डिजिटल टेक्नोलॉजी पर्यावरण की दोस्त है या दुश्मन? | पर्यावरण | DW | 11.10.2021

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पर्यावरण

डिजिटल टेक्नोलॉजी पर्यावरण की दोस्त है या दुश्मन?

डिजिटल तकनीक का ही कमाल है कि इंटरनेट को लेकर दुनिया दीवानी हो चुकी है. पर इस दीवानेपन की कीमत हमारे पर्यावरण को चुकानी पड़ती है.

लेकिन पर्यावरण परिवर्तन से जुड़ी समस्याओं को हल करने में काम भी डिजिटल टेक्नोलॉजी ही आ रही है. तो यह सवाल बहुत से लोगों को परेशान कर रहा है कि डिजिटल तकनीक पर्यावरण की दोस्त है या दुश्मन. अगले महीने होने वाले यूएन के जलवायु सम्मेलन से पहले यह चर्चा और प्रासंगिक हो गई है.

ग्लासगो में होने वाले COP26 सम्मेलन के एजेंडे में जो बातें शामिल हैं, उनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए इस्तेमाल करना अहम है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जटिल गणनाओं पर आधारित होती है, जो बहुत ताकतवर कंप्यूटर करते हैं. इस प्रक्रिया में ऊर्जा खर्च होती है.

वीडियो देखें 03:29

आर्कटिक की बर्फ लगातार पिघल रही है

मैसाचुसेट्स यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या एआई के सिस्टम एक कार से पांच गुना ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करते हैं. लेकिन एआई ऐसी औद्योगिक प्रक्रियाएं बनाने में मददगार भी है, जिससे ऊर्जा की खपत घट रही है.

एआई का इस्तेमाल बढ़ाने पर जोर

पीडब्ल्यूसी नामक कंसल्टेंसी का अनुमान है कि एआई को अगर परिवहन और कृषि जैसे अर्थव्यवस्था के मुख्य क्षेत्रों में ज्यादा इस्तेमाल किया जाए तो पर्यावरण के लिए फायदेमंद होगा.

सेंटर फॉर एआई ऐंड क्लाइमेट के सह-संस्थापक पीटर क्लटन-ब्रॉक कहते हैं कि एआई जादू की छड़ी तो नहीं है जिससे पर्यावरण परिवर्तन को एक झटके में ठीक कर दिया जाए, लेकिन "कुछ बहुत दिलचस्प तरीके और ऐप्लिकेशन सामने आ रहे हैं.”

इन तरीकों में एआई को जंगलों के कटने की दर से लेकर बर्फ पिघलने की दर जैसी गणनाएं करने में इस्तेमाल किया जाए तो ज्यादा प्रभावशाली तरीके से पता लगाया जा सकता है कि किन क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा असर होगा.

इस तरह के बहुत से ऐप उपलब्ध हैं जो कार या विमान यात्रा जैसी गतिविधियों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन का पता लगा सकते हैं. खरीदार किसी भी प्रॉडक्ट को खरीदने से पहले पता लगा सकते हैं कि वह कितना ईको-फ्रेंडली है.

टेक कंपनियों के लिए एआई

पिछले हफ्ते गूगल ने अपने ऐप्स में ऐसे बदलाव किए हैं जो कार्बन उत्सर्जन घटाने में मदद करेंगे. मसलन, वाहन चालकों को दिखाया जाएगा कि कौन सा रास्ता सबसे कम ईंधन खर्च करेगा.

ईकोशिया सर्ज ईंजन तो अपने विज्ञापनों से होने वाला मुनाफा पेड़ लगाने पर खर्च कर रहा है और 13.5 करोड़ पेड़ अब तक लगाए जा चुके हैं.

वीडियो देखें 05:12

दम तोड़ती मानव सभ्यता की जन्मभूमि

सालों से यह डर रहा है कि जिन डेटा सेंटरों पर इंटरनेट निर्भर करता है, असल में वे ऊर्जा खपत की भट्ठी हैं. लेकिन पिछले साल साइंस पत्रिका में छपे एक अध्ययन ने ये डर गलत साबित कर दिए थे. 2018 तक ये डेटा सेंटर दुनिया की कुल बिजली का एक प्रतिशत इस्तेमाल कर रहे थे.

अब टेक कंपनियां बिजली का बिल कम करने की कोशिश कर रही हैं और उसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किया जा रहा है. मसलन, गूगल ने डेटा सेंटर को ठंडा रखने का अपना खर्च 40 प्रतिशत तक घटा लिया है.

वीके/एए (एएफपी)

 

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