साल दर साल बढ़ रही है बाढ़ की विनाशलीला | भारत | DW | 30.07.2019
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भारत

साल दर साल बढ़ रही है बाढ़ की विनाशलीला

भारत में बाढ़, तूफान और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं की वजह से बीते तीन वर्षों के दौरान रोजाना औसतन पांच लोगों की मौत हुई है.

18 जुलाई तक के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस दौरान 6,585 लोगों की मौत हो चुकी है. अकेले इसी साल बाढ़ के चलते बिहार और असम में मरने वालों की तादाद 200 के पार पहुंच गई है. बाढ़ का पानी उतरने के बाद लोगों को विभिन्न बीमारियों से जूझना पड़ता है और उसके बाद जीवन धीरे-धीरे पटरी पर लौटने लगता है. जब तक जनजीवन पूरी तरह सामान्य हो, तब तक अगले साल की बाढ़ दरवाजों पर दस्तक देने लगती है.

बीते तीन वर्षों के दौरान बाढ़ और इससे जुड़ी घटनाओं मसलन तूफान और भूस्खलन की वजह से रोजाना औसतन पांच लोगों की मौत हुई है. यह आंकड़ा सरकारी है. गैर-सरकारी आंकड़ों की मानें तो यह तादाद कई गुनी ज्यादा हो सकती है. बीते साल विश्व बैंक ने अपने एक ताजा अध्ययन के हवाले से कहा था कि दुनियाभर में बाढ़ से होने वाली मौतों में से 20 फीसदी भारत में ही होती हैं. केरल में बीते साल आई भयावह बाढ़ में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 504 लोगों की मौत हुई थी.

सालाना त्रासदी बनी बाढ़

बिहार और पूर्वोत्तर में असम समेत ज्यादातर राज्यों को हर साल बाढ़ की मार से जान-माल का भारी नुकसान होता है. इसके अलावा लाखों हेक्टेयर में खड़ी फसलें नष्ट हो जाती हैं. महज कुछ हफ्तों की बाढ़ राज्य और खासकर संबंधित इलाकों की अर्थव्यवस्था को भी अपने साथ बहा ले जाती है. लेकिन बावजूद इसके साल दर साल आने वाली इस बाढ़ पर अंकुश लगाने या बाढ़ से पहले जान-माल का नुकसान रोकने की खातिर एहतियाती उपाय करने के मामले में राज्य और केंद्र सरकार की उदासीनता जगजाहिर है. कई मामलों में तो नेताओं के लिए बाढ़ वरदान की तरह आती है, जिसमें राहत बांटने के नाम पर वह अपनी जेबें गर्म करते रहते हैं.

हर साल मानसून आने से पहले केंद्र व राज्य सरकारें भी बाढ़ से निपटने के लिए तैयार होने का दावा करती है. लेकिन मानसून का पहला दौर ही सरकारी दावों की पोल खोलते हुए कई राज्यों को डुबो देता है. देश के कुछ इलाके तो ऐसे हैं जहां हर साल बाढ़ आना लगभग तय होता है. यह बात राज्य सरकारें भी जानती हैं और केंद्र सरकार भी.

वैसे, तमाम राज्यों में आपदा प्रबंधन बल का गठन कर दिया गया है. लेकिन उसकी भूमिका बाढ़ से हुए नुकसान के बाद शुरू होती है. अब तक किसी भी सरकार ने ऐसी किसी ठोस बाढ़ नियंत्रण योजना बनाने की पहल नहीं की है जिससे बाढ़ आने से पहले ही हर साल डूबने वाले इलाके से लोगों और जानवरों को निकाल कर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जा सके. इससे बाढ़ से होने वाली मौतों को काफी हद तक कम किया जा सकता है. 1953 में एक राष्ट्रीय बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया गया था. इस पर अब तक अरबों रुपये खर्च करने के बावजूद अब तक नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा है.

क्यों आती है भारत के इन राज्यों में बार बार बाढ़

बिहार और असम की बाढ़

हर साल की तरह इस साल भी मानसून की पहली मार से ही खासकर असम के लगभग तीस जिले और पूरा उत्तर बिहार बेजार है. बिहार में मरने वालों का आंकड़ा जहां 127 तक पहुंच गया है, वहीं असम में भी यह 85 पहुंच गया है. असम में कई दौर में बाढ़ आती है. इसके अलावा संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा है और हजारों हेक्टेयर खेतों में खड़ी फसलें नष्ट हो गई हैं.

