दिमाग के इशारे से उड़ेगा ड्रोन | विज्ञान | DW | 19.01.2019
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विज्ञान

दिमाग के इशारे से उड़ेगा ड्रोन

रिमोट कंट्रोल से चलने वाले उपकरणों को अब दिमाग के इशारों से चलाने की कोशिश हो रही है. फिर बटन दबाने या लीवर खींचने की जरूरत नहीं रहेगी. ब्रेन मशीन इंटरफेस तकनीक अक्षम लोगों का बड़ा सहारा बन सकती है.

जरा सोचिए रिमोट कंट्रोल ने कुछ कामों को हमारे लिए कितना आसान कर दिया है. अब यही काम अगर बगैर रिमोट कंट्रोल के महज दिमाग के इशारे से होने लगे तो? पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन के पास एक पायलट ने दिमाग से ही ड्रोन को उड़ा दिया. यह ड्रोन दूसरे ड्रोनों की तरह ही धरती से रेडियो संदेश हासिल करता है. हालांकि इसे उड़ान भरने या फिर उतरने और दूसरे कामों के लिए संकेत पायलट के दिमाग से मिलता है, कोई बटन या फिर जॉयस्टिक की जरूरत नहीं पड़ती. इस रिसर्च परियोजना के प्रोजेक्ट कॉर्डिनेटर रिकार्डो मेंडेस बताते हैं, "हम साधारण नियंत्रण से ब्रेन फ्लाइट की तरफ जा रहे हैं. अब से यह पायलट के दिमाग की तरंगों के आधार पर उड़ेगा."

ड्रोन आकाश में उड़ता है और उसकी स्थिति के बारे में स्क्रीन पर जानकारी मिलती रहती है. यह ड्रोन उड़ तो जा रहा है लेकिन फिलहाल उसे मनचाही दिशा में मोड़ने और उसे निर्धारित जगह पर रखने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है. न्यूरोसाइंटिस्ट नूनो लोराइयो भी रिसर्चरों की टीम में शामिल हैं. उन्होंने बताया, "आदर्श स्थिति में यह इतना मुश्किल नहीं होना चाहिए. थोड़ी और ट्रेनिंग के साथ हम बेहतर होंगे. और इस तरह ड्रोन को चलाना सहज होगा."

सुधार और आदर्श स्थिति की बात तो ठीक है लेकिन आखिर ड्रोन काम कैसे करता है. रिसर्चरों के मुताबिक यह टेक्नोलॉजी ब्रेन-मशीन इंटरफेस पर आधारित है. यानी एक ऐसा सिस्टम है, जो खोपड़ी पर लगे इलेक्ट्रोड्स को इस्तेमाल करता है. एक खास सॉफ्टवेयर की मदद से रुई कोस्टा जैसे रिसर्चर इंसानी दिमाग को पढ़ सकते हैं. रुई कोस्टा ने बताया, "हम एक टोपी इस्तेमाल करते हैं जो दिमाग के भीतर चलने वाली इलेक्ट्रिकल गतिविधियों को पढ़ सकती है. हम इन सिग्नलों को लेते हैं और कंप्यूटर में ट्रांसमिट करते हैं. फिर कंप्यूटर इन्हें विजिबल कर्सर मूवमेंट में बदल देता है, जिन्हें आप स्क्रीन पर देख सकते हैं."

स्क्रीन देखते ही दिमाग के इलेक्ट्रिक पैटर्न का पता चलता है, जिससे चीजों का मूवमेंट नियंत्रित होता है. वैज्ञानिक कहते हैं कि ज्यादा ट्रेनिंग से यह प्रक्रिया कार चलाने जैसी सहज हो जाएगी. रुई कोस्टा कहते हैं, "सैद्धांतिक रूप से हर कोई इसे सीख सकता है. लेकिन यह व्यक्ति की सीखने की क्षमताओं पर निर्भर करेगा. आखिरकार हर कोई तो पियानोवादक नहीं बन सकता."

इस तकनीक को बड़े आकार वाले प्लेन सिमुलेटर के साथ भी परखा गया है. रिसर्चरों का मानना है कि भविष्य में ब्रेन मशीन इंटरफेस पैनलों को कंट्रोल करने, पायलटों की ट्रेनिंग का समय घटाने और यहां तक कि विकलांग लोगों को विमान उड़ाने में मदद कर सकता है. रिकार्डो मेंडेस बताते हैं, "एरोनॉटिक्स के अलावा कई और क्षेत्रों में हम इस टेक्नोलॉजी को इस्तेमाल करने की सोच रहे हैं: आप इसे व्हीलचेयर में इस्तेमाल कर सकते हैं कि कैसे दिमाग से व्लीलचेयर को नियंत्रित करें. या फिर घर पर रोजमर्रा के उपकरणों को आप इससे कंट्रोल कर सकते हैं."

घर पर लाइट का स्विच ऑन ऑफ करने से लेकर दिमाग के संकेतों के जरिए कृत्रिम अंगों से ईमेल लिखवाने तक, भविष्य में बहुत सारी चीजें ब्रेन मशीन इंटरफेस से संभव हो सकेंगी.

एनआर/ओएसजे

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