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अर्थव्यवस्थासंयुक्त राज्य अमेरिका

जर्मनी के दवा उद्योग पर क्यों निशाना साध रहा है अमेरिका?

थोमस कोलमन
२९ जून २०२६

सस्ती दवा का खर्च कौन उठाए? इसी सवाल पर अमेरिका और जर्मनी आमने-सामने आ गए हैं. अमेरिका का कहना है कि जर्मनी के मरीज कम कीमत पर दवाइयां लेते हैं, जबकि नई दवाओं के विकास का भारी खर्च अमेरिकी मरीजों से वसूला जाता है.

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दवाओं की वेबसाइट ट्रंपआरएक्स डॉट कॉम के विस्तार की घोषणा करते हुए डॉनल्ड ट्रंप
वॉशिंगटन पता लगाना चाहता है कि कहीं बेहतर दवाइयों के शोध और विकास की लागत का बड़ा हिस्सा अमेरिकी मरीजों और कंपनियों से तो वसूला नहीं जा रहा है. तस्वीर: Andrew Leyden/ZUMA/picture alliance

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की मानें तो दुनिया का हर देश अमेरिका को ‘लूटने' पर तुला है, जैसे कि जर्मनी, जो अमेरिका के दवा बाजार का जमकर फायदा उठा रहा है. 

अब, ट्रंप प्रशासन जर्मनी की जांच करने में जुट गया है. वॉशिंगटन का कहना है कि वह पता लगाना चाहता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बेहतर दवाइयों के शोध और विकास की लागत का बड़ा हिस्सा अमेरिकी मरीजों और कंपनियों से वसूला जा रहा हो, ताकि जर्मनी के मरीजों को वही दवाएं कम कीमत पर मिल सकें.

1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत शुरू हुई इस जांच के सितंबर तक पूरी होने की उम्मीद है. अगर जांच में अमेरिका के दावे सही पाए जाते हैं, तो अमेरिका जर्मनी पर नए टैरिफ लगा सकता है.

बदलती कीमतों की पुरानी लड़ाई

इस विवाद की जड़, दोनों देशों की स्वास्थ्य नीति से जुडी हैं. जर्मनी अपनी सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा प्रणाली के जरिए दवाओं की कीमतों को नियंत्रित रखता है ताकि आम लोगों को सस्ती दरों पर दवाइयां मिल सकें. जबकि अमेरिका का मानना है कि इससे बाजार में असंतुलन पैदा होता है. हालांकि, जर्मनी मानता है कि इलाज का खर्च कम करने के लिए दवाओं की कीमत को नियंत्रित करना जरूरी है.

दवा की कीमतें कम करने के लिए ट्रंप ने रेगेनेरॉन के साथ समझौते की घोषणा की
अमेरिका में मेडिकेयर या मेडिकेड जैसी सरकारी योजनाओं के तहत दवा खरीदना किफायती होता है.तस्वीर: Alex Wong/Getty Images/AFP

अब दवाइयों की कीमतों का मुद्दा सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि ये व्यापार की तीखी बहस में बदल गया है. यहां सवाल यह है कि क्या सच में जर्मनी की कीमत नियंत्रण नीति की वजह से अमेरिकी दवा कंपनियों को नुकसान होता है और दोनों देशों के बीच व्यापार में असंतुलन पैदा होता है.

38 देशों के संगठन ओईसीडी के अनुसार, अमेरिका और जर्मनी दवाओं पर सबसे ज्यादा पैसे खर्च करते हैं. हालांकि, 2023 में एक अमेरिकी मरीज ने औसतन 1,713 डॉलर दवाओं पर खर्च किए, जबकि जर्मनी में यह खर्च 1,158 डॉलर प्रति मरीज ही रहा.

जर्मनी की स्वास्थ्य नीति से क्यों नाराज है अमेरिका ?

