दोनों तरफ से मारे जा रहे हैं इन देशों के लोग | पर्यावरण | DW | 08.10.2021
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पर्यावरण

दोनों तरफ से मारे जा रहे हैं इन देशों के लोग

पारिस्थितिकी और पर्यावरण के नुकसान के साथ साथ संघर्ष और टकराव झेल रहे देश एक किस्म के दुष्चक्र में फंसे हुए हैं. और दोनों समस्याएं एक दूसरे को हवा ही दे रही हैं. रही-सही कसर जलवायु परिवर्तन से पूरी हो जाती है.

सब-सहारा अफ्रीका, मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका में जारी संघर्ष और हिंसा के चलते 2020 में पांच करोड़ से ज्यादा लोगों को विस्थापित होना पड़ा

सब-सहारा अफ्रीका, मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका में जारी संघर्ष और हिंसा के चलते 2020 में पांच करोड़ से ज्यादा लोगों को विस्थापित होना पड़ा

पारिस्थितिकीय खतरे, चौतरफा संघर्ष और बड़े पैमाने पर पलायन का कारण बन रहे हैं. इस नुकसान को कम करने के लिए कड़ी कोशिशें किए जाने की जरूरत है. बृहस्पतिवार को प्रकाशित एक वैश्विक थिंक टैंक, आईईपी की रिपोर्ट में ये बात कही गई हैं. यह रिपोर्ट, ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कॉप 26) की आगामी बैठक से पहले सामने आई है जहां दुनिया भर के नेता जलवायु परिवर्तन से निपटने के ठोस उपायों पर सहमति कायम होने की उम्मीद जता रहे हैं.

थिंक टैंक, द इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस (आईईपी) ने पारिस्थितिकीय खतरों पर अपनी दूसरी रिपोर्ट में, पारिस्थितिकी के खतरों से जुड़े संघर्ष के लिहाज से सबसे संवनदेनशील इलाकों को चिन्हित करने के लिए, 178 देशों का आकलन किया. इसमें खाद्य सुरक्षा, पानी की किल्लत, जनसंख्या में द्रुत वृद्धि, तापमान की गड़बड़ी और प्राकृतिक विपदाओं की दर का मुआयना किया गया. फिर इस तमाम डाटा को सामाजिक-आर्थिक लचीलेपन के राष्ट्रीय उपायों, जैसे सुचारू ढंग से काम करती सरकारें, बिजनेस का पुख्ता अनुकूल माहौल और जन अधिकारों की स्वीकार्यता के साथ मिलाकर पारिस्थितिकीय जोखिम रिपोर्ट 2021 तैयार की गई.    

आईईपी के संस्थापक और कार्यकारी अध्यक्ष स्टीव किलेलिया ने डीडब्ल्यू को बताया, "हम लोग बेहतर ढंग से ये समझने की कोशिश कर रहे हैं कि पारिस्थितिकीय नुकसान और संघर्ष के बीच संबंध कितना गाढ़ा है." उनके मुताबिक "पारिस्थितिकीय नुकसान और संघर्ष अंतरंग तौर पर जुड़े हैं, कहने का मतलब बहुत ही अंतरंग तौर पर."

संघर्ष और पारिस्थितिकीय नुकसान का घेरा

इस रिसर्च में पाया गया कि संघर्ष और कुदरती आफतों, संसाधनों की किल्लत और तापमान में गड़बड़ी जैसे पारिस्थितिकी के विभिन्न नुकसानों की चपेट में आए हुए इलाके, एक किस्म के प्रतिक्रियात्मक घुमाव में घिर जाते हैं जहां हर मुद्दा दूसरे को मजबूत करता चलता है. 

किलेलिया कहते हैं, "संसाधन की कमी होती जा रही है, आप उन्हें हासिल करने के लिए लड़ते हैं, और ये संघर्ष समाज के तमाम बुनियादी ढांचे और प्रणालियों को कमजोर करता है और ये संसाधनों को ही और तबाह कर देता है, जिससे संघर्ष और भड़क उठते हैं." उनका कहना है कि, "आपके सामने फिर विभिन्न जातीय या धार्मिक समूह भी होते हैं, अतीत के संघर्षों से चली आ रही पुरानी अदावतें यानी झगड़े भी होते हैं, तो दोबारा उस दुष्चक्र में फिर से फंस जाना आसान होता है."

