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समाजजर्मनी

जर्मनी में बेटिकट यात्रा करने पर जाना पड़ सकता है जेल

१३ अप्रैल २०२६

जर्मनी में बस या ट्रेन में बिना टिकट पकड़े जाने वाले को जेल भी जाना पड़ सकता है. जर्मन न्याय मंत्री चाहती हैं कि इस सख्त कानून को बदला जाए. लेकिन उनकी ही गठबंधन सरकार में शामिल एक दल इसके पक्ष में नहीं हैं. जानिए क्यों.

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बिना टिकट लिए यात्रा करने वाले कई लोग जेल पहुंचा दिए जाते हैं
बिना टिकट लिए यात्रा करने वाले कई लोग जेल पहुंचा दिए जाते हैंतस्वीर: Christoph Hardt/Panama Pictures/picture alliance

क्या जर्मनी में बस या ट्रेन में चढ़ने वाले हर इंसान को पता होता है कि बिना टिकट यात्रा करना एक आपराधिक जुर्म है? पकड़े जाने पर उन्हें 60 यूरो (करीब 6,000 रुपये) का जुर्माना देना पड़ सकता है? या यह कि जो लोग जुर्माना नहीं भरते, उन्हें जेल भी हो सकती है? 

जर्मनी में इस कड़ी सजा के लिए एक बड़ा ही मुश्किल शब्द इस्तेमाल होता है — 'एरसात्जफ्राईहाइट्सश्ट्राफे' (Ersatzfreiheitsstrafe). इसका सीधा सा मतलब है ‘जुर्माने के बदले जेल'. अगर कोई व्यक्ति बिना टिकट यात्रा करते पकड़ा जाता है, तो उसे एक साल तक की जेल हो सकती है. आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले कुछ सालों में करीब 7,000 से 9,000 लोग सिर्फ इसलिए जेल गए, क्योंकि वे बिना टिकट लिए बस या ट्रेन में यात्रा कर रहे थे.

जर्मनी की न्याय मंत्री श्टेफानी हुबिग अब इस नियम में बदलाव करना चाहती हैं. सेंटर-लेफ्ट सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) की नेता हुबिग ने एक दैनिक अखबार ‘नॉय ओस्नाब्रुकर जाइटुंग' को दिए इंटरव्यू में कहा कि वह बिना टिकट यात्रा करने को ‘अपराध की श्रेणी से बाहर' करना चाहती हैं और भविष्य में इसके लिए लोगों को जेल भेजने से बचना चाहेंगी. हुबिग ने सवालिया लहजे में कहा, "क्या जो लोग टिकट का खर्च नहीं उठा सकते और अंततः जेल पहुंच जाते हैं, सचमुच जेल भेजे जाने के लायक हैं?”

पब्लिक ट्रांसपोर्ट फ्री कर दें तो क्या होगा?

सिविल बनाम आपराधिक माला

हुबिग चाहती हैं कि बिना टिकट यात्रा करने को अब ‘आपराधिक मामला' न माना जाए, बल्कि इसे छोटा सा नियम तोड़ने (सिविल मामला) जैसा काम माना जाए. इसे आप ऐसे समझ सकते हैं, जैसे कि गलत जगह गाड़ी खड़ी करना. इससे यह होगा कि पकड़े जाने पर आपको जुर्माना तो देना होगा, लेकिन आपके नाम पर कोई पुलिस रिकॉर्ड नहीं बनेगा और न ही आपको जेल जाना पड़ेगा.

हुबिग पिछले साल हुए उस समझौते की याद दिला रही हैं जो इन पार्टियों (सीडीयू, सीएसयू और एसपीडी) ने मिलकर सरकार बनाने के लिए किया था. उस समझौते में साफ लिखा था कि नई सरकार इस बात की जांच करेगी कि कौन से कानून अब पुराने या बेकार हो चुके हैं और किन नियमों को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है.

हुबिग का मानना है कि बिना टिकट यात्रा करने पर जेल भेजने वाला कानून उन्हीं ‘फालतू' नियमों में आता है जिन्हें अब खत्म कर देना चाहिए. उनका कहना है कि जर्मनी की अदालतों और जेलों पर पहले से ही बहुत काम का बोझ है. अनुमान बताते हैं कि हर साल इन मामलों को निपटाने और लोगों को जेल में रखने पर करीब 20 करोड़ यूरो खर्च हो जाते हैं.

