एर्न्स्ट हाफनरः ब्लड ब्रदर्स | लाइफस्टाइल | DW | 19.12.2018
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लाइफस्टाइल

एर्न्स्ट हाफनरः ब्लड ब्रदर्स

1930 के दशक में, बर्लिन के कुछ लड़के चोरी करते हैं, अपना शरीर बेचते हैं और एक दूसरे के साथ मारपीट करते हैं. एर्न्स्ट हाफनर के इस उपन्यास में बड़े शहर की जमघट में बेघर लड़कों की एक हृदयहीन दास्तान पेश की गई है.

वेश्याओं के अंजान ग्राहकों की जेबें काटना उनकी खासियत है. इसके लिए मक्कार और बेझिझक होना जरूरी है. ब्लड ब्रदर्स (रक्त बंधु) में लुडविष, फ्रेड, वाल्टर, हंस और अन्य पथभ्रष्ट लड़के शामिल हैं, जिनकी जिंदगी बर्लिन के महानगरीय जंगल में चोरीचकारी, चोरी के सामान की खरीदफरोख्त और शरीर बेचने से चलती है.

गरीबी और देह व्यापार की दलदल

16 से 19 साल के कुछ लड़के अत्याचारी पिताओं की पिटाई से तंग आकर भाग जाते हैं. अन्य लड़के वे हैं जिन्हें उन सामाजिक कल्याण संस्थानों से बाहर फेंक दिया गया है जहां वाइमर गणराज्य के दौर में दसियों हजार लड़के रखे गए थे. इनमें से अधिकांश उन परिवारों के हैं जो पहले विश्व युद्ध में खत्म हो चुके थे, या आर्थिक कारणों से वहां हैं. वे सब के सब अपनी जड़ों से उखड़े हुए, कम उम्र के नाकाम छोकरे हैं.

"जिस क्षण उन्होंने अपना पहला अनिश्चित कदम उठाया, तबसे वो अपने मन के राजा थे. बाप मोर्चे पर था या लापता की सूची में दर्ज था. मां हथगोला बना रही थी या विस्फोटक की फैक्ट्रियों में खांसखांस कर अपने फेफड़ों से ग्राम के ग्राम कफ फेंक रही थी. आलू की तरह नहीं बल्कि शलजम की तरह फूले हुए पेटों वाले बच्चे गलियों और सड़कों पर कुछ खाने के लिए निकले रहते थे."

उस बाल-जत्थे का नारा था: "भूखे पेट, सूखे गले." बर्लिन की सीलन भरी गलियों में वे यूं ही इधर उधर भटकते रहते, रोजगार दफ्तरों के प्रतीक्षालयों की बेंचों पर झपकी लेते. जुओं से भरे हुए अड्डों और घटिया शराबघरों में लड़के कुछेक घिनौने जर्मन मार्क के लिए अपने शरीर बेचते थे.

"अत्यंत विकृत कामुकता से उतप्त माहौल में: औरतें लड़कियों से नजरें मिलाने की कोशिश करती हुईं, मर्दाना देह देखकर पुरुष कामोत्तेजित होते हुए. (...) नहाने और तेलमालिश से पस्त हो चुकीं वासनाएं, कम साफ सुथरे, लेकिन कच्ची उम्र वाले, इन कामगार लड़कों को देखकर फड़फड़ाने लगती थीं."

Buchcover Blutsbrüder von Ernst Haffner Aufbau Verlag.

एर्न्स्ट हाफनर की किताब का जर्मन संस्करण

संतप्त और विस्मृत

ये गरीबी, अपराध और वेश्यावृत्ति का दलदल है. लड़कों के इस जत्थे और उस मोहक गैंग में कोई समानता नहीं है जिसका वर्णन कुछ साल पहले "एमिल ऐंड द डिटेक्टिव्स" उपन्यास में एरिष केस्टनर ने किया था. एर्न्स्ट हाफनर, अस्तित्व के लड़ाके कलाकारों के नजरिए से धड़कते महानगर का बदसूरत पहलू दिखाते हैं.

अपने मूल शीर्षक "युगेंड आउफ डेअ लांडस्ट्राशे बेर्लिन" (यूथ ऑन द रोड ऑफ बर्लिन - बर्लिन की सड़क पर लड़के) के साथ 1932 में जब उनका उपन्यास प्रकाशित हुआ तो उस पर बहुत कम प्रतिक्रिया हुई. बहुत से आलोचक उसकी भाषा से सुन्न पड़ गए थे, उन्हें शायद लगता था कि उपन्यास की भाषा बहुत प्रचंड और उग्र है.

पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में हाफनर अपने सामाजिक पर्यावरण से भलीभांति परिचित थे. वो किताब के भीतर किसी सामाजिक रोमान को बांधने के खिलाफ थे. वो चाहते थे कि उनका लेखन, उस भाषा को अभिव्यक्त करे जो लड़के, गलियों और चौराहों पर वास्तव में बोलते थे, एकदम बेलाग, सीधी-सपाट और अरोचक.

नयी वस्तुनिष्ठ शैली में उनका धारावाहिक उपन्यास अपनी पारदर्शी, खुरदुरी और जीवंत भाषा में इतना विश्वसनीय है कि पाठकों के दिलों में उतर जाता है. उपन्यास के किरदार विली और अन्य लड़के जब अपना शरीर बेचते हैं तो उनकी भावशून्यता और स्तब्धता को महसूस कर पाठक शर्मिंदगी से सिहर उठता है. उपन्यास में अंतरंगता के मर्मस्पर्शी क्षण भी आते हैं, जैसे सिगरेट का आखिरी पैकेट पूरे जत्थे में एकजुटता के साथ शेयर किया जाने का प्रसंग है.

हाफनर का साहित्यिक सामाजिक रिपोर्ताज, नाजियों की आंख की किरकिरी था. जर्मन लड़कों को भ्रष्ट, अपराधी, वेश्या और चालू दिखाना निश्चित ही उनकी, मर्दों के नायकत्व वाली मान्यता से, मेल नहीं खाता था. 1933 में नाजियों ने अपने शुद्धिकरण अभियान के तहत अन्य लेखकों की हजारों किताबों की तरह हाफनर की किताब पर भी प्रतिबंध लगा दिया.

युद्ध के दौरान हाफनर के बारे में भी सारी मालूमात गायब हो गई. नृशंसता के शिकार आवारा लड़कों का जितना सटीक चित्रण उन्होंने किया, उतनी ही बहुत कम जानकारी उनके अपने बारे में उपलब्ध है. उनकी कोई तस्वीर नहीं है, कोई और किताब भी नहीं है. एर्न्स्ट हाफनर जर्मन साहित्य के एक प्रमुख अजनबी बने हुए हैं, आज तक.

एर्न्स्ट हाफनर: ब्लड ब्रदर्स, विंटेज पब्लिशिंग (जर्मन शीर्षकः ब्लुट्सब्रूडर), 1932

एर्न्स्ट हाफनर के बारे में जो थोड़ी बहुत जानकारी उपलब्ध है उसके मुताबिक वो 1925 से 1933 तक बर्लिन के पंजीकृत निवासी थे और पत्रकार तथा सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम करते थे. 1938 में उन्हें राइष साहित्य प्रकोष्ठ में शामिल किया गया था. उसके बाद उनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती.

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