जर्मनी में अब विदेशी छात्रों को देनी होगी अलग ट्यूशन फीस | दुनिया | DW | 21.08.2019
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दुनिया

जर्मनी में अब विदेशी छात्रों को देनी होगी अलग ट्यूशन फीस

यूरोप के बाहर से आने वाले छात्रों के लिए जर्मनी में अलग ट्यूशन फीस के लागू होने से विदेशी छात्रों में चिंता है. चिंता इस बात की भी है कि ज्यादा खर्चीला होने के कारण जर्मनी अब विदेशी छात्रों का मनपसंद गंतव्य नहीं रहेगा.

विदेशी छात्रों के बीच जर्मनी पढ़ाई लिखाई का एक लोकप्रिय ठिकाना रहा है. खुद जर्मनी भी इस बात पर गौरवान्वित महसूस करता है कि वह सभी के लिए मुफ्त में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध करवाता है. हाल ही में जर्मनी की दो संस्थाओं द्वारा किए गए अध्ययन में यह बात सामने आयी है कि गैर-अंग्रेजी भाषी देशों में यह विदेशी छात्रों के बीच काफी ज्यादा लोकप्रिय है. जर्मनी ने इस मामले में फ्रांस को भी पीछे छोड़ दिया है. इसके पीछे की प्राथमिक वजह बेहतर संभावनाएं और किसी तरह का ट्यूशन फीस नहीं होना है. हालांकि, उस अध्ययन में 2016 और उससे पहले के डाटा का इस्तेमाल किया गया है. इसके बाद जर्मन राज्यों ने गैर यूरोपियन देशों के छात्रों के लिए ट्यूशन फीस लागू किया है. ऐसे में जल्द ही विदेशी छात्र जर्मनी को लेकर नजरिया बदल सकते हैं.

बॉन यूनिवर्सिटी में कृषि विशेषज्ञ, भारत के डॉ वरुणसेलेन मुरुकायन कहते हैं, "अमेरिका जैसे विकसित देशों से आने वाले छात्रों के लिए फीस कोई समस्या नहीं है लेकिन गैर-विकसित छात्रों को फीस देने में निश्चित रूप से परेशानी होगी."

फीस का प्रभाव

जर्मनी के 16 संघीय राज्यों ने उच्च शिक्षा शुल्क खुद से निर्धारित किया है. वर्तमान में सिर्फ दक्षिण-पश्चिमी राज्य बाडेन-वुर्टेमबेर्ग ही गैर-यूरोपीय विदेशी छात्रों से शुल्क ले रहा है. हालांकि, रिफ्यूजियों को इससे छूट दी गई है. बाडेन-वुर्टेमबेर्ग राज्य ने जो नियम लागू किया है उसके अनुसार विदेशी छात्रों को प्रत्येक सेमेस्टर 1,500 यूरो फीस देनी होगी. यह अक्टूबर 2017 से प्रभाव में आया है. इसका नतीजा यह हुआ कि इस क्षेत्र के सात विश्वविद्यालयों ने उस साल अपने एक-तिहाई विदेशी छात्र खो दिए.

क्षेत्रीय पब्लिक ब्रॉडकास्टर डब्ल्यूडीआर के अनुसार, जैसे ही छात्रों से फीस लेने का निर्देश जारी हुआ, बाडेन-वुर्टेमबेर्ग में नामांकन के लिए आवेदन करने वाले गैर-यूरोपियन छात्रों की संख्या में 20 प्रतिशत की गिरावट देखी गई. फीस लेने की घोषणा से पहले कार्ल्सरूह इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में अफ्रीका के 150 नए छात्रों ने नामांकन करवाया था लेकिन इसके एक साल बाद मात्र 22 नए छात्र आए.

अफ्रीकी और एशियाई छात्रों में कमी

ध्यान देने वाली बात ये है कि फ्राईबुर्ग यूनिवर्सिटी ने इस ट्रेंड को गलत साबित किया. फ्राईबुर्ग यूनिवर्सिटी में एकेडमिक अफेयर्स (शैक्षणिक मामलों) के उपाध्यक्ष प्रोफेसर यूलिआने बेस्टेर्स-डिल्गर कहती हैं, "फीस लेने की घोषणा के बाद गैर-यूरोपियन देशों के छात्रों की संख्या में 112 की वृद्धि हुई है. हमें उम्मीद है कि ट्यूशन फीस के बावजूद एशिया और अफ्रीका के छात्रों की संख्या में वृद्धि पहले जैसी ही रहेगी." जर्मनी के सबसे अधिक आबादी वाले नॉर्थ राइन वेस्टफेलिया सहित कई राज्य बाडेन-वुर्टेमबेर्ग के नक्शेकदम पर चलने की सोच रहे हैं.

कोलोन विश्वविद्यालय की सूचना अधिकारी फ्रीडा बेर्ग ने कहा कि "कीमत ज्यादा होने पर मांग तो कम होगी ही." हालांकि, अफ्रीका और एशिया के विकासशील देशों के छात्रों के बारे में उनका कहना है कि ये छात्र गरीब नहीं होते हैं, बल्कि वे अपने देश के मध्यम या उच्च वर्ग से आते हैं. उन्होंने कहा कि यदि छात्र पहले से ही "जर्मनी में आने की शर्तों को पूरा कर सकते हैं," तो वे "ट्यूशन फीस" भी दे सकते हैं.

विविधता में गिरावट का अंदेशा

फिर भी, जर्मनी में अफ्रीकी और एशियाई छात्रों के लिए नस्लवाद और भाषा के डर से ज्यादा विश्वविद्यालय और रहने के खर्च को मुख्य विषय माना जाता है. बॉन यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे एक इथियोपियाई कृषि स्नातकोत्तर छात्र डेरेजे तामीरू डेमी कहते हैं कि ट्यूशन फीस की वजह से विदेशी छात्रों की संख्या में कमी हो सकती है और इससे विविधता में कमी आ सकती है. विदेशी छात्रों के लिए एक बड़ी वित्तीय समस्या यह होती है कि उन्हें हर साल अपने खाते में 8,640 यूरो रखना होता है. यह ब्लॉक्ड अकाउंट रेजिडेंस परमिट पाने के लिए जर्मनी में कानूनी रूप से अनिवार्य है.

कई लोग फीस के पीछे की वजहों को देखते हैं. भारत से जर्मनी आकर स्नातकोत्तर कर रही प्रेरणा कहती हैं, "लाइफ सायंस रिसर्च के लिए जर्मनी को बेहतर देशों में से एक माना जाता है. कई नोबेल पुरस्कार विजेता जर्मनी से हैं और शिक्षा की गुणवत्ता अच्छी है." हालांकि, जर्मन एकेडमिक एक्सचेज सर्विस (DAAD) स्कॉलरशिप लेकर जर्मनम शहर बॉन में पढ़ाई कर रही नेपाली छात्रा अंबिका कहती हैं कि यदि उन्हें खुद से पैसे खर्च करने होते तो वह कभी भी जर्मनी में पढ़ाई करने की नहीं सोचतीं. उनके हिसाब से जर्मनी में रहने के खर्च के साथ ट्यूशन फीस एक अतिरिक्त बोझ होगा. ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में शोध अधिकारी के रूप में कार्यरत घाना के एक विकास अर्थशास्त्री डॉ एल्विस हॉरर एवेंयो का मानना है कि ट्यूशन फीस लागू होने की वजह से जर्मनी अफ्रीकन छात्रों के बीच उतना लोकप्रिय नहीं रहेगा.

मेलिसा वान ब्रुनरसुम/आरआर

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