इस प्राकृतिक आपदा की वजह से विस्थापित होने वालों की तादाद तो लाखों में है. राज्य में कई लोगों के नागरिकता संबंधी दस्तावेज बाढ़ में डूब जाने की वजह से अब उनका भविष्य भी अधर में लटक गया है. नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) की कवायद में जरूरी दस्तावेजों के बिना उनकी नागरिकता छिन जाने का खतरा मंडराने लगा है. धुबड़ी जिले में एक राहत शिविर में रह रहे अमानुल्ला बताते हैं, "बाढ़ से तो फिर भी बचा जा सकता है. लेकिन नागरिकता के दस्तावेज नहीं रहे तो हम जीते जी मर जाएंगे.”

असम की ज्यादातर नदियां अरुणाचल प्रदेश से निकलती है. वहां लगातार भारी बारिश की वजह से यह नदियां असम के मैदानी इलाकों में पहुंच कर कहर बरपाने लगती हैं. अपने एक सींग वाले गैंडों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर काजीरंगा नेशनल पार्क का ज्यादातर हिस्सा हर साल की तरह इस साल भी बाढ़ की चपेट में हैं.

क्या है उपाय?

यह सही है कि बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा पर पूरी तरह अंकुश लगाना संभव नहीं है. विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के अलावा इंसानी गतिविधियों ने इस खतरे को कई गुना बढ़ा दिया है. लेकिन बाढ़ प्रबंधन के जरिए इससे होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम जरूर किया जा सकता है.

इस मामले में विडंबना यह है कि कभी जिन बांधों का निर्माण बाढ़ पर अंकुश लगाने के लिए किया गया था, वही अब बाढ़ की सबसे प्रमुख वजह बनते जा रहे हैं. केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 1950 में जहां महज 371 बांध थे, वहीं अब यह तादाद पांच हजार के आस-पास पहुंच गई है. अरुणाचल प्रदेश में बीते कुछ वर्षों के दौरान पनबिजली परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर बांधों को मंजूरी दी गई है. उसके बाद खासकर वहां और पड़ोसी असम में बाढ़ की विनाशलीला तेज हुई है. असम के बाढ़ नियंत्रण विशेषज्ञ जतिन बरूआ कहते हैं, "नदियों पर बनने वाले बांध और तटबंध पानी के प्राकृतिक बहाव में बाधा पहुंचाते हैं. उद्गमस्थल पर भारी बारिश की स्थिति में नदियां उफनने लगती हैं और तटबंध तोड़ते हुए आसपास के इलाकों को डुबो देती हैं.”

इससे पहले विश्व बैंक भी कई बार कह चुका है कि गंगा और ब्रह्मपुत्र घाटी में बने बांधों से फायदे की जगह नुकसान ही ज्यादा होता है. बरुआ कहते हैं, "सरकारों को एक एकीकृत योजना के तहत बाढ़ प्रभावित इलाकों में आधारभूत ढांचे को मजबूत करने पर जोर देना चाहिए. इसके तहत सड़कों, ब्रिज और तटबंधों पर खास ध्यान देना जरूरी है.” पश्चिम बंगाल के सुंदरबन इलाके में बाढ़ से होने वाले नुकसान पर अंकुश लगाने की दिशा में काम करने वाले प्रोफेसर सुगत हाजरा कहते हैं, "तटबंधों में दरार आने या उनके टूटने की वजह से देश के कई इलाकों में बाढ़ भयावह रूप ले लेती है. तमाम तटबंधों को चौड़ा और मजबूत बना कर इस समस्या पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है.” वह कहते हैं कि जंगलों की अंधाधुंध कटाई भी बाढ़ की भयावहता को बढ़ा रही है. सरकारों को गैर-सरकारी संगठनों के साथ मिल कर बड़े पैमाने पर पेड़ लगाने और पुराने पेड़ों की अवैध कटाई रोकने की पहल करनी चाहिए.

विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्र व राज्य सरकारें बाढ़ आने के बाद काफी सक्रियता दिखाती हैं. लेकिन उसके बाद अगली बाढ़ तक इस प्राकृतिक आपदा की ओर से मुंह मोड़ लेती हैं. यही वजह है कि बाढ़ नियंत्रण संबंधी ज्यादातर योजनाएं फाइलों में पड़ी धूल फांक रही हैं. बरुआ कहते हैं, "सरकारों की कुंभकर्णी नींद नहीं टूटने तक बाढ़ हर साल देश में बड़े पैमाने पर जान-माल लीलती रहेगी.”

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