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डिटेंशन सेंटर पर हाईकोर्ट के फैसले से असम सरकार को झटका

प्रभाकर मणि तिवारी
९ अक्टूबर २०२०

असम में विदेशियों के लिए जेलों में बने डिटेंशन सेंटर के मुद्दे पर गौहाटी हाईकोर्ट के फैसले ने राज्य सरकार को झटका दिया है. असम में एनआरसी में शामिल होने में विफल रहने वाले लोगों के लिए डिटेंशन सेंटर बनाया जा रहा है.

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Während Indiens erstes Lager für illegale Einwanderer gebaut wird,  befürchten einige Arbeiter, dort festgehalten zu werden.
तस्वीर: REUTERS/A. Hazarika

अदालत ने कहा है कि राज्य की जेलों में स्थायी तौर पर डिटेंशन सेंटर नहीं चलाया जा सकता और इसके लिए वैकल्पिक इंतजाम किया जाना चाहिए. केंद्र सरकार ने इन सेंटरों के लिए सरकार को दिशानिर्देश भेजा था. हाईकोर्ट ने सरकार से उन दिशानिर्देशों को लागू करने पर भी 16 अक्टूबर के भीतर जवाब मांगा है. उसी के बाद इस मामले की अगली सुनवाई होगी.

अदालत ने कहा है कि इन सेंटरों में रहने वाले कैदियों और विदेशी घोषित लोगों को हमेशा कैद में नहीं रखा जा सकता और उनको मौलिक अधिकारों और गरिमा से वंचित नहीं किया जा सकता. इस मुद्दे पर दायर कई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान अदालत ने उक्त निर्देश दिया.

प्रधानमंत्री मोदी का दावा गलत

असम की छह जेलों में बने डिटेंशन सेंटर शुरू से ही विवादों के केंद्र में रहे हैं. खासकर नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) लागू होने के बाद ऐसे सेंटर लगातार सुर्खियों में रहे हैं. इन सेंटरों में कैदियों के अमानवीय हालात और उनकी मौतों की खबरें भी अकसर सुर्खियां बटोरती रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी इस मुद्दे पर गलतबयानी के आरोप लग चुके हैं. उन्होंने बीते साल दिल्ली के रामलीला मैदान की एक रैली में दावा किया था कि असम में एक भी डिटेंशन सेंटर नहीं है. लेकिन हकीकत यह है कि राज्य की छह जेलों - ग्वालपाड़ा, जोरहाट, डिब्रुगढ़, कोकराझाड़, सिलचर और तेजपुर में लंबे अरसे से ऐसे सेंटर चल रहे हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इन छह सेंटरों में 425 लोग रह रहे हैं. कोरोना की वजह से फिलहाल इनमें से 350 लोग जमानत पर बाहर हैं.

न्यायमूर्ति एएमबी बरुआ ने इस मुद्दे पर दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में भीम सिंह बनाम भारत सरकार के मामले का हवाला देते हुए कहा कि शीर्ष अदालत का साफ निर्देश है कि ऐसे कैदियों को वापस नहीं भेजे जाने तक समुचित जगह रखा जाना चाहिए और ऐसे सेंटरों में बिजली, पानी और साफ-सफाई समेत तमाम मौलिक सुविधाएं मुहैया कराई जानी चाहिए. अदालत ने कहा कि इन केंद्रों को जेल परिसरों से बाहर स्थापित किया जाना चाहिए. अगर इसके लिए समुचित जगह उपलब्ध नहीं है और जमीन अधिग्रहण या निर्माण में दिक्कत है तो सरकार को समुचित इमारतों को किराए पर लेना चाहिए. उसने सरकार से अगली सुनवाई से पहले इन डिटेंशन सेंटरों को जेल परिसर से बाहर ले जाने की दिशा में उठाए गए कदमों पर हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है.

हाईकोर्ट ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से वर्ष 2014 में भेजे गए उन दिशानिर्देशों का भी हवाला दिया जिसमें डिटेंशन सेंटर को जेल परिसर से बाहर स्थापित करने की बात कही गई थी. अदालत का कहना था कि असम सरकार इस बारे में सुप्रीम कोर्ट और केंद्र के दिशानिर्देशों को लागू करने में नाकाम रही है. दूसरी ओर, असम सरकार की दलील है कि केंद्र ने वर्ष 2018 में एक अधिसूचना के जरिए अस्थायी तौर पर जेल परिसरों में डिटेंशन सेंटर चलाने की इजाजत दी थी. लेकिन हाईकोर्ट का कहना था कि ऐसे सेंटर तो पांच से लेकर दस साल तक से चल रहे हैं. ऐसे में केंद्र की अधिसूचना की आड़ में इनको सही नहीं ठहराया जा सकता.

