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तस्वीर: DW/ S. Waheed

लल्लूजी बिन कुंभ नहीं

२३ जनवरी २०१३

कुंभ का आयोजन किसके बिना नहीं हो सकता? लाख टके का सवाल है और दर्जनों जवाब मुमकिन है.. भारत सरकार या यूपी सरकार, अखाड़े या इलाहबाद जिला प्रशासन, नागा बाबा या शंकराचार्य, श्रद्धालु या भारत की आम जनता?

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कोई कहेगा नागा सन्यासियों के बिना कुंभ अधूरा है, तो कोई जवाब देगा कि शंकराचार्य बिना कुंभ की कल्पना भी संभव नहीं. लेकिन चंद लोग ही जानते हैं कि नागा सन्यासी और शंकराचार्य के बिना तो शायद कुंभ संपन्न हो सकता है पर 'लल्लू जी एंड संस' के बगैर नहीं.

कुंभ के आयोजन के लिए पैसा भारत सरकार-यूपी सरकार खर्च करती है, अखाड़ों के महलनुमा शिविर के लिए साधू-संत और संस्थाएं धन देती हैं और तम्बू-कनात पर आधारित आस्थाई 'कुंभ नगर' बसाने का काम करती है लल्लू जी एंड संस नाम की फर्म जिसका मुख्यालय इलाहबाद के रामबाग में है. उज्जैन, हरिद्वार और नासिक में इसके ब्रांच आफिस है यानि हर उस जगह जहां कुंभ होता है. लल्लू जी एंड संस को कुंभ विशेषग्य भी कहा जा सकता है. इस फर्म में साल भर 100 से 200 कर्मचारी काम करते हैं और कुंभ के दौरान इनकी संख्या 3000 तक पहुंच जाती है.

लल्लू जी एंड संस की यह चौथी पीढ़ी इस काम में लगी है, इनका दावा है कि इनके बिना कोई सरकार कुंभ संपन्न करा ही नहीं सकती. क्योंकि इनके पास कुंभ नगरी बसाने का जितना बारदाना है उतना पूरे भारत की किसी फर्म या संस्था के पास नहीं है. कुंभ नगरी में इन्होने करीब 100 एकड़ में आस्थाई दफ्तर बना रखा है.

Kumbh Mela 2013
तस्वीर: DW/ S.Waheed

करोड़ों का सौदा

बांस, बल्ली, तम्बू, कनात, स्विस काटेज, परदे, टीन-टप्पर और न जाने क्या क्या. इस बार कुंभ में 25 करोड़ से अधिक का काम इनके हाथ लगा है. इनकी देखा देखी कई और फर्में भी बनी लेकिन किसी के पास इतनी क्षमता नहीं है कि वह 10 किलोमीटर के इलाके में पूरा एक शहर बसा दे. श्रद्धा है या अंध विशवास कि जितनी अन्य फर्में बनीं उन सबने शब्द 'लल्लू जी' अपने नाम से पहले जोड़ा, जैसे लल्लू जी किशन एंड संस आदि. कुंभ नगरी में इनके दफ्तर भी लगे हैं, पर सब के हाथ दस-बीस-पचास लाख का काम ही लगा है.

लल्लू जी एंड संस के मेला व्यवस्थापक राजेन्द्र कुमार मिश्र बड़े चाव से अपनी खूबियां बयान करते हैं. कहते हैं देश भर में बड़ा और अर्जेंट काम हमारे अलावा और कोई कर ही नहीं सकता. उनके मुताबिक इलाहबाद में बस 10 किलोमीटर में ही लगता है कुंभ, हरिद्वार में तो यह मेला 40 किलोमीटर में फैल जाता है, "किस के पास है इतना सामान जो इसका ठेका लेगा. हमारे मालिकों का कहना है, मलाई नहीं मट्ठा खाओ".

Kumbh Mela 2013
तस्वीर: DW/ S.Waheed

नाम तो बचा

राजेन्द्र मिश्र के मुताबिक ऐसा नहीं है कि उनकी विशेषता केवल कुंभ तक ही सीमित हो. वह बताते हैं कि उनके मालिक का एक किस्सा मशहूर है. कहते हैं कि कोयंबटूर में जब कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी हुई तो हरिद्वार से दर्जनों ट्रकों में भरकर टेंट का सामान वहां गया. जितना किराया मिला वह लागत से बहुत कम था. लोगों ने पूछा क्या बचा, जगदीश जी बोले, "नाम तो बचा".

इसी तरह जब अटल जी प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने रांची में बीजेपी की कार्यकारिणी का इंतजाम किया. राजेन्द्र के मुताबिक सेवा भाव उनका सबसे बड़ा ध्येय है, "उत्तरकाशी में भूकंप आया तो बिना एडवांस लिए, बिना किसी औपचारिकता के काम किया और सरकार से बहुत कम पैसे लिए. कुंभ में भी जब काम ठीक नहीं होता तो अखाड़ों के साधू-संत अक्सर हमें बुरा भला कहते हैं, पर हम उन्हें मना लेते हैं क्योंकि यह काम हमें ही करना है, कोई और न करने पाए."

Kumbh Mela 2013
तस्वीर: DW/ S.Waheed

पंच प्यारे

लल्लू जी एंड संस की स्थापना का मामला भी बड़ा दिलचस्प है. पिछली पांच पीढ़ियों से इनके खानदान में पांच पांच पुत्र पैदा होते रहे हैं जो इसी कारोबार को बढ़ाते रहे हैं. राजेन्द्र मिश्र बताते हैं कि फर्म की बाकायदा स्थापना तो 1953 में हुई, लेकिन उससे एक दशक पहले ही उनके पुरखों ने इलाहबाद के कुंभ से ही यह काम शुरू कर दिया था. उनमें से सबसे बड़े पुत्र लल्लू जी थे. उनके भी पांच बेटे हुए जिनमे गुल्लू बाबू, राजा बाबू , चुन्नू बाबू, मुन्नों बाबु और पुन्नो बाबू ने मिलकर यह काम फिर से बाकायदा शुरू किया.

इनमें सबसे बड़े गुल्लू बाबू के भी पांच बेटे हुए जिनमें जगदीश अग्रवाल, सुनील अग्रवाल, विनोद अग्रवाल, रमेश अग्रवाल और अनिल अग्रवाल हैं. अब जगदीश और सुनील मिलकर इस फर्म को संभाल रहे हैं. मिश्र ने बताया कि इस खानदान के करीब 35 भाई-भतीजे पूरे देश में इसी काम में लगे हुए हैं.

रिपोर्ट: सुहेल वहीद, लखनऊ

संपादन: ईशा भाटिया

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