मंदिर की पहल, माहवारी पर खुल कर हो बात | दुनिया | DW | 30.05.2018
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दुनिया

मंदिर की पहल, माहवारी पर खुल कर हो बात

कई जगहों पर महिलाओं को आज भी माहवारी के दिनों में अपने घर की रसोई तक में जाने से रोका जाता है, लेकिन लखनऊ के एक मंदिर ने महिलाओं के लिए उनके मुश्किल दिनों में भी अपने दरवाजे खोल दिए हैं.

भारत में माहवारी और महिलाओं की सेहत से जुड़े विषयों पर अब भी खुल कर बात नहीं होती. लेकिन अब धीरे धीरे जागरुकता बढ़ रही है. कई स्तरों पर हो रही सामाजिक पहलों के अलावा हाल में बनी एक बॉलीवुड फिल्म पैडमैन में भी इस बारे में खुलकर बात करने पर जोर दिया गया. फिल्म के प्रमोशन के दौरान इसके कलाकारों ने सोशल मीडिया पर #PadmanChallenge अभियान चलाया था. इसके तहत सिलेब्रिटीज को सैनिटरी पैड के साथ अपनी फोटो सोशल मीडिया पर डालनी थी ताकि पीरियड्स से जुड़ी शर्म और झिझक को दूर किया जा सके. 

अब भी कई जगहों पर महिलाओं को माहवारी के दौरान अपवित्र माना जाता है. इसीलिए घर की रसोई तक में उनके आने पर रोक लगा दी जाती है. कई मंदिरों में भी उन्हें नहीं जाने दिया जाता. लेकिन लखनऊ के मनकामेश्वरमठ की महंत दिव्यागिरी ने पिछले दिनों मंदिर परिसर में पीरियडस को लेकर एक गोष्ठी कराई, जिसका विषय था 'माहवारी, शर्म नहीं सेहत की बात'.

पीरियड्स पर चुप्पी तोड़ो 

महंत दिव्यागिरी कहती हैं, "दकियानूसी सोच ने पीरियड्स को लेकर भ्रांतियां पैदा कर दी हैं जबकि ये मुद्दा सीधे सेहत और स्वच्छता से जुड़ा हुआ हैं, इसलिए हमें बच्चियों को पीड़ा छिपाना नहीं बल्कि उन्हें हाइजीन का ख्याल रखना सिखाना चाहिए." दिव्यागिरी कहती हैं कि पीरियड्स के दिनों में आराम करने की सलाह दी जाती है. शायद इसी सलाह को मंदिर में आने पर प्रतिबंध के रूप में ले लिया गया, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए. 

भारत में अब भी पीरियड्स के साथ कहीं न कहीं एक शर्म जुड़ी है और इसीलिए महिलाओं के सैनेटरी पैड्स को काली पॉलिथीन में छुपा बेचा जाता है. ऐसे में, कई संस्थाएं अब खुले आम सैनिटरी पैड्स की बिक्री पर जोर दे रही हैं, ताकि शर्म की दीवार को तोड़ा जा सके. नेशनल हेल्थ मिशन के महाप्रबंधक डॉ. हरिओम दीक्षित कहते हैं कि पीरियड्स सिर्फ महिलाओं और किशोरियों का मुद्दा नहीं हैं बल्कि इस मुद्दे पर पुरुषों की भी भागीदारी होनी चाहिए.

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पीरियड्स पर बात करने में #NoShame

चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर प्रदेश में 15-24 वर्ष की आयु वाली 81 प्रतिशत युवतियां माहवारी के दिनों में कपड़े का ही इस्तेमाल करती हैं. वहीं राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 62 प्रतिशत के आसपास है. भारत में सिर्फ 42 प्रतिशत युवतियां ही पीरियड्स के दौरान सैनिटरी पैड्स इस्तेमाल करती हैं.

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वहीं ग्रामीण इलाकों में रहने वाली ज्यादातर महिलाएं इन दिनों मे कोई सैनिटरी नेपकिन इस्तेमाल नहीं करतीं. कई बार वे आर्थिक कारणों से इन पैड्स को नहीं खरीद पाती हैं, तो कइयों को यह उपलब्ध नहीं होते हैं. पीरियड्स के दौरान साफ-सफाई बहुत जरूरी है, वरना कई तरह की बामारियां हो सकती हैं. इनमें बुखार, अनियमित पीरियड्स, खून ज्यादा आने के साथ गर्भधारण में दिक्कतें शामिल हैं.

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पीरियड्स को ऐसे पहले किसी ने नहीं देखा

यूनिसेफ का एक अध्ययन बताता है कि 28 प्रतिशत लड़कियां पीरियड्स के दिनों में स्कूल नहीं जातीं. इसीलिए केरल, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों ने सरकारी स्कूलों में फ्री सैनिटरी नेपकिन देने की शुरुआत की है, ताकि पीरियडस के कारण लड़कियों की पढ़ाई का नुकसान न हो. कई संस्थाएं भी महिलाओं को पैड मुहैया कराने के प्रयासों में जुटी हैं. ब्रिजरानी मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट नाम की संस्था देश भर में एक हजार बैड बैंक बनाना चाहती है. इन पैड बैंकों में उन महिलाओं को पैड मुहैया कराए जाएंगे जो इन्हें नहीं खरीद पातीं.

लखनऊ विश्वविद्यालय में हाल में एक कार्यक्रम में मेयर संयुक्ता भाटिया ने एक पैड बैंक का उद्घाटन किया. मेयर का कहना है कि महिलाओं के लिए 45 पिंक टॉयलेट बनाने की योजना को लागू करने के प्रयास जारी हैं और उनकी कोशिश होगी कि ये शौचालय पैड बैंकों के करीब हों.मनकामेश्वरमठ की महंत दिव्यागिरी कहती हैं कि माहवारी को लेकर किसी तरह की शर्मिंदगी नहीं होनी चाहिए. मंदिर में पहली बार माहवारी विषय पर सेमिनार करा कर उन्होंने साबित किया है कि रास्ता भले ही लंबा हो लेकिन शुरुआत हो चुकी है. वह कहती हैं कि माहवारी के दिनों को छुपाने की नहीं, बल्कि इस पर खुल कर बात करने की जरूरत है.

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