जहां दो-दो बार बिना बहुमत के बीजेपी को मिला सत्ता का स्वाद | भारत | DW | 29.03.2019
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भारत

जहां दो-दो बार बिना बहुमत के बीजेपी को मिला सत्ता का स्वाद

उगते सूरज की धरती के नाम से मशहूर पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश अकेला ऐसा राज्य है जहां बीजेपी विधानसभा चुनावों में बहुमत हासिल किए बिना दलबदल के सहारे ही दो-दो बार सत्ता का स्वाद चख चुकी है.

अरुणाचल प्रदेश में पेमा खांडू की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार ही सत्ता में है. अब 11 अप्रैल को राज्य की दो लोकसभा सीटों के अलावा विधानसभा की 60 सीटों के लिए मतदान होना है. इन चुनावों में पार्टी पहली बार लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता में वापसी के लिए मैदान में है. यानी उसके सामने पहली बार अपने बूते बहुमत हासिल करने की कड़ी चुनौती है.

राजनीतिक अस्थिरता

बीजेपी पहली बार बिना बहुमत के ही वर्ष 2003 में यहां सत्ता में आई थी. उसके बाद वर्ष 2016 से भी वह बिना बहुमत के सरकार में है. वर्ष 2003 में पूर्व मुख्यमंत्री गेगांग अपांग, जो तब एक क्षेत्रीय पार्टी के इकलौते विधायक थे, उन्होंने सत्तारुढ़ कांग्रेस के ज्यादातर विधायकों को दलबदल के लिए तैयार कर लिया. अपांग बाद में बीजेपी में शामिल हो गए थे. लेकिन बीजेपी की यह सरकार महज आठ महीने ही चल सकी. उसके बाद अपांग समेत ज्यादातर विधायक कांग्रेस में लौट आए थे. वर्ष 2004 के विधानसभा में अपांग की अगुवाई में कांग्रेस को बहुमत मिला था. उस साल कांग्रेस को 34 सीटें मिली थीं और बीजेपी को नौ.

राज्य विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल तो बेहद उलटफेर वाला रहा है. पिछली बार कांग्रेस ने भारी बहुमत के साथ सरकार बनाई थी. लेकिन पार्टी के 43 विधायकों ने रातोंरात पाला बदल कर पीपीए का दामन थाम लिया था जिसका कुछ दिनों बाद ही बीजेपी में विलय हो गया था. नबाम टुकी के नेतृत्व में वर्ष 2014 में जीत कर सरकार बनाने वाली कांग्रेस सरकार को नेतृत्व के मुद्दे पर उभरे विवाद के बाद जनवरी 2016 में बर्खास्त कर दिया गया था. एक महीने के राष्ट्रपति शासन के बाद कालिखो पुल को बागी कांग्रेस सरकार का मुख्यमंत्री बनाया गया. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की वजह से राज्य में कांग्रेस की सरकार बहाल हो गई. उसी दौरान पुल की रहस्यमयी हालात में मौत हो गई. उसके बाद नबाम टुकी ने पेमा खांडू के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी थी. कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री बनने के बाद खांडू पहले पीपुल्स पार्टी आफ अरुणाचल नामक एक क्षेत्रीय पार्टी में शामिल हुए और दिसंबर, 2016 में बीजेपी में. अब यहां बीजेपी के 48 विधायक हैं और विपक्षी कांग्रेस व नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के पांच-पांच.

टिकटों के बंटवारे के मुद्दे पर पार्टी को अबकी यहां बगावत से भी जूझना पड़ रहा है. हाल में पार्टी के दो मंत्रियों समेत 18 नेता कांग्रेस और एनपीपी में शामिल हो गए हैं. बीजेपी नेतृत्व ने कई मंत्रियों के टिकट काट दिए हैं. इस विवाद से ठीक से नहीं निपटने की वजह से ही गृह मंत्री कुमार वाई को अबकी टिकट नहीं दिया गया है. हालांकि वाई का दावा है कि मुख्यमंत्री खांडू को डर था कि कहीं चुनावों के बाद उनकी कुर्सी हाथ से नहीं निकल जाए.

