इस्लामाबाद में पहला हिंदू मंदिर बनाने पर छिड़ा विवाद | दुनिया | DW | 02.07.2020
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दुनिया

इस्लामाबाद में पहला हिंदू मंदिर बनाने पर छिड़ा विवाद

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में बनने वाला पहला हिंदू मंदिर विवादों में घिर गया है. मंदिर बनाने के सरकार के फैसले से जहां हिंदू अल्पसंख्यक खुश हैं, वहीं धार्मिक मुस्लिम तबकों में इसका खूब विरोध हो रहा है.

पाकिस्तान में हिंदु

पाकिस्तान में अब लगभग 80 लाख हिंदू बचे हैं

इस्लामाबाद में पहले हिंदू मंदिर का निर्माण पिछले दिनों शुरू हुआ. यह श्री कृष्ण मंदिर एक कम्प्लेक्स नुमा इमारत में होगा. इस कॉम्प्लेक्स में शमशान घाट, कम्यूनिटी हॉल, लोगों के ठहरने की जगह और पार्किंग की व्यवस्था होगी. इस मंदिर के निर्माण की अनुमति 2017 में पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) सरकार ने दी थी, लेकिन कई वजहों से इसके निर्माण में देर होती चली गई.

पाकिस्तान की हिंदू काउंसिल के मुताबिक देश में रहने वाले हिंदुओं की आबादी लगभग 80 लाख है. इनमें से ज्यादातर दक्षिणी सिंध प्रांत में रहते हैं. विभाजन के समय पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी लगभग 25 प्रतिशत थी. इनमें एक बड़ी आबादी सिंध और उस वक्त के पूर्वी पाकिस्तान (मौजूदा बांग्लादेश) में रहने वाले हिंदुओं की थी. अब पाकिस्तान में सिर्फ पांच प्रतिशत अल्पसंख्यक बचे हैं.

मंदिर का विरोध

इस्लामाबाद में हिंदू मंदिर बनाने के कदम को उदारवादी तबकों ने सराहा है. लेकिन पाकिस्तान के बहुसंख्यक मुसलमानों के कुछ तबकों में इसका पुरजोर विरोध हो रहा है. लाहौर की जामिया अशरफिया के एक फतवे में मंदिर बनाए जाने पर कड़ी आपत्ति की गई है. इस फतवे को लेकर सोशल मीडिया पर भी बहस हो रही है.

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अतीत में इस्लामाबाद की लाल मस्जिद से जुड़ी रही शौहदा फाउंडेशन ने भी इसका विरोध किया और मंदिर निर्माण के खिलाफ अदालत जाने की चेतावनी दी है. फाउंडेशन का तर्क है कि मंदिर बनाने के लिए सरकारी जमीन नहीं दी जा सकती.

जामिया हफसा मदरसे की प्रिंसीपल उम हसान ने भी इसका विरोध किया है. उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, "इस्लाम ऐसे किसी नए मंदिर के निर्माण की इजाजत नहीं देता. सरकार का यह कदम शरियत के खिलाफ है क्योंकि अगर कोई पुराना शहर है जहां पहले से ही हिंदू और मुसलमान रह रहे हों और वहां पहले से ही मंदिर मौजूद हो तो उस मंदिर को काम करने की इजाजत दी जा सकती है. वहां पर पूजा अर्चना हो सकती है. लेकिन सरकार नए मंदिर नहीं बना सकती. हमने पहले भी इसके खिलाफ विरोध दर्ज कराया है और हम अब भी इसका विरोध करेंगे."

वीडियो देखें 01:58

पाकिस्तान में फिर खुला 350 साल पुराना मंदिर

हिंदू मायूस

मुस्लिम धार्मिक तबकों के इस रवैये और विरोध की वजह से अल्पसंख्यकों और खासकर हिंदुओं में मायूसी है. सिंध के मिट्ठी से हिंदू समुदाय के नेता कृष्ण शर्मा ने इस बारे में डीडब्ल्यू के साथ बातचीत में कहा, "यह विरोध सकारात्मक नहीं है क्योंकि हम भी इस देश के नागरिक हैं. इसलिए हमें इस प्रतिक्रिया पर अफसोस भी हुआ और मायूसी भी. पाकिस्तान के संविधान के मुताबिक सब नागरिक बराबर हैं और पाकिस्तान को लेकर कायदे आजम (मोहम्मद अली जिन्नाह) की जो अवधारणा थी, उसके मुताबिक स्टेट का धार्मिक मामलों से कोई लेना देना नहीं है."

उन्होंने कहा, "मेरे विचार से सरकार को इस विरोध को गंभीरता से लेना चाहिए और इस बात को सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि देश के सभी नागरिक अपने धार्मिक मामलों पर आजादी से काम कर पाएं."

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पाकिस्तान हिंदू काउंसिल के नेता और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य डॉ. जयपाल ने डीडब्ल्यू से कहा, "हम इस बात का स्वागत करते हैं कि सरकार ने मंदिर बनाने का काम शुरू कर दिया है. लेकिन मैं इस बारे में चिंतित हूं और मुझे अफसोस भी है कि कुछ तत्व इसका विरोध कर रहे हैं. उन्हें कायदे आजम का 11 अगस्त का भाषण सुनना चाहिए जिनमें जिन्नाह ने सभी नागरिकों को बराबर अधिकार देने की बात कही है. तो जो लोग विरोध कर रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि हम भी बराबर के नागरिक हैं."

पाकिस्तान के प्रगतिशील तबके मंदिर के विरोध को सही नहीं मानते. लाहौर से संबंध रखने वाले बुद्धिजीवी फारूक तारिक कहते हैं, "हमारे मौलवी पूरी दुनिया में मस्जिदें बना रहे हैं और वे यहां अल्पसंख्यकों को दबा कर रखना चाहते हैं. यह पाखंड नहीं तो और क्या है. यूरोप में तो मौलवी मस्जिदें और मदरसे बनाने के लिए वहां की सरकारों से मदद ले रहे हैं और यहां एक मंदिर बनाने पर इतना शोर मचा रहे हैं. हम इस निर्माण को एक सकारात्मक कदम समझते हैं और जो मौलवी इसका विरोध कर अपनी सियासत चमका रहे हैं, हम उनकी निंदा करते हैं."

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