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नाजी नरसंहार को कैसे देखते हैं आज के युवा?

रायना ब्रॉयर
२९ जनवरी २०२२

आज की युवा पीढ़ी के लिए होलोकॉस्ट एक सुदूर अतीत की घटना हो सकती है लेकिन उनकी रोजमर्रा की जिंदगियों पर उसका असर कायम है. एक अध्ययन से पता चला है कि इंटरनेट पीढ़ी किस तरह नाजी इतिहास को समझने की कोशिश कर रही है.

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Holocaust Roma Auschwitz
तस्वीर: Getty Images/B.Siedlik

पश्चिम जर्मनी में बाड आरोलजन के नाजी उत्पीड़न के अंतरराष्ट्रीय केंद्र, आरोलजन आर्काइव्ज ने ये अध्ययन कराया है. इस अध्ययन में शामिल एक प्रतिभागी ने अपनी राय देते हुए कुछ यूं कहा, "नाजी दौर इतना अनर्गल, अर्थहीन और बर्बर था कि कभी कभी मुझे यकीन ही नहीं होता कि वो सब वाकई घटित हुआ था.”

हिटलर के दौर के राष्ट्रीय समाजवाद के पीड़ितों और उससे बच गए लोगों के बारे में तमाम सूचना का दुनिया का सबसे व्यापक और सघन भंडार, आरोलजन आर्काइव्स को माना जाता है. यातना शिविरों के बंदियों, निर्वासनों, जबरन श्रम से जुड़े तमाम मूल दस्तावेजों के अलावा बच निकले लोगों की दास्तानें और बयान, आरोलजन आर्काइव्ज में संरक्षित और सुरक्षित रखे गए हैं.

अधिकांश सूचना उनकी वेबसाइट पर भी उपलब्ध है. करीब पौने दो करोड़ (एक करोड़ 75 लाख) लोगों के संदर्भो वाला ये दस्तावेजी संग्रह, यूनेस्को के मेमरी ऑफ द वर्ल्ड प्रोग्राम का हिस्सा है.

अब एक अध्ययन प्रकाशित हुआ है जिसके तहत, राष्ट्रीय समाजवाद और होलोकॉस्ट के बारे में जेनरेशन जेड यानी इंटरनेट के दौर की पीढ़ी कहे जाने वाले, 16 से 25 साल के युवाओं की राय और सोच दर्ज की गई है.

आरोलजन आर्काइव्ज की निदेशक फ्लोरियाने आसाउले कहती हैं, "अध्ययन के नतीजों को देखते हुए एक बात मजबूती से मुझे महसूस होती है कि आज के युवा काफी मुखर, जिज्ञासु और वैचारिक तौर पर खुले जेहन वाले लोग हैं. ये पीढ़ी अपनी आंखो से देख रही है कि आज लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं पर किस कदर खतरा मंडरा सकता है. मैं भलीभांति समझती हूं कि वे अतीत की स्मृतियों को आज की दुनिया पर एक गहरी सख्त निगाह के साथ मिलाकर देखते हैं. ऐसी दुनिया जिसमें लोकलुभावन नीतियां, निरंकुशता, तानाशाही और असहिष्णुता का शोर बढ़ता ही जा रहा है.”

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तस्वीर: Arolsen Archive

इस अध्ययन का शीर्षक है, "आज के युवा और नाजी इतिहासः उच्च ग्रहणशीलता और विचित्र आसक्ति.” अध्ययन में दो चरणों में 1100 प्रतिभागी शामिल किए गए और उनकी प्रतिक्रियाओं को उनके मातापिता की पीढ़ी के बयानों से तुलना की गई. नतीजा चकित कर देने वाला थाः आज के युवाओं में नाजी दौर के बारे में  अपनी पूर्व पीढ़ी की अपेक्षा ज्यादा महत्त्वपूर्ण दिलचस्पी देखी गई. (75 फीसदी बनाम 66 फीसदी.)

सर्वे के मुताबिक, विषय का अध्ययन करते हुए आज की युवा पीढ़ी, नस्लवाद और भेदभाव जैसी समकालीन समाज की बढ़ती समस्याओं के साथ भी उस अतीत को जोड़ कर देखती है.  

