आसान नहीं है पूर्वोत्तर भारत में वन्यजीव संरक्षण की कवायद | पर्यावरण | DW | 23.04.2022

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पर्यावरण

आसान नहीं है पूर्वोत्तर भारत में वन्यजीव संरक्षण की कवायद

भारत का पूर्वोत्तर इलाका प्राकृतिक संसाधनों और जंगल से भरपूर है. इसी वजह से इलाके में वन्यजीवों की तादाद भी खासी है. लेकिन हाल के वर्षों में वन क्षेत्र घटा है.

पूर्वोत्तर भारत में घना जंगल

पूर्वोत्तर भारत में घना जंगल

वन्यजीव संरक्षण अभियानों के प्रति उदासीनता और स्थानीय परंपराओं के कारण इनमें से कई जीवों के विलुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है. पूर्वोत्तर भारत में जंगल 1.70 लाख वर्ग किमी से ज्यादा बड़े इलाके में फैला है. देश के भौगोलिक क्षेत्रफल में पूर्वोत्तर का हिस्सा महज 7.98 फीसदी होने के बावजूद कुल वनक्षेत्र का लगभग एक-चौथाई इसी इलाके में है. यह इलाका जैव-विविधता के मामले में दुनिया के 17 शीर्ष स्थानों में शुमार है. इससे वन और वन्यजीवों के लिहाज से इलाके की अहमियत समझी जा सकती है. लेकिन इलाके में वन्यजीवों के शिकार की घटनाओं ने पशुप्रेमियों और पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है.

नेचर पत्रिका ने हाल में छपे एक लेख में संयुक्त राष्ट्र के हवाले कहा गया है कि दुनिया भर में वनस्पतियों और जीवों की करीब दस लाख प्रजातियां खतरे में हैं. इसके मुताबिक, वन्यजीवों के संरक्षण के लिए चलाई जा रही योजनाओं से दुर्लभ श्रेणी के जीवों के संरक्षण में खास मदद नहीं मिली है. पूर्वोत्तर भारत के मामले में भी यह बात काफी हद तक खरी उतरती है. केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से बनाए गए तमाम कानूनों और अभियानों के बावजूद इलाके में जंगल भी घट रहे हैं और उसके साथ वन्यजीव पर भी खतरा बढ़ रहा है. नागालैंड में अमूर बाज के संरक्षण या फिर असम के काजीरंगा नेशनल पार्क में एक सींग वाले गैंडों के संरक्षण को अपवाद माना जा सकता है. लेकिन बाकी इलाकों में तस्वीर इतनी उजली नहीं है.

दबाव में वन संपदा

दबाव में वन संपदा

भारत में वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, वन संरक्षण अधिनियम, राष्ट्रीय वन्य जीव कार्य योजना, टाइगर परियोजना,'राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य, जैव-क्षेत्रीय रिजर्व कार्यक्रम जैसे तमाम अभियान चल रहे हैं. इन योजनाओं के कारण कुछ प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाया जा सका है. इसमें शेर, बब्बर शेर, एक सींग वाला गैंडा, हाथी और मगरमच्छ शामिल हैं.

एक सींग वाले गैंडों के संरक्षण में कामयाबी

अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) की संकटग्रस्त प्रजातियों की लाल सूची के आंकड़ों के मुताबिक वन्यजीवों और वनस्पतियों की 8,400 से अधिक प्रजातियां पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है. इसमें 30 हजार से ज्यादा प्रजातियों को लुप्तप्राय माना गया है. इन सूची के मुताबिक, देश की 239 जीवों की प्रजातियों को लुप्तप्राय के रूप में वर्गीकृत किया गया है इनमें स्तनधारियों की 45, पक्षियों की 23, सरीसृप की 18, उभयचरों की 39 और मछलियों की 114 प्रजातियां शामिल हैं. भारत में 733 संरक्षित क्षेत्रों का एक नेटवर्क है. इनमें जिसमें 103 राष्ट्रीय उद्यान, 537 वन्यजीव अभ्यारण्य, 67 संरक्षण रिजर्व और 26 सामुदायिक रिजर्व शामिल हैं. यह देश के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 4.89 फीसदी है.

वनों पर निर्भर हैं पूर्वोत्तर के कई समुदाय

वनों पर निर्भर हैं पूर्वोत्तर के कई समुदाय

परंपरा भी बाधक

वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि पूर्वोत्तर भारत में वन्यजीवों के संरक्षण में स्थानीय परंपराएं सबसे बड़ी बाधा हैं. इलाके में आदिवासियों की करीब 145 प्रजातियां रहती हैं. इनमें से ज्यादा प्रजातियों में जंगली जानवरों के शिकार की परंपरा सदियों पुरानी है. आदिवासी इलाकों में रहने वाले लोग जंगल पर अपना पारंपरिक अधिकार मानते हैं. तमाम कानूनों के बावजूद इन तबकों के लोग अपनी परंपरा के नाम पर वन्यजीवों का शिकार करते रहते हैं. इस मामले में या तो जागरुकता अभियानों की कमी है या फिर ऐसे अभियान स्थानीय जनजातियों पर बेअसर ही साबित हुए हैं. इलाके में पाए जाने वाले दुर्लभ प्रजाति के कुछ जीवों या उनके विशेष अंगों की विदेशों में भारी मांग ने भी शिकार को बढ़ावा दिया है.

