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किसने बनाया कंप्यूटर?

१२ जुलाई २०१०

थोमास एडिसन ने बिजली के बल्ब का आविष्कार किया, विलबर और ऑरविल राइट ने पहली बार हवाई जहाज़ से उड़ने का प्रयोग किया, लेकिन कंप्यूटर कहां से आया? किसने पहला कंप्यूटर बनाया?

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कॉनराड त्सूज़ेतस्वीर: AP

वैसे तो ऐबेकस के रूप में सदियों से कैलकुलेटर जैसा एक औजार था, लेकिन डाटा स्टोरिंग की मशीन किसने बनाई? पेटेंट दफ़्तर में इस सिलसिले में चार्ल्स बैबेज का नाम दर्ज है. वे इंगलैंड के थे और उन्नीसवीं सदी में ही उन्होंने इसके शुरुआती सिद्धांत बनाए थे. लेकिन जर्मनी के कॉनराड त्सूज़े ने पहली बार 1941 में एक मशीन तैयार की, जिसे आजके कंप्यूटर का जनक कहा जा सकता है. इसमें बस 64 शब्द स्टोर किए जा सकते थे. त्सूज़े इतना ही चाहते थे कि उन्हें किसी तरह हिसाब के झमेले से निजात मिल जाए. 1992 में इस सिलसिले में उन्होंने कहा था -

मैंने सिविल इंजिनीयरिंग की पढ़ाई की थी. सिविल इंजिनीयर को हिसाब लगाने होते हैं, जिनमें काफ़ी माथापच्ची करनी पड़ती है. मैं चाहता था कि ये हिसाब ऑटोमेटिक ढंग से हों, फिर मुझे एक तरीका सूझा और यह मशीन बनी, जिसे हम आज कंप्यूटर कहते हैं. आप कह सकते हैं कि मेरे पेशे की मजबूरी से इसका जन्म हुआ. - कॉनराड त्सूज़े

1938 में त्सूज़े ने ज़ेड 1 नाम की जो मशीन तैयार की, उसमें चारों ओर छड़ों और हैंडिलों की भरमार ती. यह प्रयोग के लिए एक मॉडल था, और इसमें अभी बहुत सी ख़ामियां थीं. इसके बाद उन्होंने ज़ेड 2 नाम का एक और मॉडल तैयार किया, जिसमें एक टेलिफ़ोन रीले सिस्टेम था. फिर 1941 में तैयार हुआ दुनिया का पहला कामकाजी कंप्यूटर ज़ेड 3 यह देखने में एक विशाल अलमारी जैसा था और इसमें 600 टेलिफ़ोन रीले सिस्टेम शामिल थे. आज इस मशीन को म्युनिख के जर्मन संग्रहालय में रखा गया है. हाइंत्ज़ मोएलर यहां दर्शकों को ज़ेड 3 की बारीकियों का परिचय देते हैं और उनके सवालों का जवाब देते हैं. वे कहते हैं -

Deutsches Technikmuseum Zuse-Computer
त्सूज़े का मॉडल ज़ेड 1तस्वीर: picture-alliance/ZB

लोग इस मशीन के सामने खड़े रहते हैं और हैरत से इसे देखते रहते हैं. उन्हें समझ में नहीं आता कि यह क्या है. काफ़ी दिलचस्प सवाल भी पूछे जाते हैं. अभी पिछले हफ़्ते एक कंप्यूटर प्रेमी ने मुझसे पूछा कि क्या इसे इंटरनेट से जोड़ा जा सकता है? मैंने उनसे कहा, क्यों नहीं, अगर आपके पास बूट करने के लिए 28 हज़ार साल का वक्त हो. - हाइंत्ज़ मोएलर

कॉनराड त्सूज़े ने सिर्फ़ वही नहीं तैयार किया, जिसे आज की भाषा में हार्डवेयर कहते हैं. उन्हें एक प्रोग्राम, यानी सॉफ़्टवेयर भी तैयार करना पड़ा, ताकि कंप्यूटर काम कर सके. उनकी भाषा में हिसाब की प्रणाली. इसमें पंच सिस्टेम के ज़रिये निर्देश व संख्याएं दी गई थीं, जिनके आधार पर यह मशीन काम करती थी.

100 Jahre Konrad Zuse Z3 Flash-Galerie
म्युनिख संग्रहालय में ज़ेड 3तस्वीर: Teslaton

यह नाज़ियों का ज़माना था, द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था. हालांकि त्सूज़े ने नाज़ी सरकार के निर्देश पर इसे तैयार नहीं किया था, लेकिन युद्ध में इस्तेमाल के लिए उन्होंने अपना आविष्कार मुहैया कराया था. नए विमान तैयार करने के लिए या दूसरे पक्ष की सूचनाओं को डिकोड करने के लिए इसे काम में लाया जा रहा था. त्सूज़े सिर्फ़ अपने आविष्कार में मगन थे. पीछे मुड़कर देखते हुए बाद में उन्होंने कहा था -

उस समय मेरे सामने सवाल यह था कि कैसे इस तरह की मशीनों को विकसित करते हुए विश्लेषण का काम आगे बढ़ाया जा सकता है. सेना के लोगों से भी मेरी बाते हुई थीं, लेकिन उनके पास एनिग्मा नाम की मशीन थी, जो उस दौर के हिसाब से काफ़ी अच्छी थी. - कॉनराड त्सूज़े

विश्वयुद्ध ख़त्म होने के बाद जर्मनी को कंप्यूटर नही, दूसरी चीज़ों की ज़रूरत थी. लेकिन कॉनराड त्सूज़े अपने रास्ते पर बने रहे.

मेरे लिए यह बात साफ़ थी कि मैं संगणन की एक नई दुनिया में क़दम रख रहा हूं और मेरी राय में ऐलगोरिदम की भाषा तैयार करने के लिए शतरंज का खेल एक इलाका हो सकता था. मिसाल के तौर पर 1938 में अपने दोस्तों के बीच मज़ाक करते हुए मैंने कहा था कि पचास साल के अंदर एक मशीन शतरंज के विश्वचैंपियन को हरा देगी. अफ़सोस कि ऐसा नहीं हुआ, लेकिन रास्ता बिल्कुल सही था - कॉनराड त्सूज़े

1940 से ही कॉनराड त्सूज़े की अपनी कंपनी थी, त्सूज़े अप्पाराटेनबाऊ, जो 1964 में दीवालिया हो गई. लेकिन इससे भी ज़्यादा अफ़सोस उन्हें इस बात का था, कि पेटेंट दफ़्तर में उनकी दरख़्वास्त खारिज कर दी गई. उनका कहना था कि यह फ़ैसला सही नहीं था.

कंपनी दीवालिया हो जाने के बाद वे कलाकार बन गए. लेकिन यहां भी कंप्यूटर ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. वे कंप्यूटर की दुनिया के दिग्गजों की ऑयल पेंटिंग बनाने लगे. 1995 में अपनी मौत से कुछ ही माह पहले उन्होंने बिल गेट्स को उनकी एक तस्वीर भेंट की. सीएट्ल में माइक्रोसॉफ़्ट के मुख्यालय में बिल गेट्स के दफ़्तर में आज भी यह तस्वीर टंगी हुई है.

रिपोर्ट: मिषाएल एंगेल/उज्ज्वल भट्टाचार्य

संपादन: विवेक कुमार