जून की शुरुआत में अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने बयान दिया, "यह जांच इस बात का पता लगाएगी कि क्या जर्मनी नई और महंगी दवाओं के लिए काफी कम कीमत चुका रहा है. अगर ऐसा है, तो इससे अमेरिकी कारोबार पर गलत और भेदभावपूर्ण असर पड़ता है.” उन्होंने यह भी कहा, "इस मुद्दे को सुलझाने के लिए पिछले कई महीनों से जर्मनी के साथ बातचीत चल रही थी.”

ग्रीर ने कहा, "राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ कर दिया है कि अमेरिकी मरीजों को दुनिया भर के लिए नई दवाइयां बनाने का असमान बोझ नहीं उठाना चाहिए.” उन्होंने आगे कहा, "मेरी चिंता है कि जर्मनी तेजी से ऐसी नीतियां लागू कर रहा है, जिससे नई और आधुनिक दवाइयों पर होने वाला उसका खर्च और भी कम हो जाएगा.”

इसके साथ ही अमेरिका, जर्मनी की स्वास्थ्य मंत्री नीना वार्केन के उस अरबों यूरो के हेल्थकेयर बचत पैकेज को निशाना बना रहा है, जिसे आने वाले हफ्तों में जर्मनी की संसद से मंजूरी मिलने की उम्मीद है. इस योजना के जरिए जर्मनी दवा कंपनियों से और ज्यादा छूट हासिल करके स्वास्थ्य खर्च को कम करना चाहता है.

अमेरिका के दावे में कितना दम?

जर्मन दवा जार्डियंस का उदाहरण इस पूरे विवाद को समझने में मदद कर सकता है. इससे पता चलता है कि अलग-अलग देशों में एक ही दवा की कीमत में कितना अंतर हो सकता है. जार्डियंस में इस्तेमाल होने वाला एम्पाग्लिफ्लोजिन, जर्मनी की कंपनी बोएरिंगर इंगेलहाइम ने बनाया था. यह दुनिया की सबसे मशहूर दवाओं में से एक है, जो टाइप-2 डायबिटीज और दिल के दौरे के इलाज में काम आती है.

जर्मनी में  खुद से भुगतान करने वाले या निजी बीमा वाले मरीजों के लिए इस दवा की 30 गोलियों की कीमत लगभग 80 यूरो है. जबकि सरकारी स्वास्थ्य बीमा वाले मरीजों को इसके लिए अधिकतम 10 यूरो ही अपने जेब से देने पड़ते हैं.

बोएरिंगर इंगेलहाइम कंपनी के अमेरिकी सहयोगी के अनुसार, अमेरिका में बिना बीमा वाले या निजी बीमा वाले मरीजों को यह दवा लगभग 300 यूरो तक पड़ सकती है. कंपनी का कहना है कि कुछ फार्मेसी इससे भी ज्यादा कीमत वसूल कर सकती हैं.

हालांकि, अमेरिका में मेडिकेयर या मेडिकेड जैसी सरकारी योजनाओं के तहत दवा खरीदने वाले बुजुर्गों, दिव्यांगों, गंभीर रूप से बीमार और कम आय वाले मरीजों को यह दवा मुफ्त से 50 डॉलर तक में मिल सकती है.

तो क्या इसका मतलब यह है कि ट्रंप प्रशासन जिस बड़े कीमत अंतर की बात कर रहा है, वह सिर्फ उन अमेरिकी मरीजों पर लागू होता है, जिनके पास बीमा नहीं है या जिनका बीमा खर्च ज्यादा है?

जर्मनी का स्वास्थ्य बीमा कार्ड और यूरो के कुछ सिक्के
जर्मनी की सरकारी स्वास्थ्य बीमा कंपनियों की मजबूत मोलभाव की ताकत का फायदा सीधे मरीजों को मिलता हैतस्वीर: C. Ohde/Bildagentur-online/picture alliance

खैर इसके बावजूद ज्यादातर स्वास्थ्य अर्थशास्त्री इस बात से इनकार नहीं करेंगे कि महंगी और नई दवाओं के लिए अमेरिका में मरीज अक्सर जर्मनी के मरीजों से ज्यादा पैसे चुकाते हैं.

