अफसरों के राजनीति में आने से सुलझेंगी समस्याएं | ब्लॉग | DW | 07.09.2018
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ब्लॉग

अफसरों के राजनीति में आने से सुलझेंगी समस्याएं

भारत में एक और सरकारी अधिकारी ने सत्ताधारी पार्टी में शामिल होने का फैसला किया है. भारत को अब अफसरों को राजनीतिक दलों में शामिल होने का अधिकार दे देना चाहिए.

रायपुर के जिलाधिकारी ओपी चौधरी ने भारतीय प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देकर बीजेपी ज्वाइन कर ली है. उन्होंने कहा है कि ऐसा उन्होंने देश की सेवा करते रहने के लिए किया है. 2005 बैच के आईएएस चौधरी का ग्रासरूट स्तर पर सरकारी नीतियों को लागू करने वाली सेवा का समय खत्म हो रहा था और भविष्य में उन्हें सचिवालय में नीति बनाने का काम करना होता. लोगों की सीधी सेवा के लिए वे नौकरी छोड़कर चुनाव से पहले राजनीति में कूद रहे हैं. पार्टी को एक कद्दावर युवा नेता मिल रहा है. चौधरी के इस फैसले का इस्तेमाल इस बहस के लिए भी होना चाहिए कि सरकारी अफसरों को राजनीति में शामिल होने का मौका मिले.

भारतीय लोकतंत्र का एक स्तंभ नौकरशाही की तटस्थता है. लेकिन अगर देश भर के राजनीतिक परिदृश्य को देखा जाए तो शायद ही कहीं ये तटस्थता दिखती है. सरकारी नौकरी से राजनीति में जाने के युवा जिलाधिकारी ओपी चौधरी जैसे मामले कम रहे हैं लेकिन इतने कम भी नहीं कि उन्हें नजर अंदाज किया जाए. रिटायर होने के बाद पसंदीदा राजनीतिक दलों में शामिल होने और बाद में मंत्री बनने के मामले कई हैं. 35 से कम उम्र के 65 फीसदी लोगों के देश भारत में राजनीति रिटायर्ड अधिकारियों का अखाड़ा न बन जाए इसके लिए जरूरी है कि सरकारी कर्मचारियों को राजनीतिक दलों में शामिल होने का हक मिले.

इसके कई फायदे हैं. सरकारी कर्मचारियों को नागरिक होने का सामान्य अधिकार मिल पाएगा जिसमें चुनाव लड़ना और चुना जाना शामिल है. राजनीतिक दलों को प्रशिक्षित प्रशासनिक कुशलता वाले सदस्य मिलेंगे. सरकारी सेवा में कुशल महिलाओं के होने का लाभ राजनीतिक दलों को मिलेगा. संसद और विधान सभाओं में महिला भागीदारी को जल्द बढ़ाया जा सकेगा. और पार्टी में पक्के सदस्यों के होने से राजनीतिक दलों की संवैधानिक जिम्मेदारी भी बढ़ेगी. राजनीतिक दल समान संवैधानिक नैतिकता के आधार पर राजनीति कर पाएंगे.

इस व्यवस्था की सबसे बड़ी आलोचना ये होती है कि अधिकारियों को तटस्थ होना चाहिए और यदि वे राजनीतिक दलों के सदस्य हैं तो वे तटस्थ नहीं रहेंगे. तटस्थता विचारों से नहीं व्यवहार से होती है. राजनीतिक दलों के सदस्यों को भी सरकारी पदों पर रहते हुए, भले ही वे मंत्री या सांसद जैसे निर्वाचित पद हों, पार्टी का नहीं बल्कि राज्य का प्रतिनिधित्व करना चाहिए और संविधान की शपथ के अनुरूप फैसले लेने चाहिए. यह काम वे भविष्य में भी कर पाएंगे.

सबसे बड़ी बात ये होगी कि सरकारी अधिकारी यदि पार्टियों के सदस्य बन सकते हैं तो वे बिना डर के या तो निर्वाचित सरकारों के कामों का समर्थन कर पाएंगे या उसका विरोध कर पाएंगे. वे खुलकर अपने विचार रख पाएंगे और अपने पद की गोपनीयता के साए में नहीं छुपेंगे. सरकारी अधिकारी पढ़े लिखे इंसान हैं, उनकी अपनी राजनीतिक सोच होती है, जिसे वे निजी बातचीत में अभिव्यक्त भी करते हैं. उन्हें इसकी आजादी न मिले इसका कोई औचित्य नहीं. राजनीतिक दलों में उनकी भागीदारी का अधिकार एक ऐसे विशेषाधिकार को खत्म करेगा जो सिर्फ चुनिंदा अधिकारियों को राजनीति की चोटी पर पहुंचाता है. उनकी भागीदारी से राजनीति को व्यापक और समतामूलक बनाना संभव होगा. राजनीति से लोगों का मोहभंग खत्म होगा, उससे डर खत्म होगा और नए लोग राजनीति में आएंगे.

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