इस अध्ययन का संचालन करने वाले कोलोन स्थित राइनगोल्ड संस्थान के शोधकर्ता, युवाओं में अपने अतीत के प्रति इतनी अधिक दिलचस्पी की कई वजहें देखते हैं. खुद को आंशिक रूप से जिम्मेदार ना महसूस करना भी एक अहम पहलू है. नाजी दौर और उसकी क्रूरताओं के बारे में किसी किस्म की निजी ग्लानि भी उनमे नहीं है.

राइनगोल्ड के संस्थापक मनोविज्ञानी स्टीफान ग्रुनेवाल्ड कहते हैं, "इसी के चलते युवाओं में उस दौर को लेकर एक ज्यादा खुलापन है.”

नाजी दौरः अपनी ही दुनिया की एक उलट छवि

नाजी दौर, युवा पीढ़ी की अपनी खुद की जिंदगी की वास्तविकता के एक चरम प्रतिपक्ष का प्रतिनिधित्व करता है. आज युवा एक ऐसी लोकतांत्रिक दुनिया में रहते हैं जहां उनके पास बहुत सारे विकल्प उपलब्ध हैं. अपने फैसले वे खुद ले सकते हैं और विकास के रास्ते अनेक और विविधता भरे हैं. अध्ययन के मुताबिक, "अंतहीन संभावनाओं की ये बहु-विकल्पीय संस्कृति उस खास किस्म के प्रभुत्व वाली संस्कृति के ठीक उलट रही है जो कि नाजी दौर की पहचान रही थी, जिसमें उसकी सख्त श्रेणियां, विचार और मान्यताएं धंसी हुई थीं. शासक सरीखा कल्ट, बिना शर्त आज्ञापालन की बाध्यता, अत्यधिक राष्ट्रवादी सोच जो वैयक्तिक या विभिन्न मान्यताओं या मतों पर हावी हो गई थी- ये तमाम चीजें नाजी दौर के बारे में एक विरोधाभासी छवि बनाती हैं जो खौफनाक भी है और आकर्षक भी.

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आरोलजन अर्काइव्स देखते युवा.तस्वीर: Nikolai Marcinowski


ग्रुनवाल्ड रेखांकित करते हैं कि वैसे इस आकर्षण की शक्ति का एक विपरीत पहलू भी है. नाजी दौर का एकरेखीय होना और शक्ति के प्रदर्शन में डूब जाना या इतिहास के उस अध्याय को परिभाषित करने वाली फैंटेसियों से मोहित हो जाना, इस अध्ययन से साफ होता है. एक प्रतिभागी का कहना था कि "मुझे डर है कि मैं उन दिनों में रहा होता तो नाजियों के पक्ष में चला जाता, खुद को महज बेहतर दिखाने के लिए.”

प्रतिभागी ने ये भी कहा, "नतीजतन इस मुद्दे से जूझते हुए एक किस्म का दब्बूपन भी रहता है, जो इस वजह से आता है कि आप नहीं जानते कि आप आखिर किसकी तरफ होंगे. आप अपने ही गर्त में झांक रहे होते हैं.” नयी पीढ़ी इस तरह के सवालों को खंगालना चाहती है कि क्या आप एक पीड़ित होते या शोषक, समर्थक या लड़ाके- उस समय आपकी प्रतिक्रिया क्या रहती?

इसी दौरान प्रतिभागियों ने एक गहरी जरूरत ये समझने की भी जाहिर की थी आखिर एक व्यक्ति इतने अमानवीय तरीके से आखिर कैसे प्रतिक्रिया कैसे कर सकता है, अत्याचारियों को आखिर क्या चीज भड़काती है, और आखिर कैसे बुराई और वहशियत बाहर आती है. क्या ऐसा दोबारा हो सकता है? ये वो सवाल है जो आज की युवा पीढ़ी को मथ रहा है. एक प्रतिभागी का बयान कुछ ऐसा था कि, "तमाम एसएस अफसरों, यातना शिविर के कमांडरों और अपने यहूदी पड़ोसियों को धोखा देने वाले लोगों के इरादों के बारे में जानने में भी मेरी दिलचस्पी है. अगर वे वजहें पारदर्शी थी तो मुझे शायद महसूस होगा कि वैसा ही कुछ मेरे साथ भी होता.”

अपनी ही जिंदगी के विरोधाभास

एक प्रतिभागी ने कहा, "नाजीवाद के शुरुआती दिन दिखाते हैं कि बदलाव कितने आहिस्ता आहिस्ता रेंगते हुए आते हैं और मक्कारी और छल-कपट कितना खतरनाक हो सकता है.”