जब पब्लिक ट्रांसपोर्ट होने लगे सामर्थ्य से बाहर

हुबिग को अब जर्मनी बार एसोसिएशन ‘डीएवी' का भी साथ मिल गया है. इस संगठन से करीब 60,000 वकील जुड़े हुए हैं. डीएवी के कार्यकारी निदेशक स्वेन वालेंटोव्स्की ने दैनिक अखबार ‘नॉय ओस्नाब्रुकर जाइटुंग' से बातचीत में कहा, "बेटिकट यात्रा को अपराध मानने से समाज को क्या फायदा हो रहा है, यह कहना मुश्किल है. लेकिन इससे समाज का जो नुकसान हो रहा है, वह बहुत बड़ा है.”

पुलिस संगठन ने इस प्रस्ताव पर जताया विरोध

हुबिग ने ईस्टर की छुट्टियों के दौरान अपना यह प्रस्ताव सबके सामने रखा था और छुट्टियां खत्म होते ही सीडीयू/सीएसयू पार्टी ने उन्हें जवाब भी दे दिया. बर्लिन में पार्टी के संसदीय दल के उप नेता गुंटर क्रिंग्स ने कहा, "बेहतर होगा कि न्याय मंत्रालय अपना ध्यान आपराधिक कानून की असली समस्याओं पर केंद्रित करे.”

जर्मनी के पुलिस यूनियनों में से एक, ‘जीडीपी' ने भी इस बदलाव के खिलाफ चेतावनी दी है. इसके प्रवक्ता आंद्रेयास रॉसकोफ ने कहा कि हुबिग की योजना में सबसे बड़ा जोखिम यह है कि ‘बहुत से लोग इस बात की परवाह ही नहीं करेंगे कि उनके पास टिकट है या नहीं.'

इसका मतलब यह है कि हुबिग के प्रस्ताव का भी वही हाल हो सकता है जो उनसे पहले के मंत्री मार्को बुशमैन के प्रस्ताव का हुआ था. नव-उदारवादी पार्टी ‘एफडीपी' के नेता बुशमैन ने भी इसी तरह बदलाव की कोशिश की थी, लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई. अब ऐसा लग रहा है कि हुबिग की योजना भी उसी तरह ठंडे बस्ते में जा सकती है.

क्या कभी कारों की जगह ले सकते हैं पब्लिक ट्रांसपोर्ट?

पूर्व न्याय मंत्री बुशमैन ने 2023 में घोषणा की थी कि वे कम से कम इस बात पर विचार करेंगे कि इस अपराध को ‘आपराधिक मामले' की श्रेणी से हटाकर ‘सिविल' यानी एक छोटे उल्लंघन की श्रेणी में डाल दिया जाए. उसी समय ‘इन्फ्राटेस्ट-डिमैप' नाम की संस्था ने एक सर्वे किया था. उसमें सामने आया था कि जर्मनी के करीब दो-तिहाई नागरिक भी यही चाहते हैं कि बिना टिकट यात्रा करने वालों को अब जेल न भेजा जाए.

बिना टिकट यात्रा करने वालों को बचाने की पहल

सालों से ‘फ्राइहाइट्सफॉं' (आजादी फंड) नाम की एक संस्था इस कानून के खिलाफ लड़ रही है. आपको जानकर हैरानी होगी कि यह कानून असल में नाजी काल का है और 1935 में लागू किया गया था. यह संस्था लोगों के दान से चलती है. इसके अपने आंकड़ों के मुताबिक, इसने अब तक लगभग 1,700 लोगों का जुर्माना भरकर उन्हें जेल जाने से बचाया है या जेल से बाहर निकाला है.

संस्था के प्रवक्ता लेयो ईसेन ने मंगलवार को कहा, "जो हो रहा है वह वाकई चौंकाने वाला है. बिना टिकट यात्रा करने के जुर्म में जेल में डाले गए ज्यादातर लोगों को अदालत में कभी किसी अपराध का दोषी नहीं ठहराया गया. उन्हें सिर्फ एक छोटा सा फैसला सुनाया गया, जिसमें उन पर जुर्माना लगाया गया. जो लोग गरीबी की वजह से जुर्माना नहीं चुका पाए, उन्हें जेल जाना पड़ा. हर साल जर्मनी में करीब 9,000 लोग इस पागलपन का शिकार होते हैं.”

इस संस्था की वेबसाइट पर अब जर्मनी के ऐसे 13 शहरों के नाम हैं जिन्होंने एक बड़ा फैसला लिया है. फ्रैंकफर्ट, कोलोन, बॉन और लाइपजिग जैसे शहरों ने तय किया है कि वे बिना टिकट पकड़े गए लोगों के खिलाफ पुलिस केस (आपराधिक आरोप) दर्ज नहीं कराएंगे.

येंस थुराऊ, राजनीतिक संवाददाता, डीडब्ल्यू
येंस थुराऊ पर्यावरण और जलवायु नीति पर विशेष फोकस वाले राजनीतिक संवाददाता.@JensThurau