2019 के चुनावों में ये सब पहली बार हो रहा है

लोकसभा की दो सीटें

अरुणाचल प्रदेश में लोकसभा की दो सीटों के लिए 12 उम्मीदवारों के मैदान में होने की वजह से उन पर बहुकोणीय मुकाबले के आसार हैं. इन सीटों के लिए 11 अप्रैल को पहले चरण में मतदान होगा. अरुणाचल पूर्व सीट पर पांच उम्मीदवार हैं और अरुणाचल पश्चिम पर सात. राज्य की 27 विधानसभा सीटों को लेकर गठित अरुणाचल पूर्व सीट पर बीजेपी के तापीर गाओ और कांग्रेस के जेम्स लोवांग्चा वांगलाट के बीच कड़े मुकाबले की संभावना है. यहां जनता दल (एस) के बांदे मिली और पीपुल्स पार्टी आफ अरुणाचल (पीपीए) के मंगोल योमसो के अलावा एक निर्दलीय उम्मीदवार सीसी सिंग्फो भी मैदान में है.

राज्य की दोनों लोकसभा सीटों को कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है. वह सात-सात बार यहां जीत चुकी हैं. बीजेपी ने वर्ष 2004 में अरुणाचल पूर्व सीट पर जीत दर्ज की थी. बीते लोकसभा चुनावों में कांग्रेस उम्मीदवार निनोंग ईरिंग ने तापीर गाओ को 12 हजार से ज्यादा वोटों से पराजित किया था. गाओ वर्ष 2004 में यहां जीते थे.

अरुणाचल पश्चिम संसदीय सीट पर वैसे तो सात उम्मीदवार हैं. लेकिन यहां मुख्य मुकाबला केंद्रीय गृह राज्य मंत्री और बीजेपी उम्मीदवार किरेन रिजिजू व पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस उम्मीदवार नबाम टुकी के बीच होने की संभावना है. रिजिजू ने बीते चुनाव में कांग्रेस के टकाम संजय को 41 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से पराजित किया था.

बीजेपी जहां विकास के मुद्दे पर चुनाव मैदान में उतरी है वहीं विपक्ष स्थायी निवास प्रमाणपत्र (पीआरसी) को अपने तुरुप के पत्ते के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है. राज्य में फिलहाल दो ही अहम मुद्दे हैं. नागरिकता (संशोधन) विधेयक और स्थानीय निवासी प्रमाणपत्र (पीआरसी). पीआरसी के मुद्दे पर बीते महीने हुई हिंसा में तीन लोग मारे गए थे और लाखों की सरकारी संपत्ति जला दी गई थी.

जहां तक आंकड़ों का सवाल है पिछले विधानसभा चुनावों में यहां कांग्रेस को 49.59 फीसदी वोट और 43 सीटें मिली थीं जबकि बीजेपी को 31.24 फीसदी वोटों के साथ 11 सीटें. क्षेत्रीय दलों और निर्दलीयों को छह सीटें मिली थीं. उसी साल हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और बीजेपी को एक-एक सीट मिली थी. तब बीजेपी को 46.12 फीसदी वोट मिले थे और कांग्रेस को 41.22 फीसदी.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि पहली बार लोकतांत्रिक तरीके से सरकार बचाने की लड़ाई में उतरी बीजेपी नेतृत्व के सामने मुश्किलें कम नहीं हैं. सरकार की तमाम सफाई के बावजूद पीआरसी का मुद्दा उसके गले की फांस बना हुआ है. राजनीतिक विश्लेषक देवेश्वर बोरा कहते हैं, "अरुणाचल प्रदेश हाल के वर्षो में राजनीतिक अस्थिरता का शिकार रहा है. इस स्थिति को दूर करने के लिए अबकी राज्य के लोग स्थायी सरकार का गठन चाहते हैं. लेकिन नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) जैसे कई क्षेत्रीय दलों ने फिलहाल सत्ता के दोनों दावेदारों, बीजेपी और कांग्रेस के समीकरणों को गड़बड़ा दिया है. ऐसे में अबकी चुनावी नतीजों के दिलचस्प होने की उम्मीद है.”

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