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तस्वीर: AP

गिलानी अवमानना के दोषी, सांकेतिक कैद

२६ अप्रैल २०१२

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को अदालत की अवमानना का दोषी पाया है, लेकिन उन्हें जेल की सजा नहीं दी है. गिलानी ने राष्ट्रपति के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों को फिर से खोलने से इनकार कर दिया था.

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अवमानना के लिए सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री गिलानी को अदालत के कमरे में ही कुछ मिनटों की हिरासत की सांकेतिक सजा दी. अदालत का फैसला सुनाते हुए जस्टिस नसीर-उल-मुल्क ने कहा, "बाद में रिकॉर्ड किए जाने वाले कारणों से प्रधानमंत्री को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का जानबूझकर अनादर करने के लिए अवमानना का दोषी पाया गया है." गिलानी पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्हें अदालत ने पद पर रहते हुए सजा दी है. उन्हें छह महीने की जेल की सजा दी जा सकती थी.

झुकने से इनकार

गिलानी ने सुप्रीम कोर्ट के सामने झुकने से मना कर दिया था और राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की फिर से जांच करने के लिए स्विट्जरलैंड के अधिकारियों को पत्र लिखने से मना कर दिया था. उनकी दलील थी कि राष्ट्रपति को मुकदमों से सुरक्षा का विशेषाधिकार प्राप्त है और स्विस अधिकारियों को पत्र लिखना संविधान का उल्लंघन होगा. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद यह साफ नहीं है कि इससे पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता का अंत होगा या नहीं. पिछले महीनों में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तथा सेना और न्यायपालिका के बीच गंभीर मतभेद रहे हैं. मामूली सजा के बावजूद प्रधानमंत्री गिलानी पर इस्तीफा देने का दबाव बन सकता है.

पाकिस्तान में पहले भी प्रधानमंत्री रहते हुए नवाज शरीफ को 1997 में अदालत की अवमानना का दोषी पाया जा चुका है. हालांकि उस वक्त शरीफ ने अदालत से टकराव लेने की जगह माफी मांग कर मामले को रफा दफा करने का फैसला किया था.

Der pakistanische Präsident Asif Ali Zardari
तस्वीर: Kirsty Wigglesworth/AP/dapd

अदालत से सियासत

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी करते हुए डॉन अखबार के स्तंभकार साइरिल अलमेदा ने कहा, "मैं समझता हूं कि उन्होंने मामले को कानूनी दायरे से निकाल लिया है और राजनीतिक दायरे में धकेल दिया है." अब संसद में विपक्षी सांसद गिलानी पर इस्तीफे के लिए दबाव डाल सकते हैं. अलमेदा का कहना है कि विपक्ष, मीडिया और नागरिक समाज की ओर से गिलानी पर भारी दबाव होगा.

प्रधानमंत्री गिलानी को अदालत के फैसले के समय कोर्टरूम में रहने को कहा गया. जब वे अदालत आए तो उनके समर्थक उन पर फूलों की वर्षा कर रहे थे. सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की गई. करीब 1000 दंगारोधी पुलिसकर्मियों को लगाया गया और सुप्रीम कोर्ट के ऊपर पुलिस के हेलिकॉप्टर चक्कर लगाते रहे. गिलानी के वकीलों ने फैसले से पहले कहा कि वे सजा दिए जाने पर अपने आप पद के अयोग्य नहीं हो जाएंगे. इसके अलावा उन्हें फैसले के खिलाफ अपील करने का भी अधिकार होगा. फैसले के बाद गिलानी ने साफ नहीं किया है कि क्या वह पद पर बने रहेंगे.

चौतरफा दबाव

इस मामले की शुरुआत के पीछे बहुत से पर्यवेक्षक सरकार और सेना के बीच राजनीतिक विवाद को मानते हैं. ब्रिटेन से 1947 में आजाद होने के बाद पाकिस्तान के 64 वर्षीय इतिहास में ज्यादातर समय सेना का शासन रहा है. बहुत से लोगों का कहना है कि सेना सरकार को काबू में रखने के लिए अदालत का इस्तेमाल कर रही है. पूर्व सैनिक शासक जनरल परवेज मुशर्रफ ने 2007 में भ्रष्टाचार के हजारों मामलों को बंद कर दिया था और संबंधित लोगों को आम माफी दे दी थी, जिसके बाद पाकिस्तान में संसदीय चुनाव और नागरिक शासन संभव हुआ. दो साल बाद 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने उस समझौते को अवैध करार दिया और राष्ट्रपति जरदारी के खिलाफ स्विस बैंक वाले मामले फिर से खोलने के आदेश दिए.

फैसले पर टिप्पणी करते हुए पूर्व सूचना मंत्री फिरदौस आशिक आवान ने कहा, "यह ऐतिहासिक दिन है. कोर्ट ने कानून बनाने वाले को कानून तोड़ने वाला घोषित किया है. यह पाकिस्तान में लोकतंत्र का कमजोर होना है."

एमजे/एजेए (रॉयटर्स)

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