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जर्मनी में सरकारी पेंशन अच्छा जीवन जीने के लिए काफी नहीं

मार्सेल फुर्स्टेनाउ
५ मई २०२६

जर्मनी के चांसलर मैर्त्स ने चेताया है कि रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन सिर्फ लोगों की “बुनियादी जरूरतें” ही पूरी कर पाएंगी. आखिर जर्मनी में पेंशन बाकी देशों के मुकाबले कितनी बेहतर या बदतर है.

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जर्मनी में पार्क की बेंच पर बैठे दो बुजुर्ग
जर्मनी जैसे देश में बूढ़े लोगों की बढ़ती तादाद के कारण भी पेंशन योजना पर बोझ बढ़ा है तस्वीर: Michael Nguyen/NurPhoto/picture alliance

जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स ने अप्रैल में राजधानी बर्लिन में एक कार्यक्रम में कहा कि "भविष्य में सरकारी पेंशन केवल बुढ़ापे के लिए आवश्यक बुनियादी जरूरतें ही पूरी कर पाएगी. यह लोगों के मौजूदा जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं होगी.”

उन्होंने कहा कि अब लोगों के लिए नौकरी से जुड़े फंड और निजी रिटायरमेंट बचत जरूरी हो जाएंगे. उन्होंने बताया, "अभी तक तो इस तरह की बचत करना लोगों की अपनी मर्जी पर निर्भर है लेकिन आगे चल यह अनिवार्य भी हो सकता है.” इसका मतलब है कि भविष्य में शेयर बाजार और अलग-अलग तरह के निवेशों पर ज्यादा जोर दिया जा सकता है, लेकिन दिक्कत यह है कि शेयर बाजार में कीमतें तेजी से ऊपर-नीचे होती हैं यानी आज का फायदा कल का नुकसान भी हो सकता है.

क्या जर्मन पेंशन सिस्टम का मुश्किल में पड़ना पहले से तय था

पेंशन कमीशन के सुझावों का इंतजार

चांसलर मैर्त्स की पार्टी सीडीयू की सहयोगी पार्टी एसपीडी की श्रम और रोजगार मंत्री बेर्बेल बास ने मैर्त्स के बयान की कड़ी आलोचना की. उन्होंने कहा कि मैर्त्स की बातों से "ऐसा लगा रहा है जैसे अब लोगों को अपनी पेंशन का इंतजाम खुद ही करना पड़ेगा.”

उनका कहना है कि मैर्त्स के बयान को कई लोगों ने ऐसे समझा है कि शायद उन्हें आगे चलकर "मामूली सरकारी पेंशन भी नहीं मिलेगी.” सीडीयू और एसपीडी के बीच पेंशन को लेकर चल रहा विवाद आने वाले समय में और ज्यादा बढ़ सकता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकार द्वारा बनाए गए पेंशन कमीशन को जून के अंत तक अपने सुझाव पेश करने हैं.

क्या जर्मनी में कुशल कामगारों की कमी प्रवासन नीति की देन?

दुनिया भर में पेंशन के भविष्य को समझने के दो ही तरीके हैं. पहला, जनसंख्या के रूझान समझना और दूसरा, लोगों की औसत उम्र का हिसाब देखना. जर्मनी समेत कई देशों में जन्म दर लगातार घट रही है. इसका एक नुकसान यह देखने को मिल रहा है कि पेंशन के मद में पैसे देने वाले कम और लेने वाले ज्यादा हैं.

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) ने "पेंशन ऐट ए ग्लांस” नाम की स्टडी में अपने 38 सदस्य देशों के पेंशन सिस्टम का अध्ययन किया. इस रिपोर्ट में पाया गया कि हर देश की पेंशन नीति अलग-अलग है और उनकी सीधी तुलना करना मुश्किल है.

जर्मन पेंशन कई विकसित देशों के औसत के नीचे

अगर हम जर्मनी में मिलने वाली पेंशन और हाथ में मिलने वाली कुल आय देखें तो जर्मनी में मिलने वाली पेंशन कुल आय का केवल 53 फीसदी है. यह ओईसीडी देशों के औसत 61 फीसदी से काफी कम है, जबकि फ्रांस और इटली जैसे देशों में यह 70 से 80 फीसदी के बीच है.

कुछ देशों के पेंशन के बीच तो अंतर और भी बड़ा है. एस्टोनिया, लिथुआनिया और आयरलैंड जैसे देशों में पेंशन 40 फीसदी से भी कम है. कुछ अन्य देशों में जबकि पेंशन बहुत ज्यादा है, जैसे नीदरलैंड्स, पुर्तगाल और तुर्की, जहां पेंशन 90 फीसदी से भी अधिक है.

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ओईसीडी के अनुसार लोग किस उम्र में रिटायर होते हैं, यह भी पेंशन सिस्टम को चलाने में बहुत अहम है. फिलहाल जर्मनी में लोग औसतन 65 साल के आस-पास रिटायर होते हैं, जो कि 1964 या उसके बाद जन्मे लोगों के लिए कानूनी रिटायरमेंट उम्र से लगभग तीन साल पहले है. ऐसे में अगर कोई व्यक्ति जल्दी रिटायर होता है, तो उसे कम पेंशन मिलती है.

कुछ देशों में लोग 67 साल की उम्र तक काम करते हैं, जैसे अमेरिका और जापान में, जो कि दुनिया की पहली और चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं. ओईसीडी का मानना है कि जैसे-जैसे लोग अधिक अधिक लंबा जी रहे हैं, वैसे-वैसे रिटायरमेंट की उम्र भी धीरे-धीरे बढ़ानी चाहिए.

फ्रांस और इटली के पेंशन फंड में जा रहा ज्यादा पैसा

फ्रांस और इटली में सरकारी पेंशन के लिए योगदान का स्तर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी अलग है. ओईसीडी के अनुसार, फ्रांस में यह आंकड़ा लगभग आय का 30 फीसदी है, जबकि इटली में यह हिस्सा लगभग 33 फीसदी तक है. जर्मनी में यह योगदान केवल 18.6 फीसदी है, जो कि औसत से काफी कम है. यह योगदान नौकरी करने वाले और नौकरी पर रखने वाले के बीच बराबर-बराबर बांटा जाता है.

इसके अलावा बुढ़ापे में गरीबी का खतरा भी अब बहस का मुद्दा बन रहा है. यह जोखिम जर्मनी में खास तौर पर उन लोगों पर अधिक है, जिन्होंने अपने कामकाजी जीवन में कम कमाया और निजी रिटायरमेंट बचत भी नहीं कर पाए. डेनमार्क के नीति-निर्माता इस समस्या से निपटने के लिए अब टैक्स की मदद से एक बुनियादी पेंशन की व्यवस्था कर रहे हैं. 

पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के बीच भी हालात काफी अलग हैं. जो लोग कम्युनिस्ट पूर्वी जर्मनी में रहते और काम करते थे, उन्हें काफी लंबे समय तक कम पेंशन मिलती रही है और पश्चिमी जर्मनी के साथ बराबरी की प्रक्रिया भी कहीं 2025 में आकर पूरी हुई, यानी पुन: एकीकरण के 35 साल बाद. इस वजह से पूर्वी जर्मनी के लोगों पर बुढ़ापे में गरीबी का खतरा अधिक है. पूर्वी जर्मनी की राज्य-नियोजित अर्थव्यवस्था के चलते लोगों के पास पेंशन फंड या निवेश योजनाओं में पैसा लगाने का मौका भी नहीं था.

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