शहर जब धरोहर बना तो अपना घर भी छिन गया | दुनिया | DW | 27.07.2018
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दुनिया

शहर जब धरोहर बना तो अपना घर भी छिन गया

एक साल पहले वू यिंग की रेड बीन और कोकोनट आइस पुडिंग के लिए ग्राहकों की कतार लगी रहती थी. अब 60 साल की यिंग अपनी दुकान पर ताला लगा रही हैं. चीन सरकार ने उन्हें कहीं और जाने को कहा है ताकि हेरिटेज थीम पार्क बन सके.

वू यिंग का घर दक्षिण चीन के ऐतिहासिक चिकन शहर में है. चिकन को यूनेस्को ने 2007 में विश्व विरासत घोषित किया. यहां 19वीं और बीसवीं सदी के शुरुआती दौर के बने घर हैं जिनमें यूरोपीय और चीनी वास्तु का मेल दिखता है. घंटाघर, पत्थरों पर पेचीदे डिजाइन इन इमारतों की खास पहचान हैं. हालांकि विरासतों में शामिल होने और अंतरराष्ट्रीय ख्याति के बाद से यहां के बाशिंदों की मुश्किलें बढ़ गई हैं. पिछले साल म्युनिसिपल अथॉरिटी ने 90 करोड़ डॉलर का करार किया है ताकि इस जगह को पर्यटन केंद्र बनाया जा सके. इसकी ऐतिहासिक इमारतों को होटल, बार, रेस्तरां, और कैफे में बदला जा रहा है, लेकिन इनका मजा लेने के लिए आपको कीमत भी चुकानी पड़ेगी. इन इमारतों में घुसने के लिए भी टिकट लेना होगा.

हालांकि यहां रहने वाले 28 परिवारों ने यहां से जाने से मना कर दिया है. उन्हें मई के आखिर में घर छोड़ने का नोटिस मिला. वु यिंग शिकायत करते हैं, "लोग इतना डरे हुए हैं कि विरोध नहीं करना चाहते. यह एकदम बेतुका है कि संरक्षण के नाम पर यहां के लोगों को हटाया जा रहा है."

प्रशासन ने कई सड़कों पर बैरिकेड लगा दिए हैं और सील की गई दुकानों पर लाल बैनर लगे हैं जिसमें गांववालों से कहा गया है कि "प्रगति के मार्क में बाधा" ना बनें. इस तरह की स्थिति चीन के ऐतिहासिक इलाकों में कोई नई बात नहीं है. यहां स्थानीय सरकारों और डेवलपरों के बीच सौदा होता है.

1999 में शंघाई के नजदीक प्राचीन "वाटर टाउन" के सभी बाशिंदों को बाहर कर दिया गया था. अब इस शहर में लोग बोट से सैलानी के रूप में ही आ सकते हैं जिसके लिए 30 डॉलर का टिकट लगता है. लचर कानून संपत्ति के मालिकों को कोई संरक्षण नहीं देते. मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि जबर्दस्ती इलाके से बाहर निकाले जाने से लोगों की नाराजगी बढ़ती जा रही है. स्थानीय अधिकारी अकसर ऐतिहासिक विरासतों को बचाने के दबाव में रहते हैं. चीन की सांस्कृतिक विरासत के कारोबार के विशेषज्ञ लेकसा ली इस दबाव के बारे में कहते हैं, "इसके नतीजे में जो परियोजना बनती है वो अकसर इतनी व्यावसायिक होती है कि उसमें जमीनी संदर्भों का ध्यान नहीं रखा जाता है." लेकसा ली शंघाई की न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं.

चिकन में जो पर्चे बंट रहे हैं उनमें कहा जा रहा है कि स्थानीय लोगों को 472 से 575 डॉलर प्रति वर्गमीटर के हिसाब से मुआवजा दिया जा रहा है लेकिन इससे इलाके में एक छोटा अपार्टमेंट भी नहीं खरीदा जा सकता. यहां नए घरों की कीमत औसतन 2400 डॉलर प्रति वर्ग मीटर के दायरे में है.

वू यिंग कहती हैं कि अपने पड़ोसियों के साथ उन्होंने विरोध प्रदर्शन किया था लेकिन उन्हें गिरफ्तार कर कई दिनों तक जेल में रखा गया. यहीं रहने वाले लोउ कोंग हो ने बताया कि अनजान लोग हाल ही में मरम्मत किए उनके पुराने मकान में जबर्दस्ती घुस आए और कीमती पुरानी चीजों को लूट कर ले गए. लोउ का कहना है, "घर छोड़ने का मतलब है कि अपने परिवार से रिश्ते तोड़ लेना." 

अगर स्थानीय लोग सौदे को तोड़ देते हैं तो मामला न्यायिक प्रक्रिया में चला जाएगा और संपत्ति मालिकों से मुआवजा भी वापस ले लिया जाएगा.

पाउलिंडा पून एक अमेरिकी फ्लाइट अटेंडेंट हैं. वो चिकन में ही पली बढ़ी हैं और उन लोगों में हैं जो अकसर चिकन आते जाते रहते हैं. 2016 में उन्होंने बीजिंग जा कर विदेश मंत्रालय को चिकन की हालत के बारे में एक पत्र सौंपा. वहां से उन्हें अधिकारियों ने इसे स्थानीय मामला कह कर टरका दिया. हाल ही में वो चिकन फिर आईं थीं और इस जगह को "भूतिया शहर" बनते देख काफी दुखी हुईं. अधिकारियों ने एएफपी संवाददाता के पूछे सवालों का कोई जवाब नहीं दिया.

एनआर/एमजे (एएफपी)

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