Während Indiens erstes Lager für illegale Einwanderer gebaut wird,  befürchten einige Arbeiter, dort festgehalten zu werden.
जो नागरिक नहीं वे डिटेंशन सेंटर मेंतस्वीर: REUTERS/A. Hazarika

आधा परिवार एनआरसी में, आधा बाहर

असम ने बीते साल अगस्त में एनआरसी की अपडेटेड सूची जारी की थी. उसके मुताबिक 24 मार्च 1971 के बाद आने वालों को नागरिक नहीं माना जाएगा. लेकिन एनआरसी की अंतिम सूची से लगभग 19 लाख लोगों के नाम बाहर थे. अब अगर विदेशी न्यायाधिकरणों के समक्ष उनकी अपील खारिज हो जाती है तो उनको डिटेंशन सेंटर में भेज दिया जाएगा. केंद्र सरकार ने इस साल मार्च में संसद में बताया था कि असम के छह डिटेंशन सेंटरों में 3,331 लोग रह रहे हैं. हालांकि उसके बाद सैकड़ों लोगों को रिहा किया जा चुका है. लेकिन असम सरकार ने इस साल 31 अगस्त को विधानसभा में बताया था कि इन सेंटरों में 425 लोग ही रह रहे हैं और उनमें से भी 350 को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कोरोना की वजह से जमानत पर रिहा किया जा चुका है. केंद्र व राज्य सरकारों के दावों के उलट राज्य के छह डिटेंशन सेंटरों की हालत पर अकसर सवाल उठते रहे हैं. वहां रहने वालों को आम कैदियों की तरह न तो काम करने का अधिकार है और न ही पैरोल समेत दूसरी सुविधाएं हासिल हैं.

एनआरसी से बाहर रहे ज्यादातर लोगों का दावा है कि वे भारतीय नागरिक हैं लेकिन समुचित दस्तावेज नहीं होने की वजह से उनके नाम सूची में शामिल नहीं हैं. कई परिवारो में तो आधे लोग सूची में हैं और आधे बाहर. कहीं पति का नाम एनआरसी में है तो पत्नी और बच्चों के नाम बाहर. इस मुद्दे पर राज्य में बड़े पैमाने पर आंदोलन और हिंसक प्रदर्शन हो चुके हैं. नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) की अंतिम सूची जारी होने के बाद केंद्र के निर्देश पर ग्वालपाड़ा जिले के मतिया में राज्य का सबसे बड़ा डिटेंशन सेंटर बनाया जा रहा है. उसमें तीन हजार विदशियों को रखने की क्षमता होगी. लेकिन सवाल यह है कि इन सेंटरों में कथित विदेशियों को आखिर कितने दिनों तक रखा जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि ऐसे सेंटर में तीन साल बिता चुके लोगों को सशर्त जमानत पर रिहा किया जा सकता है.

Indien Maloibari
सही दस्तावेज को तरसते लोगतस्वीर: Murali Krishnan

अमानवीय परिस्थितियों में रहने पर मजबूर

डिटेंशन सेंटर में मौलिक सुविधाओं की कमी और वहां के अमानवीय हालात पर अदालत में विभिन्न वकीलों और संगठनों की ओर से कई जनहित याचिकाएं दायर की गई थीं. शोधकर्ताओं के संगठन स्टूडियो नीलिमा के बैनर तले दायर इन याचिकाओं में अदालत से इस मुद्दे पर सरकार को दिशानिर्देश देने की अपील की गई है. स्टूडियो नीलिमा के सह-संस्थापक और निदेशक अबंती दत्त कहते हैं, "असम में एनआरसी के बाद उपजे परिदृश्य में सिविल सोसायटी की बैठक में इस मुद्दे पर अदालत का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया गया था.”

इस संगठन से जुड़े एडवोटेकेट अमन वदूद बताते हैं, "बेहद भीड़-भाड़ वाले जेल परिसर में बीते एक दशक से विदशी घोषित लोगों और विदेशी नागरिकों को बेहद अमानवीय परिस्थितियों में रखा गया है. अदालत के हस्तक्षेप से ऐसे लोगों को कम से कम मौलिक सुविधाएं मिल सकेंगी.” ऑल असम लॉयर्स एसोसिएशन के संयुक्त सचिव टी दास बताते हैं, "हमारा मकसद इन केंद्रों में रहने वाले लोगों को उनके देश वापस नहीं भेजे जाने तक मौलिक सुविधाएं मुहैया कराना है. अब अदालती दखल से इन सेंटरों में रहने वालों की हालत में सुधार की उम्मीद है.”

नॉर्थ ईस्ट लिंगुइस्टिक एंड एथनिक कोआर्डिनेशन कमिटी नामक एक गैर-सरकारी संगठन ने राज्य के डिटेंशन सेंटरों में अमानवीय परिस्थिति होने का आरोप लगाते हुए दावा किया है कि वहां मौलिक सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं. संगठन के प्रवक्ता शुभ्रांशु भट्टाचार्य कहते हैं, "डिटेंशन सेंटरों की हालत बेहद अमानवीय है. वहां न तो साफ-सफाई है और न ही इलाज समेत दूसरी मौलिक सुविधाएं.” संगठन की दलील है कि सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के मुताबिक ऐसे केंद्रों को तत्काल जेल परिसरों से बाहर स्थापित किया जाना चाहिए ताकि उनको मौलिक सुविधाएं मुहैया कराई जा सकें.

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