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मुबारक गए पर बधाइयां जारी

१२ फ़रवरी २०११

नील नदी के आंचल से निकले सूरज की लाली ने जब मीनारों के शहर पर रोशनी डाली तो देखा वो पहले से ही दमक रहा था, ये तानाशाही की काली छाया के खत्म होने से उभरी चमक थी जो पूरे 30 साल बाद मिस्र को रोशन करने चली है.

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तस्वीर: dapd

दुनिया भर में क्रांति का प्रतीक बन चुके तहरीर चौक पर अब भी उन लोगों का जमावड़ा है जो ये तय करने के बाद ही घर जाना चाहते हैं कि देश में सचमुच लोकतंत्र आ गया है. 18 दिन की क्रांति के बाद मिली मंजिल पर पहुंच कर भी कईयों को यकीन नहीं आ रहा कि मुबारक सचमुच देश की सत्ता के लिए भूतपूर्व हो चुके हैं. 18 दिन से काहिरा की सड़कों पर रातें बिता रहे हजारों लोग अब धीरे धीरे अपने घरों की ओर लौटने लगे हैं. दिल में जज्बात का तूफान है और मन में आजादी के उमंगों की लहर. 25 जनवरी से ही तहरीर स्क्वेयर पर खेमा गाड़े दुकानदार गोमा अब्देल मकसूद कहते हैं, "मैंने आज तक लोगों के चेहरे पर इतनी खुशी नहीं देखी थी हमें और क्या चाहिए."

काहिरा की सड़कों पर अब भी युवा प्रदर्शनकारियों का रेला है. हालांकि बहुतों के मन में आशंकाएं हैं और उनके लिए मुबारक का जाना भर ही काफी नहीं. यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर नदल सक्र कहते हैं, "प्रदर्शनकारियों को तब तक रुकना चाहिए जब तक सेना लोकतंत्र बहाल करने के बारे में वो बयान जारी नहीं कर देती जिसका वादा किया गया है." देश का शासन अब सेना के हाथ में है. मिलिट्री कमांडर सत्ता के गलियारे में अचानक खाली हुए जगह को भरने के लिए तो आ गए हैं लेकिन ये आशंका सबके मन में है कि क्या सचमुच लोगों को लोकतंत्र नसीब होगा. अभी तक ये तय नहीं है कि भावी सरकार का स्वरूप क्या होगा या लोकतंत्र की बहाली का ख्वाब कैसे पूरा होगा. लोगों का कहना है कि अगर सेना ने उनसे लोकतंत्र का अधिकार छीनने की कोशिश की तो प्रदर्शन फिर जोर पकड़ेगा. 26 साल के युवा प्रदर्शन कारी मोहम्मद रिदा कहते हैं, "हम सेना का शासन नहीं चाहते. हम अनुभवी लोगों के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार चाहते हैं."

Ägypten Proteste auf dem Tahrir Platz in Kairo
तस्वीर: picture-alliance/dpa

इस वक्त रक्षा मंत्री मोहम्मद हुसैन तंतावी जो सैन्य प्रमुख भी है के हाथों में ही देश की बागडोर है. जानकारों के मुताबिक सेना के दखल की वैधानिकता विवाद का विषय है. मिस्र में संविधान भी इस तरह से बनाया गया था कि वो मुबारक जैसे तानाशाहों के हित की रक्षा कर सके. अब लोग चाहते हैं कि इस संविधान को कचरे के डिब्बे में डाल दिया जाए और नया संविधान बने.

ऐसी खबरें आ रही है कि सेना की उच्च स्तरीय परिषद संसद को भंग कर एक अंतरिम प्रशासन का गठन करेगी जिसके मुखिया सर्वोच्च संवैधानिक अदालत के प्रमुख होंगे. देश में राष्ट्रपति का चुनाव होने से पहले अंतरिम प्रशासन नए संविधान का प्रारूप तैयार करेगा या फिर पुराने संविधान में संशोधन कर उसे लोगों की इच्छा के अनुरूप बनाएगा. इसके साथ ही संसद का भी चुनाव करा लिया जाएगा.

ज्यादातर मिस्रवासी इस बात के लिए निश्चिंत हैं कि सेना का शासन अस्थायी है और जल्दी ही देश में पहले लोकतांत्रिक सरकार के बनने का रास्ता साफ हो जाएगा. तहरीर चौक पर खुशी मनाते लोगों की भीड़ में मौजूद तामेर हुसैन कहते हैं, "सेना और जनता एक हैं. सेना ने ये साबित किया है कि वो लोगों के साथ है मुबारक के नहीं और हमें पूरी उम्मीद है कि सेना देश में लोकतंत्र बहाल करेगी."

वैसे पूरे देश में जो खुशी की लहर है उसके बीच ज्यादातर लोगों ने इस बारे में सोचने का काम कल पर छोड़ रखा है. आज तो वो बस जश्न मनाना चाहते हैं और उम्मीदों के सूरज को पूरी चमक के साथ आसमान में चढ़ते देखना चाहते हैं. मिस्र के लिए इस सुबह की शाम नहीं.

रिपोर्टः एजेंसियां/एन रंजन

संपादनः ओ सिंह