इस खतरनाक घेरे में फंस जाने वाला एक इलाका है साहेल. ये सहारा रेगिस्तान के दक्षिणी हिस्से में पड़ता है जहां व्यवस्थागत समस्याएं, जैसे नागरिक असंतोष, कमजोर संस्थान, भ्रष्टाचार, जनसंख्या वृद्धि और पर्याप्त भोजन और पानी की कमी, ये सब एक दूसरे को निगल जाने पर तुली हैं. आईईपी की रिसर्च ने पाया कि इन मुद्दों से संघर्ष की आशंका को ही नहीं, इलाके में कई इस्लामी गुटों की घुसपैठ को भी बढ़ावा मिला है. रिपोर्ट के मुताबिक इस्लामी आतंकी गुटों ने पानी और जमीन जैसे घटते सिकुड़ते संसाधनों को लेकर छिड़े स्थानीय विवादों और टकरावों का फायदा उठाकर और ताकत जुटाई है.

सबसे ज्यादा जोखिम वाले इलाके

यूरोप और मध्य एशिया (पश्चिम एशिया) और उत्तरी अफ्रीका के लिए आईईपी निदेशक सर्ज स्ट्रुबांट्स ने डीडब्ल्यू को बताया कि रिपोर्ट में 30 सबसे संवेदनशील देशों को चिन्हित किया गया है जो उच्च स्तर के पारिस्थितिकीय खतरे तो झेल रहे हैं लेकिन साथ ही बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, कमजोर संस्थाओं, कमजोर बिजनस माहौल और संसाधनों के कमजोर बंटवारे जैसी समस्याओं से भी ग्रस्त हैं.

वे तीन इलाके जो सामाजिक स्तर पर ढह जाने का सबसे ज्यादा खतरा झेल रहे हैं, वे हैं अफ्रीकी भूमि का सबसे पूर्वी विस्तार, हॉर्न ऑफ अफ्रीका और सालेह की पट्टी जो मॉरितियाना से सोमालिया तक फैली है. दूसरा इलाका दक्षिण अफ्रीकी पट्टी का है जो अंगोला से मैडागास्कर तक फैला है और तीसरा इलाका मध्य पूर्वी और मध्य एशिया की पट्टी का है जो सीरिया से पाकिस्तान तक जाती है.

वीडियो देखें 05:12

दम तोड़ती मानव सभ्यता की जन्मभूमि

इन देशों में आगामी संघर्षों का खतरा तो बना ही रहता है वहां से बड़े पैमाने पर पलायन की आशंका भी बनी रहती है. सब-सहारा अफ्रीका, मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका में जारी संघर्ष और हिंसा के चलते 2020 में पांच करोड़ से ज्यादा लोगों को विस्थापित होना पड़ा. स्ट्रुबांट्स कहते हैं, "आज करीब 1.26 अरब लोग इन 30 देशों में रहते हैं और इसीलिए हमारा कहना है कि वे संघर्ष के साथ साथ पर्यावरणीय नुकसान से होने वाले विस्थापन, दोनों की चपेट में हैं."

क्या जलवायु परिवर्तन एक वजह है? 

रिपोर्ट के मुताबिक यूं तो ऐसे कई पारिस्थितिकीय खतरे हैं जो जलवायु परिवर्तन के बिना भी संभव हैं जैसे कि पानी और खाने की कमी. लेकिन जलवायु परिवर्तन के चलते वे अवश्यंभावी रूप से और भड़क उठते हैं, जिनके चलते देश नये और गहरे संघर्षों में फंस सकते हैं और लोगों को अपने घरों से बेदखल करते रह सकते हैं. जलवायु परिवर्तन से 2050 तक अकेले सब-सहारा अफ्रीकी क्षेत्र में होने वाले विस्थापन के अलावा और आठ करोड़ 60 लाख लोगों के विस्थापित होने की आशंका जताई गई है.

सबसे ज्यादा जोखिम वाले देशों का हवाला देते हुए स्ट्रुबांट्स का कहना है, "जलवायु परिवर्तन निश्चित रूप से उन खास देशों में पारिस्थितिकीय खतरों और उनके प्रभावों को भड़काता है."

