बॉलीवुड की कहानियों से खुश नहीं बाजपेयी | लाइफस्टाइल | DW | 18.05.2012
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

लाइफस्टाइल

बॉलीवुड की कहानियों से खुश नहीं बाजपेयी

सत्या और शूल जैसी फिल्मों से मुग्ध कर देने वाले मनोज बाजपेयी इन दिनों कान फिल्म फेस्टिवल में हैं. उनकी नई फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' चर्चा में है. डॉयचे वेले ने कान पहुंचे मनोज से खास बातचीत की.

डॉयचे वेलेः मनोज आप 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' को भारत में रिलीज करने से पहले कान आ गए, क्यों?

मनोज बाजपेयीः कान एक बहुत बड़ा त्योहार है सिनेमा का. यहां पर जानी मानी फिल्मों को चुना जाता है और उनको ही दिखाया जाता है. ये अपने आप में एक इज्जत दी जा रही है फिल्म को. और अनुराग कश्यप जो डायरेक्टर हैं इसके उनको. हम सब इस खुशी में शामिल होने के लिए आए हैं.

डॉयचे वेलेः गैंग्स ऑफ वासेपुर में आपका रोल क्या है. इस बारे में थोड़ा सा बताइए.

मनोज बाजपेयीः मेरे चरित्र का नाम है सरदार खान. यह एक कमाल का किरदार है. जैसे हम खाना खाते हैं वह ऐसे अपराध करता है. अपराध करते हुए जरा सा हिचकिचाता नहीं है. यह लड़कियों का बड़ा शौकीन है. सेक्स में इसको बहुत मजा आता है. इसके चार पांच बच्चे हैं. पहली और दूसरी पत्नी से. और यह बहुत जल्दी दिल दे बैठता है. यह कहानी ऐसे लोगों की है जो अपराध में बहुत ही ज्यादा डूबे हुए हैं.

(इस आर्टिकल में नीचे बने लिंक पर क्लिक करके मनोज बाजपेयी का इंटरव्यू सुना जा सकता है.)

डॉयचे वेलेः कुछ आलोचक इसकी तुलना शोले से कर रहे हैं. कह रहे हैं कि ये उत्तर भारत की शोले है. आप खुद को शोले के किस किरदार के रूप में देखते हैं. क्या आप भी मानते हैं कि ये शोले है.

मनोज बाजपेयीः जो लोग शोले से तुलना कर रहे हैं, उनका कहना यही है कि ये उस तरह की बडी़ फिल्म है. और उस तरह की थीम है. उस तरह के बहुत सारे चरित्र हैं. अभी तो फिल्म का ट्रेलर आया है. लोग फिल्म देखें और उसकी चर्चा करें. दर्शकों को पसंद आए तब मैं मानूंगा कि इस तरह की बातें की जाएं. लेकिन हां, अपने आप में बहुत दमदार फिल्म है. हिंदुस्तानी सिनेमा को एक कदम आगे लेकर जाती है. बहुत सारा प्रयोग करती है. अनुराग ने एक नया तरीका दिया है. स्क्रिप्ट लिखने का. और इसको निर्देशित करने का.

डॉयचे वेलेः आपने स्क्रिप्ट की बात की. और इसी से जुड़ा हुआ एक सवाल आता है कि बॉलीवुड फिल्में तो बहुत बनाता है. लेकिन जब बात ऑस्कर या कान की होती है तो यहां की फिल्में पीछे रह जाती हैं. उनको वो एक्सपोजर नहीं मिलता. क्या कमी मानते हैं आप.