यह बात मार्च में जारी एक रिपोर्ट में सामने आई, जो जर्मन मीडिया संस्थानों की रिसर्च पर आधारित थी. रिपोर्ट के अनुसार, पेटेंट वाली नई दवाएं अमेरिका में जर्मनी की तुलना में ज्यादा महंगी होती है.

अध्ययन का नेतृत्व करने वाले जर्मन सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा नेटवर्क ‘एओके' से जुड़े रिसर्च संस्थान के हेल्थ एक्सपर्ट हेल्मुट श्रोडर ने कहा कि अलग-अलग देशों के दवा बाजारों में पारदर्शिता की कमी के कारण दवा कंपनियों के लिए ज्यादा कीमत वसूलना आसान हो जाता है.

कीमत में अंतर की वजह क्या?

कंसल्टिंग कंपनी डेलॉइट की फार्मेसी सेक्टर प्रमुख और पार्टनर सुजाने उलमन ने डीडब्ल्यू से कहा, "कीमतों में अंतर के पीछे स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े कई ढांचागत कारण हैं." उनके अनुसार, "इस अंतर की एक बड़ी वजह है कि जर्मनी जैसी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में बीमा प्राप्त मरीजों के लिए दवाओं की कीमतें केंद्र के स्तर पर तय की जाती है. इससे स्वास्थ्य बीमा कंपनियों के पास दवा कंपनियों से बेहतर कीमत तय करवाने की ताकत होती है. जबकि अमेरिका में बीमा कंपनियों को खुद अलग-अलग बातचीत करनी पड़ती है या फिर किसी एजेंट की मदद लेनी पड़ती है."

इसका मतलब हुआ कि दवा कंपनियों, बीमा कंपनियों और फार्मेसी के साथ मिलकर दवाओं की कीमतों पर बातचीत और नियंत्रण करने वाले बिचौलिये अधिक फायदे में रहते हैं. हालांकि, उनका काम मरीजों के लिए दवाओं का खर्च कम करना होता है, लेकिन इन पर अक्सर आरोप लगता है कि इनकी व्यवस्था इतनी जटिल और अपारदर्शी है कि आम लोगों के लिए इसे समझना मुश्किल हो जाता है और कई बार दवाओं की कीमतें कम होने के बजाए बढ़ जाती हैं.

सीवीएस फार्मेसी का स्टोर
अमेरिका में तीन सबसे बड़े पीबीएमस हैं. पहला, सीवीएस केयरमार्क यानी जो सीवीएस दवा दुकान और फार्मेसी चेन का हिस्सा हैं.तस्वीर: Ron Adar/SOPA/Zumapress/picture alliance

अमेरिका में तीन सबसे बड़े पीबीएमस हैं. पहला, सीवीएस केयरमार्क यानी जो सीवीएस दवा दुकान और फार्मेसी चेन का हिस्सा हैं. दूसरा, एक्स्प्रेस स्क्रिप्ट्स, जो जीवन और स्वास्थ्य बीमा कंपनी ‘सिगना'की सहायक कंपनी है और तीसरा, ऑप्टम आरएक्स, जो हेल्थकेयर कंपनी ‘यूनाइटेड हेल्थ' का हिस्सा है. इंडस्ट्री रिसर्च प्लेटफॉर्म ‘ड्रग चैनल्स'के आंकड़ों के अनुसार, ये तीनों कंपनियां मिलकर अमेरिका के लगभग 80 फीसदी दवा बाजार को नियंत्रित करती हैं.

