10 साल बाद अरब क्रांति का क्या हाल | दुनिया | DW | 30.11.2020
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दुनिया

10 साल बाद अरब क्रांति का क्या हाल

दस साल पहले अरब वसंत क्रांति से मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में लोकतांत्रिक परिवर्तन की लहर की उम्मीद जगी थी. अरब वसंत की क्रांति मिस्र, सीरिया, लीबिया, यमन और कई दूसरे अरब देशों तक फैली और अरब क्रांति कहलायी.

अरब वसंत क्रांति से सिर्फ ट्यूनीशिया में बदलाव हुआ है, अन्य जगहों पर क्रांति बदलाव की जगह दमन, युद्ध और अराजकता में समाप्त हो गई. फिर भी, हाल के लोकप्रिय आंदोलनों ने लेबनान, इराक, अल्जीरिया और सूडान में शीर्ष नेताओं को उखाड़ फेंकने की प्रेरणा दी.

17 दिसंबर 2010 को एक युवा अपने आपको आग लगा लेता है इसके बाद पूरे ट्यूनीशिया में बेरोजगारी और गरीबी को लेकर विरोध प्रदर्शन भड़क जाते हैं. एक महीने से कम समय के भीतर करीब 23 सालों तक ट्यूनीशिया में तानाशाही राज चलाने वाले जिने अल आबेदीन बेन अली को गद्दी छोड़कर भागना पड़ता है. पूरे क्षेत्र में मजबूत तानाशाहों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन फैल जाता है. हालांकि ट्यूनीशिया में लोकतांत्रिक बदलाव की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना हुई वहीं देश में राजनीतिक अस्थिरता भी देखने को मिली.

Tunesien Tunis Proteste gegen islamische Regierung

2010 में ट्यूनीशिया में बेरोजगारी और गरीबी को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए थे.

लेकिन 2014 में राष्ट्रपति शक्तियों को सीमित करने वाला एक नया संविधान मील का पत्थर साबित हुआ, जिसमें बेजी काइद एस्सेबसी पहले लोकतांत्रिक रूप से देश के राष्ट्रपति चुने गए. इसके बाद के सालों में ट्यूनीशिया में तीन बड़े आतंकी हमले हुए, जिसकी जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ने ली, देश में जबकि सुरक्षा के इंतजाम बेहतर हुए हैं लेकिन हमले जारी हैं.

ट्यूनीशिया से शुरू हुई अरब वसंत की क्रांति के लपेटे में मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक भी आ गए और दशकों से सत्ता पर बने रहने वाले मुबारक को 18 दिनों के आंदोलन के बाद सत्ता छोड़ना पड़ा, 18 दिनों के आंदोलन में 850 लोगों की जान गई, मुबारक ने इसके बाद 11 फरवरी 2011 को सत्ता छोड़ दिया. मुबारक के हटने के बाद मोहम्मद मुर्सी लोकतांत्रिक रूप से चुने गए देश के पहले राष्ट्रपति थे. अल सीसी ने 2013 में जनता के चुने राष्ट्रपति मुर्सी के शासन के विरुद्ध हो रहे प्रदर्शनों के बीच उन्हें सैनिक विद्रोह में कुर्सी से हटाकर खुद देश के सर्वोच्च पद पर कब्जा कर लिया था.

यमन में अली अब्दुल्लाह सलेह का तीन दशकों का राज 2012 में विरोध प्रदर्शन के बाद समाप्त हुआ. लेकिन 2014 के बाद से ही देश में अस्थिरता है, हूथी विद्रोहियों ने देश पर हमला किया और बड़े भाग पर कब्जा जमा लिया, जिसमें राजधानी साना भी शामिल है. सऊदी अरब अपने सहयोगियों के साथ हूथी विद्रोहियों से लड़ाई लड़ रहा है. यमन संकट में लाखों लोग मारे जा चुके हैं जिनमें कई नागरिक भी हैं.

इसी तरह का विरोध प्रदर्शन सीरिया में भी हुआ था, बशर अल असद को सत्ता हटाने के लिए विरोध प्रदर्शन ने कई तरह के संकट का रूप ले लिया और लाखों लोग इस संकट के कारण मारे गए और इतने ही लोग विस्थापित हो गए. आज की तारीख में असद देश के 70 फीसदी हिस्से में कब्जा जमाए हुए हैं. असद को रूस, ईरान और लेबनान की सेना का समर्थन हासिल है.

एए/सीके (एएफपी)

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