कोविड वैक्सीन को पेटेंट मुक्त करने पर डबल्यूटीओ में नहीं बन पाई सहमति | दुनिया | DW | 28.07.2021
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दुनिया

कोविड वैक्सीन को पेटेंट मुक्त करने पर डबल्यूटीओ में नहीं बन पाई सहमति

कोविड वैक्सीन के उत्पादन को पेटेंट की पाबंदियों से मुक्त करने के मुद्दे पर विश्व व्यापार संगठन में कोई सहमित नहीं बन पाई है. इसका अर्थ है कि विकासशील देशों का खुद ही वैक्सीन बनाने को कोशिश कामयाब नहीं हो पाएगी.

विश्व व्यापार संगठन की मंगलवार को हुई बैठक में भी कोविड-19 वैक्सीन के उत्पादन को पेटेंट मुक्त करने की भारत और उसके सहयोगी देशों की कोशिशें नाकाम रहीं. जेनेवा में संगठन के मुख्यालय में हुई बैठक में विभिन्न देशों के बीच कोई सहमति नहीं बन पाई.

विश्व व्यापार संगठन के प्रवक्ता कीथ रॉकवेल ने पत्रकारों को बताया कि इस ‘बेहद जज्बाती मुद्दे पर' नौ महीने के विचार-विमर्श का कोई नतीजा नहीं निकला है. अब सदस्य देश सितंबर की शुरुआत में एक अनौपचारिक बैठक करेंगे जिसके बाद 13-14 अक्टूबर को औपचारिक बैठक होगी.

मंगलवार को कई घंटे तक चली बातचीत के बाद रॉकवेल ने कहा, "हम इस बातचीत को किसी सूरत में नहीं रोकने वाले हैं. यह बहुत जरूरी मुद्दा है. यह बहुत जज्बाती मुद्दा है और इस पर बातचीत जारी रहेगी.” डब्ल्यूटीओ के 164 सदस्य हैं और वहां सारे निर्णय सहमति से ही लिए जाते हैं.

यूरोपीय देश साथ नहीं

भारत और दक्षिण अफ्रीका ने पिछले साल अक्टूबर में डबल्यूटीओ के समक्ष यह प्रस्ताव रखा था कि कोविड वैक्सीन के उत्पादन को बौद्धिक संपदा अधिकार से मुक्त कर दिया जाए ताकि गरीब देश भी अपने यहां अपनी जरूरत की वैक्सीन का उत्पादन कर सकें.

इस प्रस्ताव के समर्थक देशों का कहना है कि पेटेंट मुक्त होने से विकासशील देशों में उत्पादन बढ़ेगा और ज्यादा से ज्यादा लोगों को जल्द से जल्द वैक्सीन लगाई जा सकेगी जो कोरोनोवायरस को रोकने के लिए जरूरी है.

दुनिया की बड़ी दवा कंपनियां और उनके देश इस प्रस्ताव का तीखा विरोध कर रहे हैं. उनका तर्क है कि उत्पादन बढ़ाने में पेटेंट अधिकार कोई बाधा नहीं हैं. इन कंपनियों का विचार है कि पेटेंट अधिकार से मुक्ति का नई खोजें करने की कोशिशों पर बुरा असर पड़ेगा.

भारत और दक्षिण अफ्रीका के प्रस्ताव को अमेरिका और चीन समेत कई दर्जन देशों का समर्थन मिला है. लेकिन यूरोपीय देश और जापान व कोरिया इस प्रस्ताव के तगड़े विरोधी हैं. रॉकवेल ने कहा कि देशों का एक समूह ऐसा भी है जो इस समस्या का व्यवहारिक हल चाहता है.

कैसे बढ़ेगा उत्पादन?

रॉकवेल ने पत्रकारों को बताया कि सदस्य देश तेजी से उत्पादन बढ़ाने पर तो सहमत हुए हैं लेकिन यह लक्ष्य हासिल कैसे किया जाए, इसे लेकर कोई सहमति नहीं बन पाई है. उन्होंने कहा कि सेनेगल, बांग्लादेश, भारत, दक्षिण अफ्रीका, थाईलैंड, मोरक्को और मिस्र में जरूरत से ज्यादा उत्पादन की क्षमता तो है लेकिन उन्हें वैक्सीन के उत्पादन के लिए जरूरी तकनीक और व्यवहारिक ज्ञान की जरूरत है. रॉकवेल ने कहा, "उनमें क्षमता तो है. तो सवाल ये है कि उस क्षमता का इस्तेमाल किया कैसे जाए.”

तस्वीरों मेंः कौन कितनी वैक्सीन दान करेगा

जिन मुद्दों पर पेटेंट अधिकारों से मुक्ति का यह मामला अटका हुआ है, उनमें तकनीकी बातें ज्यादा हावी हैं. मसलन, मुक्ति कितने समय के लिए होगी और किन शर्तों पर होगी. इसके अलावा, बकौल रॉकवेल, यह भी बड़ा सवाल है कि पेटेंट अधिकारों की मुक्ति को लागू कैसे किया जाएगा और गोपनीय सूचनाओं को सुरक्षित कैसे रखा जाएगा.

समाचार एजेंसी एएफपी के मुताबिक दुनियाभर में कोविड वैक्सीन की 3.93 अरब खुराकें लग चुकी हैं. लेकिन उनमें से सिर्फ 0.3 प्रतिशत ही गरीब देशों में दी गई हैं, जहां दुनिया की 9 फीसदी आबादी रहती है.

रॉकवेल ने कहा, "विकासशील देशों में उत्पादन बढ़ाना यहां मौजूदा सभी के लिए अहम है ताकि अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और एशिया में ज्यादा से ज्यादा बाजुओं तक टीके पहुंच सकें.”

वीके/एए (रॉयटर्स, एएफपी)

वीडियो देखें 03:24

लोगों तक कैसे पहुंचेगा कोरोना का टीका

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