आरोलजन आर्काइव्स के ओलिवर फिगे कहते हैं, "आज की घटनाओं से इतिहास को जोड़ना ही मामले का निचोड़ है. उसे एक संदर्भ देना ही एक बड़ा काम है जो हमें देखना है.”

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होलोकॉस्ट से जुड़े बहुत सारे दस्तावेज मौजूद हैं आरोलजन में.तस्वीर: picture-alliance/dpa

विषय पर बात करने के अवरोध

अध्ययन के निष्कर्ष साफतौर पर दिखाते हैं कि स्कूलों में इस विषय की पढ़ाई सिर्फ सिद्धांत और बुनियादी तथ्यों पर आधारित है, किशोर और युवा लोग अक्सर विषय के साथ जुड़ नहीं पाते हैं. उनके लिए वो बहुत अमूर्त, पेचीदा और सुदूर हो जाता है.

अध्ययन के मुताबिक "वे असल जिंदगी के उदाहरणों और लोगों की जिंदगियों की ठोस वास्तविकताओं पर अंतर्दृष्टि को प्राथमिकता देते हैं.”एन फ्रांक या ओस्कार शिंडलर जैसे लोगों की जिंदगियों, किस्मतों का इम्तहान और उनकी दास्तानों को डिजिटल मीडिया पर रखा जाए जिसे कि युवा पीढ़ी इस्तेमाल करती है और उनके बीच प्रचलित भाषा और शब्दावली में वे सारी दास्तानें रखी जाती हैं तो विषय के प्रति युवाओं की नजदीकी बढ़ती है.

शोधकर्ताओं ने एक सफल उदाहरण की ओर भी इंगित किया. ये इंस्टाग्राम अकाउंट है @इषबिनसोफीशॉल (मैं हूं सोफी शॉल) जिसके तहत सोफी शॉल नाम की प्रतिरोधी लड़ाका की जिंदगी की दास्तान सुनाई गई है, उसे नाजियों ने मार डाला था. ग्रुनवाल्ड कहते हैं कि, "वे देखते हैं कि सोफी शॉल कैसे नृत्य करती है, संगीत सुनती है, दोस्तों से मिलती है, और उसी दौरान वो तत्कालीन समय की एक युवा स्त्री के विकास को भी समझते हैं.”

London Ausstellung "Seven Portraits Surviving the Holocaust" | Anita Laskar-Wallfisc
होलोकॉस्ट सर्वाइवर की प्रदर्शनी सेवेन पोर्ट्रेट्स.तस्वीर: Arthur Edwards/The Sun/PA/picture alliance

नैतिक बाध्यता की अपेक्षा एक खुला लेनदेन

विषय पर सामग्री की प्रस्तुति बहुत जरूरी है ताकि युवाओं के बीच ये विषय और नजदीकी हासिल कर सकें, उनके दिलों को छू सकें. इसके अलावा अध्ययन में शामिल युवाओं ने बहुत स्पष्ट शब्दों में एक ज्यादा खुली बहस की गुजारिश भी की थी. अध्ययन के मुताबिक, "अक्सर पहसे से तय कुछ मतों और नैतिकता के एक खास उल्लिखित या निर्धारित बोध से ये संकेत जाता है कि विमर्श खुला नहीं बल्कि बंद है और इस मामले पर और सवाल नहीं किए जा सकते हैं.”

एक प्रतिभागी का कुछ यूं कहना था, "नाजी दौर के बारे में स्कूली कक्षाओं के दौरान मुझे हमेशा लगता था कि मुझे सावधान रहना होगा. कोई संवाद या बहस हो ही नहीं पाती थी. आपको अपनी राय रखने का भी कोई अवसर नहीं था. इस बारे में एक सहमति सी थी कि आपको उस विषय को कैसे देखना है और उससे सबक लेना है.”

अध्ययन स्पष्ट रूप से दिखाता है कि युवा पीढ़ी नाजी दौर और होलोकॉस्ट के विषय पर संवेदनशील है. ये क्या कम है कि वे अतीत से सबक लेते हैं और मौजूदा यथार्थ में उन्हें लागू करने की कोशिश करते हैं. ग्रुनवाल्ड अपनी बात को समेटते हुए कहते हैं, "उस दौर से आमना-सामना ही उससे निजात भी दिलाता है.”