उपसाला यूनिवर्सिटी के शांति और संघर्ष शोध विभाग से जुड़ीं नीना फॉन उएक्सकुल ने डीडब्ल्यू को बताया कि कुछ इलाके जलवायु परिवर्तन की वजह से संघर्ष की जद में आ जाते हैं. नीना आईईपी रिसर्च का हिस्सा नहीं थीं. वह कहती हैं, "वर्तमान समाजों में संघर्ष के खतरों पर जलवायु का कुल प्रभाव तो दूसरे कारणों की तुलना में कमतर ही माना जाता है लेकिन दुनिया के कुछ इलाके वाकई इतने संवेदनशील और असहाय हैं जहां जलवायु से जुड़े कारणों को आतंरिक सुरक्षा के खतरों में तब्दील होते देर नहीं लगती."

"शोध बताते हैं कि खासकर वे इलाके जहां संघर्ष जारी हैं, राजनीतिक रूप से पीछे धकेले गए लोग हैं और कृषि पर आर्थिक निर्भरता है, वहां जलवायु से जुड़े नुकसानों के साथ साथ आगामी संघर्षों का जोखिम भी बढ़ जाता है."

और विकसित देशों का क्या हाल है?  

रिपोर्ट के मुताबिक यूरोपीय देशों और दूसरे उच्च विकसित क्षेत्रों में प्राकृतिक विपदाओं और जलवायु परिवर्तन से खतरा तो बना हुआ है लेकिन पारिस्थितिकीय खतरों से पैदा होने वाली बदतर समस्याओं से वे बचे हुए हैं. दुरुस्त प्रशासन, मजबूत सामाजिक सुरक्षा, संपदा और दूसरे कारणों की बदौलत से ऐसा हो पाया है.

वीडियो देखें 03:29

आर्कटिक की बर्फ लगातार पिघल रही है

बेल्जियम और जर्मनी में आई हाल की बाढ़ का जिक्र करते हुए स्ट्रुबांट्स कहते है, "हां, असर तो है, लेकिन दोनों देशों में पुनर्निर्माण शुरू हो चुका है. चुनिंदा लोग ही विस्थापित हुए थे, उनका भरपूर ख्याल रखा गया था और वे अब अपने गांवों को लौट भी सकते हैं." उनके मुताबिक, "दुनिया के दूसरे हिस्सों में ऐसा नहीं है. वहां न सिर्फ असर बहुत व्यापक होता है बल्कि आपको एक-दो नहीं कई किस्म के खतरों का भी सामना करना पड़ जाता है."

उपसाला यूनिवर्सिटी की फॉन उएक्सकुल कहती हैं कि ये देश यूं तो बड़े पैमाने पर जोखिमों से दूर हैं लेकिन नागरिक असंतोष और संभावित पलायन जैसी समस्याओं से बरी नहीं हैं. वह कहती हैं, "अपेक्षाकृत समृद्ध और लचीले देशों में बड़े पैमाने की हिंसा नहीं देखी जानी चाहिए है."

उनका प्रस्तावित समाधान क्या है? 

आईईपी का कहना है कि जलवायु परिवर्तन को सीमित कर देने भर से संघर्षों पर पारिस्थितिकीय खतरे पूरी तरह खत्म नहीं किए जा सकते हैं. उसने सरकारों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से स्वास्थ्य, भोजन, पानी, शरणार्थी राहत, वित्त, कृषि, विकास और दूसरे कार्यों को जोड़ने वाले ढांचों को एकीकृत करने का आह्वान किया है. उसका कहना है कि राहत और विकास एजेंसियों की अलग-थलग प्रकृति- प्रणालीगत और क्षेत्रीय मुद्दों पर एक मुस्तैद प्रतिक्रिया से रोकती है.

आईईपी प्रमुख स्टीव किलेलिया कहते हैं, "तमाम मौजूदा अलग अलग एजेंसियों से आप लोगों को लें और ऐसी चीज तैयार करें जो एकीकृत हो और अपेक्षाकृत छोटे स्तर पर हो. अगर आप प्रणालीगत हस्तक्षेपों पर ध्यान देते हैं तो आपको और बेहतर नतीजे मिलेंगे, ज्यादा उत्पादकता हासिल होगी और संभवतः समस्याओं से जुड़े सटीक समाधान भी मिल सकेंगे."

वीडियो देखें 07:05

जलवायु को बचाने में नाकाम मैर्केल

रिपोर्टः एलस्टेयर वॉल्श

 

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