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तस्वीर: AP

16 लाख किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से बढ़ रहा है सौर तूफान

आमिर अंसारी
१२ जुलाई २०२१

मौसमी वेबसाइट स्पेसवेदर.कॉम के मुताबिक सूर्य के वायुमंडल से उत्पन्न तूफान का पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के प्रभुत्व वाले अंतरिक्ष के क्षेत्र पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है.

https://www.dw.com/hi/powerful-solar-storm-approaching-earth-can-impact-gps-cell-phone-signals/a-58235297

एक भयंकर सौर तूफान 16 लाख किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पृथ्वी की ओर बढ़ रहा है. यह तूफान सूरज की सतह से उठा है. स्पेसवेदर.कॉम के मुताबिक धरती के चुंबकीय क्षेत्र पर तूफान का गहरा असर पड़ सकता है. इससे रात में आसमान रौशनी से जगमगा उठेगा. यह नजारा उत्तर या दक्षिणी ध्रुव पर दिखेगा.

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का अनुमान है कि यह तूफान 16 लाख किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार चल रहा है और आगे इसकी रफ्तार और अधिक बढ़ सकती है.

नासा ने कहा कि सौर तूफान से सैटेलाइट सिग्नल बाधित हो सकते हैं.

पृथ्वी पर सौर तूफान का प्रभाव

स्पेसवेदर.कॉम के मुताबिक सौर तूफान के कारण पृथ्वी के बाहरी वातावरण को गर्म हो सकता है, जिसका सीधा असर उपग्रहों पर पड़ सकता है. यह जीपीएस नेविगेशन, मोबाइल फोन सिग्नल और सैटेलाइट टीवी को प्रभावित कर सकता है. सौर तूफान के कारण बिजली लाइनों में करंट ज्यादा पैदा हो सकता है, जिससे ट्रांसफार्मर भी उड़ सकते हैं.

सबसे पहला सौर तूफान 1859 में रिकॉर्ड किया गया. 1972 में एक बड़े तूफान ने अमेरिका के मध्य पश्चिमी राज्यों में टेलीफोन लाइनों को अस्त व्यस्त कर दिया. 1989 में इसी तरह के तूफान से बिजली की लाइनें खराब हो गईं और कनाडा के क्यूबेक इलाके में परेशानी हुई. लेकिन सूरज के तूफानों के पृथ्वी पर असर के बारे में वैज्ञानिकों को पिछली दशकों में ही पता चला है.

सूरज के केंद्र में हाइड्रोजन कणों के बीच न्यूक्लियर रिएक्शन होता है जिससे वे हीलियम बन जाते हैं और सूरज में रोशनी इसी तरह पैदा होती है.

सोलर मिनिमम में सूरज काफी स्थिर रहता है और उसकी सतह पर तूफान नहीं आते. इसके बिल्कुल उलट मैक्सिमम के दौरान सूरज की सतह पर काले दाग बन जाते हैं जिसकी वजह से उसके चुंबकीय क्षेत्रों में भारी बदलाव आता है. नतीजतन सौर तूफान पैदा होते हैं.

सौर तूफान या फ्लेयर की जानकारी 1859 से ही है. उस वक्त ब्रिटिश खगोलविज्ञानी रिचर्ड कैरिंगटन ने एक सौर तूफान की खोज की. माना जाता है कि उस वक्त सूरज से जो ऊर्जा निकली, वह हिरोशिमा के 10 अरब एटम बमों के फटने के बराबर थी. उस वक्त इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ा क्योंकि धरती पर इतनी टेलीफोन लाइनें नहीं थीं. लेकिन आज स्थिति अलग हो सकती है क्योंकि लंबे वक्त तक बिजली न होने से काफी दिक्कत आ सकती है.

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