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मनोरंजन

जर्मन बोलते हैं शाहरुख?

टीवी पर जर्मन बोलते हुए शाहरुख और अमिताभ झगड़ रहे थे, जया रो रही थी. ऐसे में संवेदनाओं के मामले में रूखे जर्मन भी रो पड़े. आखिर कैसे बोलते हैं शाहरुख जर्मन?

2005 में जर्मन टीवी चैनल आरटीएल ने शनिवार रात प्राइम टाइम में 'कभी खुशी, कभी गम' दिखाने का दांव खेला. फिल्म जर्मन में डब की गई थी. फिल्म दिखाए जाने से पहले टीवी पर जो ट्रेलर चले, उसमें अमिताभ कहते कि, "ऐसा क्यों होता कि एक बाप अपने बेटे से ये नहीं कह पाता कि वो उससे कितना प्यार करता है. उसे गले लगाकर क्यों नहीं कह पाता कि आई लव यू माई सन."

भावनाओं के इजहार के मामले में जर्मनों को बेहद रूखा माना जाता है. जर्मनी में आम तौर पर बच्चे जवान होते ही घर छोड़ देते हैं. कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वे अलग दुनिया में रहते हैं. बच्चे नहीं चाहते कि मां बाप उन पर अपनी मर्जी थोपें. ऐसे समाज में कई भावनाएं दिल में दबी रह जाती हैं. 'कभी खुशी, कभी गम' ने भावनाओं के इस गुबार पर चोट की. बाप बेटे के झगड़े में पिसी मां के आंसू हर किसी को पिघला गए. आंखें डबडबा उठीं. फिल्म हृदय में अंर्तनाद कर गई.

मजबूत डबिंग उद्योग

इस सफलता में बढ़िया डबिंग का भी अहम योगदान है. 57 साल के पास्कल ब्रोएर शाहरुख खान की डबिंग मशहूर हैं. उनकी आवाज में शाहरुख जैसे भाव हैं. पास्कल के सामने जब पहली बार बॉलीवुड फिल्म की डबिंग का प्रस्ताव आया तो वे हैरान हुए, "मैं आरटीएल के स्टूडियो में बैठा था. डायरेक्टर ने मुझसे पूछा कि क्या मैं भारतीय फिल्मों के लिए आवाज देना चाहूंगा. मुझे लगा कि यहां बॉलीवुड की कौन बात करता है. बहरहाल मैंने हां कह दिया, बाकी तो आप जानते ही हैं."

Synchronsprecher Pascal Breuer

पास्कल ब्रोएरः शाहरुख की जर्मन आवाज

वक्त बीतने के साथ वो भी बॉलीवुड की गहराई में घुसे, "मुझे बॉलीवुड की फिल्में पसंद है. हां, उनमें से कुछ अच्छी तो कुछ बुरी होती हैं. ये फिल्में वाकई में बाकी फिल्मों से अलग होती हैं, नौटंकी टाइप. बॉलीवुड की फिल्मों में भावनाएं भरी होती हैं."

"हर फिल्म का अपना मजा है, लेकिन पहेली में मुझे बहुत मजा आया. देवदास जबरदस्त थी. स्वदेस बहुत ही ईमानदारी से भरी फिल्म थी और असोका अद्भुत थी. लेकिन अफसोस की बात यह है कि असोका का जर्मन संस्करण बहुत अच्छी तरह डब नहीं हो पाया. मुझे उसे टीवी के हिसाब से बोलना पड़ा."

जर्मनी विदेशी फिल्मों की बढ़िया डबिंग के लिए मशहूर है. पास्कल कहते हैं, "हमारे यहां डबिंग में पहले एक कच्चा अनुवाद किया जाता है. उसके बाद बहुत ही बारीकी से फिल्म देखकर डबिंग के हिसाब से फिट बैठने वाला अनुवाद किया जाता है. डबिंग होठों की बुदबुदाहट के हिसाब से होनी चाहिए और साथ ही किरदार के चरित्र के साथ भी उसे बैठना चाहिए. जैसे किसान की भाषा वकील की भाषा से अलग होगी."

काजोल की डबिंग नताशा गाइजलर करती हैं. गाइजलर ने पहली बार खिलाड़ी फिल्म के लिए काजोल की डबिंग की. तब से वह छह फिल्मों में काजोल को जर्मन आवाज दे चुकी हैं. सैफ अली खान की जर्मन आवाज फिलिप मूग हैं. सलमान खान के लिए ओले फेनिंग आवाज निकालते हैं. भारत में फिल्म रिलीज होने के कुछ ही समय बाद अब फिल्में जर्मनी में रिलीज हो जाती हैं. हर शहर के बड़े सिनेमाघरों में उनके खास शो होते हैं.

Bollywood The Show Indisches Musical für Europa

बॉलीवुड का बढ़ता दायरा

फीकी पड़ी चमक

फिल्मों की संख्या के लिहाज से बॉलीवुड दुनिया का सबसे बड़ा फिल्म उद्योग है. दूसरे नंबर पर नाइजीरिया की फिल्म इंडस्ट्री नॉलीवुड है. लेकिन दोनों ही हॉलीवुड के आगे फीके दिखते हैं. बॉलीवुड की पहचान नाच गाने के लिए ज्यादा होती है. जर्मनी में लोकप्रियता का एक दौर देखने के बावजूद बॉलीवुड नाच गाने की छवि से बाहर न आ सका. हालांकि अब धीरे धीरे आमिर खान भी चर्चा में आ रहे हैं. 2011 में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल की ज्यूरी में शामिल आमिर को जर्मन मीडिया ने भारत का होनहार और गंभीर अभिनेता और फिल्म निर्माता कहा. अनुराग कश्यप की फिल्मों को भारतीय सिनेमा में रुचि रखने वालों ने पंसद किया. लेकिन ऐसे सिनेमा प्रेमियों की संख्या कम है.

बॉन यूनिवर्सिटी में इंडोलॉजी विभाग की लेक्चरर यूस्टीना कुरोवस्का कहती हैं, "लोकप्रियता के दौर में यूरोप में भारत की कई व्यावसायिक फिल्में आईं. उनकी कहानी कमजोर थी. नाच गाना ही ज्यादा था. पोलैंड में ऐसी फिल्मों की डीवीडी काफी सस्ती बिकी. लोगों ने शुरुआत में खूब फिल्में खरीदीं लेकिन धीरे धीरे वो ऊब गए. अब उन्हें लगता है कि बॉलीवुड का मतलब ही बेमतलब की फिल्म है. इस वजह से वे बॉलीवुड को गंभीरता से नहीं ले रहे."

मोनिका जोन्स कहती हैं, "2005 में जो शुरुआत हुई वो 2008 या 2009 के बाद फीकी सी पड़ गई. लेकिन भारतीय फिल्मों के लिए दरवाजा तो खुल ही गया है. यह कहना ही होगा कि ये काम शाहरुख खान ने किया. अब भले ही भारतीय सिनेमा के बारे में यहां कम बात होती हो लेकिन जर्मनी और पश्चिमी देशों में यह संदेश जा चुका है कि भारत की फिल्म इंडस्ट्री, भले ही आप इसे बॉलीवुड कहें या हिंदी सिनेमा या कुछ और, बड़ी दिलचस्प है. मुझे नहीं लगता यह दरवाजा अब कभी बंद हो सकता है."

रिपोर्टः ओंकार सिंह जनौटी

संपादनः अनवर जे अशरफ

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