो चुका है. लेकिन 2,800 से ज्यादा यजीदी महिलाएं और बच्चे अब भी लापता हैं. फारुक तुजु बताते हैं कि इनमें से कई महिलाओं ने सबसे रिश्ते संपर्क तोड़ लिया है. वे अपने समुदाय से बाहर नई जिंदगी शुरू करने की कोशिश कर रही हैं. उन्हें लगता है कि अगर वे लौटेंगी, तो शायद मार डाली जाएं. कई महिलाएं बच्चे छीन लिए जाने के डर से नहीं लौटती हैं.

इराक के यजीदी समुदाय ने सिंजर लौटने वाली महिलाओं के आगे शर्त रखी है. ये महिलाएं अगर वापसी चाहती हैं, तो उन्हें अपने बच्चे छोड़ने होंगे. इसलिए कि इन बच्चों के पिता आईएसआईएस का हिस्सा थे. सिंजर लौटने वाली कई यजीदी महिलाओं से कहा गया था कि सीरिया के कुर्द परिवार उनके बच्चे गोद ले लेंगे. मगर ऐसा नहीं हुआ. दर्जनों छोड़ दिए गए बच्चे उत्तरपूर्वी सीरिया के यतीमखानों में पहुंचा दिए गए हैं. इन बच्चों का क्या भविष्य होगा, इसे लेकर यजीदी समुदाय के बीच बहस चल रही है.

"मुझे वक्त चाहिए"

2019 में यजीदियों की सर्वोच्च धार्मिक काउंसिल ने यजीदी समाज से आईएसआईएस के अत्याचारों की शिकार महिलाओं को वापस अपनाने को कहा. फिर कुछ दिनों बाद काउंसिल ने कहा कि महिलाओं को वापस अपनाया जाएगा. लेकिन उनके साथ हुए बलात्कार से जो बच्चे पैदा हुए, उन्हें नहीं अपनाया जाएगा. तुजु कहते हैं, "यह हमारी गलती है. हम इसे स्वीकार करते हैं. हमने बच्चों को अपनी मांओं के साथ नहीं रहने दिया." तुजु ने बताया कि अब भी कई यजीदी महिलाएं अल-होल कैंप में रह रही हैं. इस कैंप में हजारों की संख्या में महिलाएं हैं. इनमें से ज्यादातर आईएसआईएस सदस्यों की पत्नियां, विधवाएं और बच्चे हैं. 

रोजा अभी सिंजर वापस लौटने के लिए तैयार नहीं हैं. उनका समूचा परिवार लापता है. वे सब जिंदा हैं या नहीं, ये भी नहीं पता. वहां किसके पास लौटा जाए. लौटने के लिए क्या बचा है. रोजा इन सवालों के जवाब खोज रही हैं. वह कहती हैं, "मुझे वक्त चाहिए. अपने लिए समय चाहिए."

एसएम/आरपी (एपी)