अब अमेरिकी प्रशासन ने इन दवा कंपनियों पर भी कार्रवाई शुरू कर दी है. अमेरिकी फेडरल ट्रेड कमीशन ने बड़ी पीबीएम कंपनियों के खिलाफ जांच बैठा दी है. उनका कहना है कि इन कंपनियों की कुछ नीतियों की वजह से इंसुलिन जैसी दवाओं की कीमतें बेवजह बढ़ी हैं. फरवरी में फेडरल ट्रेड कमीशन ने एक्स्प्रेस स्क्रिप्ट्स के साथ एक समझौता किया, जिसके बाद कंपनी को अपने काम करने के तरीके में बड़े बदलाव करने पड़े.

सेब की संतरे से तुलना करना कितना सही?

साफ है कि अमेरिका और जर्मनी में दवाओं की कीमत तय करने का तरीका काफी अलग है.

विशेषज्ञ उलमन के अनुसार, "जर्मनी में दवा कंपनियों को नई दवाओं की कीमत तय करने से पहले यह साबित करना पड़ता है कि उनकी दवा पहले से मौजूद इलाज के मुकाबले मरीजों को ज्यादा फायदा देती है यानी नई दवाओं को बाजार में ऊंची कीमत पाने के लिए कड़ी जांच से गुजरना पड़ता है.”

जर्मनी की दवा कंपनियां सिर्फ अमेरिका की तरफ से ही दबाव नहीं झेल रही हैं. जर्मनी से होने वाले कुल दवा निर्यात का 20 फीसदी से भी अधिक हिस्सा अमेरिका जाता है. इसका मतलब है कि जर्मनी का फार्मा सेक्टर काफी हद तक अमेरिका के बाजार पर निर्भर है. इसके अलावा, जर्मनी की सरकार भी दवा कंपनियों पर दबाव बढ़ा रही है. बर्लिन की योजना है कि स्वास्थ्य सुधारों के लिए दवा कंपनियों से और ज्यादा छूट ली जाए ताकि सरकारी स्वास्थ्य खर्च कम किया जा सके.

ऐसे में अगर अमेरिका इस साल के अंत तक जर्मनी पर नए टैरिफ लगा देता है, तो जर्मन दवा कंपनियों की मुसीबत बढ़ सकती है. डेलॉइट की अप्रैल 2025 में आई रिपोर्ट के आधार पर विशेषज्ञ उलमन कहती हैं कि इस तरह के टैरिफ से फार्मा उद्योग को ‘भारी नुकसान' हो सकता है.

उनके अनुसार, "अगर अमेरिका अगले तीन से चार साल के लिए 10 से 35 फीसदी तक का टैरिफ लागू करता है, तो अमेरिका को जाने वाला जर्मनी का निर्यात 5 से 53 फीसदी तक घट सकता है. इससे जर्मनी के फार्मा उद्योग को लगभग 1.3 अरब से लेकर 13.4 अरब यूरो तक का नुकसान हो सकता है.”

बर्लिन में (फिलहाल) कोई चिंता नहीं 

फिलहाल ट्रंप प्रशासन की जांच को लेकर जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स के बयानों में ज्यादा कोई चिंता नहीं दिखाई दे रही है. उन्होंने हाल ही में कहा, "नई और आधुनिक दवाओं के लिए स्वास्थ्य बीमा के जरिए मिलने वाला भुगतान जर्मनी में संघीय स्तर पर तय किया जाता है.” उन्होंने आगे कहा, "अगर अमेरिका इस बारे में जानकारी चाहता है तो हम उसे देने के लिए बिल्कुल तैयार हैं.”

स्वास्थ्य मंत्री वार्केन ने भी अमेरिका की उम्मीदों पर पानी फेर दिया. उन्होंने कहा, "जर्मनी की स्वास्थ्य बीमा कंपनियां पहले से ही दबाव में हैं इसलिए दवाओं के लिए ज्यादा कीमत चुकाना काफी मुश्किल होगा.”

विशेषज्ञ उलमन ने कहा, "जर्मनी में बिकने वाली दवाओं पर कीमतों में छूट से जुड़े नियम पहले भी अनिवार्य थे और आगे भी इनके ऐसे ही बने रहने की संभावना है.”

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