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अहमदिया समुदाय
सहर कलसून कहती हैं कि अब उन्हें बेहतर की कोई उम्मीद नहीं दिखतीतस्वीर: Luisa von Richthofen/DW
समाज

पाकिस्तान में मौत अहमदिया लोगों का इंतजार कर रही है?

१७ मार्च २०२१

जर्मनी में रहने वाले बहुत से अहमदिया मुसलमानों पर पाकिस्तान प्रत्यर्पण की तलवार लटक रही है. कई देश इन लोगों की सुरक्षा पर जोर दे रहे हैं क्योंकि पाकिस्तान में उनका दमन होता है. तो जर्मनी से उन्हें क्यों भेजा जा रहा है?

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अहमद परिवार अनिश्चितिता में जी रहा है. उनके पास जर्मनी में रहने का परमिट नहीं है. पिता क्वॉलिफाइड इंजीनियर हैं लेकिन उन्हें काम करने की इजाजत नहीं है. वे अभी एक शरणार्थी शिविर में रह रहे हैं लेकिन उन्हें डर सता रहा है कि कभी भी उनके प्रत्यर्पण के आदेश आ सकते हैं. उन्हें हाल में पता चला कि 17 मार्च को बड़ी संख्या में लोगों को प्रत्यर्पित किया जा सकता है और उन्हें फ्लाइट पर बिठा कर रवाना किया जा सकता है. लेकिन पाकिस्तान में उनकी जिंदगी खतरे में होगी.

दूसरे दर्जे के नागरिक

अहमद परिवार अहमदिया मुस्लिम समुदाय का हिस्सा है. इस समुदाय की शुरुआत 19वीं सदी में भारत में हुई थी. मिर्जा गुलाम अहमद इस समुदाय के संस्थापक थे. पाकिस्तान में अहमदिया लोगों को अपने धार्मिक विश्वास के कारण अकसर निशाना बनाया जाता है. ये लोग गुलाम अहमद मिर्जा को भी पैगंबर बताते हैं जबकि रवायती इस्लाम में मान्यता है कि पैगंबर मोहम्मद के बाद कोई दूसरा पैगंबर नहीं हुआ. अहमदिया लोग खुद को इस्लाम का हिस्सा मानते हैं और पाकिस्तान में उनकी आबादी लगभग 40 लाख है. लेकिन उनके खिलाफ वहां दशकों से नफरत से प्रेरित मुहिम चल रही है.

जर्मनी के थुरिंजिया राज्य में अहमदिया समुदाय के प्रवक्ता सुलेमान मलिक कहते हैं, "अहमदिया लोगों के बहिष्कार को संविधान में संरक्षित किया गया है." पाकिस्तान की संसद ने अहमदिया लोगों को 1974 में गैर मुसलमान घोषित कर दिया. इसके अनुसार वे खुद को मुसलमान नहीं कह सकते हैं. वे अपने प्रार्थना स्थल को मस्जिद नहीं कह सकते हैं, ना ही अजान शब्द का इस्तेमाल कर सकते हैं.

पाकिस्तान के बेहद कड़े ईशनिंदा कानून के तहत अहमदिया लोगों को "अस्सलाम वालेकुम" कहने पर ही मौत की सजा हो सकती है. गैर मुसलमान होने के नाते पाकिस्तान में अहमदिया लोगों को दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता है.

ये भी जानिए: कौन हैं ये अहमदिया मुसलमान

संरक्षण की जरूरत

अहमद और उनकी पत्नी सहर कलसून ने भी पाकिस्तान में मुश्किल हालात का सामना किया है. कलसून कहती हैं कि उन्हें स्कूल बदलना पड़ा था और उन्हें "काफिर" कहा जाता था. इस वजह से वह अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाईं. जब उनके चचेरे भाई की हत्या कर दी गई तो उनके परिवार से पाकिस्तान छोड़ने का फैसला किया. अपनी दोनों बेटियों को अच्छा भविष्य देने के लिए उन्होंने जर्मनी आने का फैसला किया.

एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, पाकिस्तानी अधिकारी अहमदिया समुदाय के साथ होने वाली हिंसा को अनदेखा कर रहे हैं, बल्कि कई मामलों में तो वे हमलावरों का साथ देते हैं. संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी यूएनएचसीआर का कहना है कि पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय एक प्रताड़ित अल्पसंख्यक समुदाय है जिसके संरक्षण की जरूरत है. इसी बात को ध्यान रखते हुए ब्रिटेन, अमेरिका और नीदरलैंड में लंबे समय से रहने वाले अहमदिया लोगों को प्रत्यर्पित नहीं किया गया है. लेकिन जर्मनी के मामले में ऐसा नहीं है.

अलग नियम

जर्मनी में लगभग 535 अहमदिया लोग रहते हैं जिन्हें पाकिस्तान प्रत्यर्पित किया जा सकता है. जर्मन गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने डीडब्ल्यू को बताया कि पाकिस्तान में इस समुदाय से संबंध रखना अपराध नहीं है. इसीलिए जर्मनी में अहमदिया समुदाय के लोगों के मामलों को व्यक्तिगत आधार पर देखा जा रहा है.

जर्मन प्रशासनिक अदालतों ने भी अकसर पाकिस्तान में अहमदिया लोगों के लिए राबवाह जैसी सुरक्षित जगहों का जिक्र किया है, जहां देश में सबसे बड़ा अहमदिया समुदाय रहता है. लेकिन अहमदिया समुदाय के प्रवक्ता मलिक कहते हैं कि पाकिस्तान में उनके समुदाय के लोग कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं.

 Deutschland Ahmadi Gemeinde in Leipzig  Abschiebung
मलिक कहते हैं कि पाकिस्तान अहमदिया लोगों के लिए सुरक्षित नहीं हैतस्वीर: Luisa von Richthofen/DW

मलिक और सेक्सनी की रेफ्यूजी काउंसिल का मानना है कि प्रत्यर्पण का फैसला राजनीति से प्रेरित है. महामारी की वजह से इस पर अस्थायी रोक रही, लेकिन अब काउंसिल का दावा है कि सरकार इस साल होने वाले आम चुनावों के मद्देनजर दिखाना चाहती है कि उसकी माइग्रेशन नीति सख्त है. मलिक कहते हैं, "मुझे लगता है कि जानकारी और राजनीति इच्छा शक्ति की कमी है. इस बात से उन लोगों का नुकसान होगा जो यहां रह रहे हैं और जिन्हें प्रत्यर्पित किया जाएगा. इन लोगों के लिए यह जिंदगी और मौत का सवाल है."

'जाएं तो जाएं कहां?'

अहमद परिवार को अपने भविष्य को लेकर ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं. नम आंखों से कलसून कहती हैं, "जर्मन लोग पूरी आजादी के साथ रहते हैं, वे नहीं समझ पाएंगे. लेकिन जब आप पाकिस्तान से यहां आते हैं तो अपना सब कुछ वहां छोड़कर आते हैं. बस अपना दर्द अपने साथ लेकर चलते हो." वह कहती हैं, "किसी देश को छोड़ना आसान नहीं होता. जब आप यहां आते हैं तो आपसे कहा जाता है कि आप यहां नहीं रह सकते. लेकिन हम लोग कहां जाएं?"

उनके पति को डर है कि पाकिस्तान वापस जाने पर उन्हें प्रताड़ित किया जाएगा जैसा कि 2005 में उनके चाचा के साथ हुआ था जो ब्रिटेन से लौटकर पाकिस्तान गए थे. तभी गांव में एक अफवाह उड़ी कि वह एक विदेशी जासूस हैं और फिर एक भीड़ ने उन्हें पीट पीट कर मार डाला. अहमद परिवार ने सारे कानून विकल्पों को आजमा कर देख लिया है. मलिक की तरफ से सेक्सनी राज्य में दायर की गई याचिका भी खारिज हो गई. अब बस वे प्रत्यर्पण नोटिस का इंतजार कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि वे जर्मनी में आजादी के आखिरी पलों को जी रहे हैं.

रिपोर्ट: लुइजा फॉन रिष्टहोफेन/एके

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अहमद परिवार वापस पाकिस्तान नहीं जाना चाहतातस्वीर: Luisa von Richthofen/DW
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