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समाजऑस्ट्रेलिया

ऑस्ट्रेलिया में क्यों डूब रहे हैं इतने भारतीय

विवेक कुमार, सिडनी से
४ अप्रैल २०२४

ईस्टर पर एक और भारतीय परिवार के दो लोगों की ऑस्ट्रेलिया में डूबने से मौत हो गई. पिछले दो महीने में ऐसी सात मौतें हो चुकी हैं. भारतीयों के डूबने की घटनाएं चिंताजनक हो गई हैं.

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ऑस्ट्रेलिया के समुद्र तट
खतरनाक हैं ऑस्ट्रेलिया समुद्र तटतस्वीर: Michael Runkel/robertharding/picture alliance

ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न के रहने वाले 38 साल के सन्नी रंधावा अपने परिवार के साथ ईस्टर की छुट्टियां मनाने गोल्ड कोस्ट गए थे. अपने पिता के साथ वह स्विमिंग पूल के किनारे बैठे धूप सेंक रहे थे और दो साल की बेटी बगल में खेल रही थी. अचनाक बेटी पानी में गिर गई. उसे बचाने के लिए सन्नी पानी में कूदे. उन्होंने बेटी को तो निकाल लिया लेकिन खुद स्विमिंग पूल की गहराई में फंस गए. अपने बेटे को डूबता देख सन्नी के पिता भी पानी में कूदे. दोनों ही बाहर नहीं आ सके. परिवार के दोनों लोग वहीं खत्म हो गए.

ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए यह समाचार बड़े सदमे की तरह है. इसी परिवार के चार लोग दो महीने पहले विक्टोरिया के फिलिप आईलैंड में डूब कर मर गए थे. वे समुद्र की खतरनाक लहरों का शिकार हुए थे. उससे पहले 25 साल के एक भारतीय छात्र की विक्टोरिया राज्य में ही डूबने से मौत हो गई थी.

ऑस्ट्रेलिया अपने हसीन समुद्र तटों से दुनियाभर के पर्यटकों को आकर्षित करता है. लेकिन हर साल ये समुद्र तट सैकड़ों लोगों की जान ले लेते हैं. नेशनल ड्राउनिंग रिपोर्ट 2023 के मुताबिक 1 जुलाई 2022 से 30 जून 2023 के बीच देश में 281 लोग डूबने से मरे जबकि सैकड़ों अन्य लोगों को मुश्किलों से बचाया जा सका.

‘द रॉयल लाइफ सेविंग' संस्था के मुताबिक इस गर्मी में यानी 1 दिसंबर 2023 से 29 फरवरी 2024 के बीच देश भर में डूबने से 99 लोगों की जान गई. यह पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 10 फीसदी ज्यादा है और पांच साल की औसत से 5 फीसदी ज्यादा है.

मरने वालों में 26 फीसदी की मौत सिर्फ क्रिसमस और न्यू ईयर के बीच के हफ्ते में हुई जब ऑस्ट्रेलिया में गर्मी अपने चरम पर होती है. 26 फीसदी लोगों की आयु 55 साल या उससे अधिक थी जबकि 10 फीसदी 14 वर्ष से कम आयु के बच्चे थे.

विदेशी पर्यटक खासकर खतरे में

इस गर्मी डूबकर मरने वालों में दस फीसदी विदेशी पर्यटक थे. राष्ट्रीयता के आधार पर इन पीड़ितों की कोई संख्या उपलब्ध नहीं है लेकिन हर गर्मी में भारतीय मूल के लोगों के डूबने की इतनी खबरें आती हैं कि समुदाय को डर लगने लगा है. मेलबर्न में रहने वालीं चमनप्रीत कहती हैं कि हर साल इतनी मौतें देखकर बहुत दुख होता है.

वह कहती हैं, "मुझे ऑस्ट्रेलिया में करीब आठ साल हो गए हैं और हर साल भारतीय समुदायों के लोगों के डूबने की इतनी खबरें आती हैं, जो बहुत उदास करती हैं. पूरे के पूरे परिवार बर्बाद हो जाते हैं.”

ऑस्ट्रेलिया में तैरना सीखने को जीवन का एक बेहद महत्वपूर्ण अंग माना जाता है. अधिकारी कहते हैं कि विदेशियों के ऑस्ट्रेलिया डूबने की इतनी घटनाएं इसलिए होती हैं क्योंकि वे तैरने में निपुण नहीं होते और समुद्र व पानी के खतरे को हल्के में लेते हैं.

रॉयल लाइफ सेविंग सोसायटी क्वींसलैंड के निदेशक पॉल बैरी कहते हैं कि जब लोग किसी अपने को बचाने के लिए पानी में कूदते हैं तो वे इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं कि उन्हें कितना तैरना आता है.

मीडिया से बातचीत में बैरी ने कहा, "हम अक्सर देखते हैं कि जब बच्चे पानी में फंस जाते हैं तो माता या पिता उन्हें बचाने के लिए कूद जाते हैं. कई बार ऐसा होता है कि बच्चा तो बच जाता है लेकिन अभिभावक की जान चली जाती है. अपने बच्चे को बचाना माता-पिता की कुदरती प्रतिक्रिया है.”

विदेशियों में तैराकी के प्रति जागरूकता

बहुसांस्कृतिक समुदायों की देखरेख के लिए जिम्मेदार न्यू साउथ वेल्स सरकार की संस्था मल्टीकल्चरल एनएसडब्ल्यू के प्रमुख जोसेफ ला पोस्ता कहते हैं कि ये समुदाय ज्यादा खतरे में हैं क्योंकि विदेशों में जन्मे 3 से 5 फीसदी लोग तैरना बिल्कुल नहीं जानते या बहुत कम जानते हैं.

ऑस्ट्रेलिया की सरकार भी इस बात को समझ रही है कि ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले विदेशी मूल के लोगों में तैरने को लेकर उतनी जागरूकता नहीं है, जितनी अन्य समुदायों में है. इसलिए ऐसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं कि इन समुदायों की खासतौर पर मदद की जा सके.

उदाहरण के लिए सिडनी के पश्चिम में बहुसांस्कृतिक कस्बे लिवरपूल की काउंसिल ने ‘प्रोजेक्ट हार्मनी' नाम से एक कार्यक्रम शुरू किया है जिसमें एक हजार स्थानीय बच्चों को मुफ्त तैरना सिखाया जाएगा.

रॉयल लाइफ सेविंग एनएसडब्ल्यू के सीईओ माइकल लिंस्की कहते हैं कि जिन इलाकों में डूबने की घटनाओं का औसत ज्यादा है, वहां इस तरह के कार्यक्रमों की खास जरूरत है. न्यू साउथ वेल्स में विधायक भारतीय मूल की करिश्मा कालियांदा कहती हैं कि अगर धन की कमी के कारण बच्चों को तैरना नहीं सिखाया जा रहा है, तो यह चिंता की बात है और इस समस्या का हल निकालना जरूरी है, इसलिए लिवरपूल काउंसिल जैसे कार्यक्रम बहुत अहम हो जाते हैं.

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