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दुनिया

हर बच्चे को पहचान की जरूरत

ऐसे करोड़ों बच्चे हैं जिनके जन्म को सरकारी तौर पर कभी दर्ज ही नहीं किया गया. पांच साल से कम उम्र का हर तीसरा बच्चा अपने जन्म का प्रमाण न होने की वजह से शिक्षा और स्वास्थ्य के मूलभूत अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर पाता.

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष यूनिसेफ का एक शोध बताता है कि दुनिया भर में करीब 23 करोड़ बच्चों के जन्म का पंजीकरण कभी किया ही नहीं गया. अपंजीकृत बच्चों की ये संख्या इंडोनेशिया जैसे देश की पूरी आबादी जितनी है. "इन बच्चों की कहीं गिनती ही नहीं होती," जर्मनी में बच्चों के अधिकारों के लिेए काम करने वाली संस्था किंडरनोटहिल्फे के युर्गन श्यूबेलिन कहते हैं. "और जिनकी गिनती ही नहीं होती उनके अधिकार कैसे हो सकते हैं." जन्म के प्रमाण के अभाव में ये बच्चे स्कूल में दाखिला लेने, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा की अन्य योजनाओं का फायदा भी नहीं उठा पाते.

पहचान एक मूलभूत अधिकार

श्यूबेलिन कहते हैं, "जिन देशों में सभी नए जन्मे बच्चों, छोटे बच्चों, किशोरों और युवाओं की पहचान कर उन्हें इसका लिखित प्रमाण नहीं दिया जा सकता वहां मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है. पंजीकृत किया जाना हर इंसान का अधिकार है."

इस अधिकार का उल्लेख संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकार समझौते में भी है. धारा सात के अनुसार हर बच्चे का जन्म के तुरन्त बाद ही पंजीकरण होना चाहिए. समझौते में ये भी कहा गया है कि जन्म लेने वाले हर बच्चे को नाम के साथ साथ राष्ट्रीयता मिलने का भी मूलभूत अधिकार है. अमेरिका और सोमालिया को छोड़ कर संयुक्त राष्ट्र के हर सदस्य देश ने इस समझौते का समर्थन भी किया है.

यूनिसेफ के एक अध्ययन के मुताबिक अफ्रीका के साथ साथ एशिया और दक्षिण अमेरिका के कुछ देशों में जन्म के पंजीकरण के नियम की बहुत अनदेखी हो रही है. पंजीकरण की सबसे खराब दर दर्ज करने वाले दस में से आठ देश अफ्रीकी हैं. सोमालिया, लाइबेरिया और इथियोपिया में तो दस में से सिर्फ एक जन्म ही दर्ज होता है. पाकिस्तान और यमन भी पंजीकृत जन्मों की दर के हिसाब से दुनिया में सबसे पीछे रह गए देशों में शामिल है.

गरीबी और भेदभाव हैं जिम्मेदार

बच्चों के जन्म को दर्ज न करवा पाने के पीछे सबसे बड़ी वजह है गरीबी. श्यूबेलिन का मानना है कि गावों और शहरों की झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों के लिए पंजीकरण कार्यालय तक जाना बहुत कठिन होता है. गावों के लोगों को बच्चे का जन्म कराने के लिए पास के बड़े शहर जाना पड़ता है. इस काम के लिए उनके पास समय और पैसे दोनों का अभाव होता है. कुछ अन्य मामलों में बच्चों के मां बाप के पास खुद भी कोई पहचान पत्र नहीं होता जिसकी वजह से वो वहां जाने से कतराते हैं.

मानव तस्करों के निशाने पर

चाहे फिलिपींस के तूफान हों या कोई और प्राकृतिक आपदा, ऐसी स्थिति में अपंजीकृत बच्चों पर खास तौर से खतरा मंडराता है. जनवरी 2012 में हैती में आए भूकंप के बाद बड़ी संख्या में बच्चो के अपहरण का खतरा पैदा हो गया क्योंकि यह बच्चे अपने परिवारों से बिछड़ गए थे. श्यूबेलिन कहते हैं, "भूकंप के तुरन्त बाद कई उत्तर अमेरिकी संस्थाओं ने बच्चों को देश से बाहर निकालने और मानव तस्करी करने की कोशिश भी की थी."

ऐसे समय में बच्चों को बचाने के लिए कई कदम उठाए गए. बाल सुरक्षा केन्द्रों की स्थापना की गई और बच्चों का नामकरण कर उनके गले में नाम लिखे गत्ते टांग दिए गए. "ऐसे बच्चों को उस समय सिर्फ एक नाम दिए जाने से पहचान मिली और बहुत सारे लोग उन्हें बचाने में मदद कर पाए," श्यूबेलिन कहते हैं.

बच्चों का पंजीकरण कई बार क्यों नहीं होता है, इसके पीछे के कारणों को पहचानना इसे सुधारने की तरफ पहला कदम होगा. पंजीकरण की ऊंची फीस, अपने अधिकारों को न जानना, सांस्कृतिक बाधाएं या फिर किसी तरह की धार्मिक बाधा को भी दूर करने की जरूरत है. ऐसे में कोसोवो और युगांडा जैसे देशों से प्रेरणा लेनी चाहिए जहां बच्चे के माता पिता नवजात शिशुओं को पैदा होने के कुछ ही देर बाद अपने मोबाइल फोन से दर्ज करा सकते हैं. इस काम में पहले कई महीने लग जाते थे.

रिपोर्टः एम गेयरके/ऋतिका राय

संपादनः मानसी गोपालकृष्णन

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