मनोज बाजपेयीः स्क्रिप्ट्स की कमी है. अच्छे निर्देशक की कमी है. और बहुत सारी अच्छी फिल्में जो बनती भी हैं उनको पता नहीं होता कि कान फिल्म फेस्टिवल में चुनाव की प्रक्रिया क्या है. भेजा कैसे जाए. तो बहुत सारे लोग तो इसलिए भी पीछे रह जाते हैं. और हमारे हिंदी सिनेमा की एक त्रासदी भी है कि वह बाहर के देशों में सिर्फ नाच गाने के लिए जाना जाता है. और वहां इस तरह की फिल्में बनाने वालों की ही पहुंच हो पाती है. इसलिए गंभीर निर्देशकों का काम बाहर के लोगों तक पहुंच नहीं पाता. अब धीरे धीरे शुरुआत हो रही है. और आशा करते हैं कि हिंदुस्तानी सिनेमा गैंग्स ऑफ वासेपुर और दूसरी तरह की फिल्मों से जाना जाए तो बेहतर होगा. हम सिर्फ उस तरह की फिल्में ही नहीं बनाते, न ही हमारे पास सिर्फ उस तरह के निर्देशक हैं. हमारे पास अनुराग कश्यप, दिबाकर बनर्जी, नीरज पांडे और भी कई होनहार निर्देशक हैं. यह आगे आ रहे हैं. और इनकी भी दुनिया है. ये सिनेमा को आगे लेकर जा रहे हैं.

Frankreich Filmfestival Cannes 2012

कान पहुंची स्पेनी अदाकारा बेरेनीस बेजो

डॉयचे वेलेः आप जैसा सितारा जो कमर्शियल सिनेमा, आर्ट फिल्मों या फिर ऑफ बीट फिल्मों में बराबरी से दमदार अभिनय करता है. इसके विपरीत कुछ निर्देशक ऐसे हैं जो बड़े तो हैं, सिर्फ कमर्शियल सिनेमा बनाते हैं, जिनमें बड़े सितारे होते हैं. लेकिन उनकी फिल्में भी कान तक नहीं पहुंच सकी. उनके योगदान को कैसे आंकते हैं आप.

मनोज बाजपेयीः उनका योगदान तो है ही. उन्होने हिंदुस्तानी सिनेमा को इतना बड़ा करके रखा है. वो जिस तरह की फिल्में बनाते हैं हिंदुस्तानी सिनेमा उसी की वजह से जाना जाता है. लेकिन इसके अलावा भी सिनेमा है. हम गंभीर फिल्में बनाते हैं. अच्छा सिनेमा बनाते हैं. तो उस पर ध्यान देने की जरूरत है और उनका योगदान फिल्मों के आर्थिक पहलू को लेकर है. अनुराग कश्यप, रामगोपाल वर्मा और शेखर कपूर जैसे निर्देशकों ने सिनेमा की परम्परा को बचा के रखा है.

डॉयचे वेलेः तो गैंग्स ऑफ वासेपुर से क्या उम्मीद हैं. पुरस्कार जीतने की उम्मीद है.

मनोज बाजपेयीः कयास लगाना तो मुश्किल होता है लेकिन हां, आशा तो है. जितनी अच्छी फिल्म बनी है वो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे. हिंदुस्तानी सिनेमा में एक अजीब सी परंपरा है. अगर फिल्म सफल नहीं होती तो फिर उसे लोग भूल जाते हैं. उसके काम को भूल जाते हैं. निर्देशक हो, अभिनेता हो, सबके काम को भुला देने की कोशिश की जाती है. सिर्फ यह कहकर कि उसकी कमाई नहीं हुई जो कि अन्याय है. लेकिन क्या करें यही परम्परा है. इसीलिए मैं चाहूंगा कि ये फिल्म अधिक से अधिक चले.

डॉयचे वेलेः इस बार कान का चेहरा बनाया गया है मर्लिन मुनरो को. इस बार हॉलीवुड की फिल्में भी सबसे ज्यादा है. हॉलीवुड के मुकाबले बॉलीवुड को कहां देखते हैं.

मनोज बाजपेयीः हॉलीवुड बहुत ज्यादा लोगों तक पहुंचता है. हर देश के लोग उसे देखते हैं. बहुत सारी भाषाओं में उसे डब किया जाता है. उतनी अभी पहुंच नहीं हुई है. लेकिन हम अपना बाजार लगातार खोजते जा रहे हैं. जो कि अच्छी बात है. हम तकनीक का इस्तेमाल उतने बेहतर ढंग से नहीं करते. जितने अच्छे ढंग से हॉलीवुड करता है. शायद इसका कारण ये भी है कि उनके पास ज्यादा पैसा है.

डॉयचे वेलेः धन्यवाद मनोज, इस बातचीत के लिए.

मनोज बाजपेयीः धन्यवाद.

इंटरव्यू: विश्वदीपक

संपादनः एजेए

DW.COM

WWW-Links

विज्ञापन