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आजीविका के विकल्प नहीं होने के कारण भी वन्यजीवों का शिकार स्थानीय लोगों के लिए फायदे का धंधा बन गया है. मिसाल के तौर पर हिरण की सुगंधित ग्रंथि का इस्तेमाल इत्र बनाने में किया जाता है और विदेशों में इसकी भारी मांग है. इसकी कीमत 10 हजार रुपये प्रति दस ग्राम तक है. इसके अलावा काले भालू के पित्ताशय से पित्त निकाल कर पारंपरिक चीनी दवाओं के निर्माण में उसका इस्तेमाल किया जाता है. इसकी कीमत पांच लाख रुपये प्रति किलो तक है. असम में एक सींग वाले गैंडे अपनी सींग के कारण ही शिकारियों के हत्थे चढ़ते रहे हैं. माना जाता है कि उनकी सींग से यौनवर्धक दवाएं बनती हैं.

वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. नरेश कुमार गोस्वामी बताते हैं, "इलाके की कई प्रजातियों का खान-पान और संस्कृति भी शिकार को बढ़ावा देती है. नागा तबके के लोगों की मान्यता है कि जंगली पशुओं का मांस घरेलू पशुओं के मुकाबले ज्यादा स्वादिष्ट होता है. यही वजह है कि लोग उसके लिए पांच गुनी ज्यादा कीमत देने से भी नहीं हिचकते.”

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शिकार के लिए इस्तेमाल होते हैं कई किस्म के औजार और हथियार

पूर्वोत्तर की कई जनजातियों में शिकार मनोरंजन का साधन भी है. अरुणाचल प्रदेश की मिशमी समेत कुछ जनजातियों के घरों में जंगली जानवरों के सिरों, हड्डियों और दूसरे अंगों को सजावट की वस्तुओं के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. यह कहना ज्यादा सही होगा कि शिकार ज्यादातर जनजातियों में रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा है.

वन्यजीव संरक्षण कार्यकर्ता मोहन कुमार सिंह कहते हैं, "सरकार के लिए वन्यजीवों के संरक्षण में उन स्थानीय प्रजातियों को शामिल करना एक गंभीर चुनौती है जिनमें सदियों से शिकार की परंपरा रही है. इसके लिए सरकार को स्थानीय संगठनों के साथ मिल कर कोई ठोस रास्ता निकालना होगा. स्थानीय लोगों को शामिल किए बिना कोई संरक्षण अभियान कामयाब नहीं हो सकता. इस अभियान में वन्यजीव और पर्यावरण कार्यकर्ताओं को भी साथ लेना होगा.”

अमूर बाज का पेड़

अमूर बाज के पेड़

अमूर बाज के संरक्षण में कामयाबी

दिलचस्प बात यह है कि नागालैंड ने ही अमूर बाज के संरक्षण के मामले में रिकॉर्ड बनाया है. राज्य के मोन जिले में प्रवासी पक्षी अमूर फाल्कन की सुरक्षा के लिए एक संयुक्त कार्यबल का गठन किया है. अमूर फाल्कन बाज की दुर्लभ प्रजाति है. यह पक्षी मूल रूप से रूस के साइबेरिया क्षेत्र अमूर के हैं. नवंबर में बर्फबारी से ठीक पहले अनुकूल मौसम और भोजन की तलाश में ये अमूर से पलायन करके चीन, भारत होते हुए करीब 22 हजार किलोमीटर की यात्रा तय करके अफ्रीका निकल जाते हैं जहां उस समय गर्म मौसम रहता है. हर साल ठंड के मौसम करीब डेढ़ लाख अमूर फाल्कन पक्षी नागालैंड आते हैं.

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पहले मोन जिले की दोयांग झील के आसपास के गावों के लोग इन पक्षियों को मार दिया करते थे. वर्ष 2012 में 12 हजार से अधिक बाजों के शिकार की खबरें सामने आने के बाद विवाद बढ़ने पर केंद्रीय वन व पर्यावरण मंत्रालय ने इस पक्षी पर अध्ययन की जिम्मेदारी भारतीय वन्यजीव संस्थान को सौंपी. इसके बाद अक्टूबर, 2012 में इनके संरक्षण की कवायद शुरू हुई. स्थानीय स्तर पर भी इन्हें बचाने की मुहिम चलाई गई है.

भोजन और दवाओं के लिए वन जरूरी हैं

भोजन और दवाओं के लिए वन जरूरी हैं

तो क्या इसी तर्ज पर इलाके के दूसरे राज्यों में वन्यजीव संरक्षण योजनाओं को कामयाबी नहीं दिलाई जा सकती? इलाके के एक वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. धीरेन बरूआ कहते हैं, "यह संभव है. लेकिन इसके लिए बड़े पैमाने पर जागरुकता अभियान चलाना जरूरी है ताकि दुर्लभ जीवों के शिकार पर पूरी तरह रोक लगाई जा सके. परंपरा के नाम पर शिकार करने वाले आदिवासी समाज से इस मिथक को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे. स्थानीय लोगों के सहयोग के बिना ऐसी कोई संरक्षण योजना कामयाब नहीं हो सकती.” वह कहते हैं कि नागालैंड में अमूर बाज के संरक्षण की कहानी इस मामले में एक मिसाल और पथ-प्रदर्शक बन सकती है. लेकिन वोट बैंक की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों को इसके लिए ठोस पहल करनी होगी और सरकार को भी कड़ी इच्छाशक्ति दिखानी होगी.

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