असम में क्यों हो रहा है वन्यजीव अभयारण्य का विरोध | भारत | DW | 05.02.2022

डीडब्ल्यू की नई वेबसाइट पर जाएं

dw.com बीटा पेज पर जाएं. कार्य प्रगति पर है. आपकी राय हमारी मदद कर सकती है.

  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages
विज्ञापन

भारत

असम में क्यों हो रहा है वन्यजीव अभयारण्य का विरोध

असम सरकार दुनिया के 25 लुप्तप्राय प्रजातियों में शामिल गोल्डन लंगूर के संरक्षण के लिए निचले असम के काकोइजना संरक्षित वन क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करना चाहती है. लेकिन सरकार की पहल का स्थानीय लोग कड़ा विरोध कर रहे हैं.

ड्रोन से एक हाथी का पता लगाने की कोशिश करते असम के वन अधिकारी

ड्रोन से एक हाथी का पता लगाने की कोशिश करते असम के वन अधिकारी

दिलचस्प बात यह है कि भूटान की सीमा से लगे इस वन क्षेत्र के संरक्षण में स्थानीय ग्रामीणों ने काफी अहम भूमिका निभाई है. लेकिन अब सरकारी फैसले के विरोध के पीछे उनकी दलील है कि जंगल का कुछ हिस्सा उनके लिए बेहद पवित्र है और वन्यजीव अभयारण्य घोषित होने के बाद उनसे जंगल का अधिकार छिन जाएगा. गोल्डन लंगूर असम के काकोइजना के अलावा पड़ोसी भूटान में ही पाए जाते हैं. असम आंदोलन और उसके बाद बोड़ो उग्रवाद के दौर में जंगल तेजी से कटने की वजह से इस प्रजाति के लंगूरों की आबादी खतरे में पड़ गई थी. उनकी आबादी घट कर सौ से भी कम हो गई थी.

लेकिन गांव वालों और कुछ गैर-सरकारी संगठनों के प्रयास से जहां उस बंजर इलाके में दोबारा जंगल उग आया है वहीं लंगूरों की आबादी भी बढ़ कर पांच सौ के पार पहुंच गई है. लेकिन इससे एक नया खतरा पैदा हो गया है. वह खतरा है इंसानों और जानवरों (लंगूरों) के बीच संघर्ष और सड़क हादसों में इन लंगूरों की बढ़ती मौत. इस पर अंकुश लगाने के लिए असम सरकार ने उस इलाके को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने की पहल की है. वैसे, सरकार ने वर्ष 2011-12 गोल्डन लंगूरों के संरक्षण के लिए असम चिड़ियाघर में गोल्डन लंगूर संरक्षण परियोजना की शुरुआत में की थी.

नदियां और वर्षावन असम में जैव विविधता का जबरदस्त मिश्रण बनाते हैं

नदियां और वर्षावन असम में जैव विविधता का जबरदस्त मिश्रण बनाते हैं

क्या है गोल्डन लंगूर 

पश्चिमी असम और भारत-भूटान की सीमा से सटे इलाकों में पाए जाने वाले गोल्डन लंगूर की खोज औपचारिक तौर पर वर्ष 1953 में एडवर्ड प्रिचर्ड गी ने की थी. इसलिए इसके नाम में गी का नाम भी जुड़ा है. यह भारत की सबसे लुप्तप्राय प्रजातियों में से एक है और इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन आफ नेचर (आईयूसीएन) की लाल सूची में शामिल है. भूटान में उनकी आबादी करीब चार हजार है. पूरी दुनिया में गोल्डन लंगूर की आबादी सात हजार के करीब है.

इनके संरक्षण के लिए असम सरकार ने कोई दस साल पहले एक योजना शुरू की थी. 5 जून 2019 को बंगाईगांव जिले के अधिकारियों में असम ने मनरेगा के तहत एक परियोजना शुरू की थी. उसके तहत वन क्षेत्र में अमरूद, आम, ब्लैकबेरी समेत कई फलों के दस हजार से ज्यादा पौधे लगाए गए. इसका मकसद इन लंगूरों को जंगल में पर्याप्त भोजन मुहैया कराना था ताकि भोजन की तलाश में उनको जान से हाथ नहीं धोना पड़े. उससे पहले कई हादसों में दर्जनों ऐसे लंगूरों की मौत हो गई थी.

पूर्वोत्तर भारत, चीन और म्यांमार में पाई जाती हैं बंदरों और लंगूरों की कई प्रजातियां

पूर्वोत्तर भारत, चीन और म्यांमार में पाई जाती हैं बंदरों और लंगूरों की कई प्रजातियां

सरकारी पहल

गोल्डन लंगूरों के संरक्षण की योजना पर काम कर रहे बंगाईगांव जिला प्रशासन ने सरकार से काकोइजना को वन्यजीव अभयारण्य का दर्जा देने की सिफारिश की है. बंगाईगांव के उपायुक्त आदिल खान बताते हैं, "वन मंत्री और प्रधान वन संरक्षक के साथ हाल में एक बैठक में यह प्रस्ताव दिया गया था. सरकार ने इस पर सहमति दे दी है. अब मानसून के बाद इस संरक्षित वन क्षेत्र में रहने वाले पशुओं की तमाम प्रजातियों की गिनती के बाद सरकार को औपचारिक रिपोर्ट भेजी जाएगी."

आदिल खान बताते हैं कि इस इलाके में करीब पांच सौ गोल्डन लंगूर हैं. लेकिन उनकी आबादी तेजी से बढ़ने की वजह से कई समस्याएं पैदा हो रही हैं. एक ओर जहां इंसानों के साथ संघर्ष बढ़ रहा है वहीं जंगल में भोजन का भी संकट पैदा हो रहा है. खान बताते हैं, "अब तक इस प्रजाति के संरक्षण में स्थानीय आदिवासी ग्रामीणों का साथ भी मिलता रहा है. वन्यजीव अभयारण्य का दर्जा मिलने के बाद इलाके में शोध और निवेश के साथ ही पर्यटन को भी बढ़ावा दिया जा सकेगा."

जंगल की कटाई

इन लंगूरों की बढ़ती आबादी आसपास के लोगों के खेतों और बागों में भोजन की तलाश में उपद्रव मचाने लगी है. काकोइजना वन क्षेत्र करीब 18 वर्ग किमी इलाके में फैला है और यहां जानवरों की विभिन्न प्रजातियां रहती हैं. फिलहाल इस वन क्षेत्र की रक्षा जंगल के चारों ओर बसे 34 गांवों के लोग करते हैं. वहां मूल रूप से बोड़ो, संथाल, गारो, कोच राजबंशी, बंगाली और नेपाली तबके के लोग रहते हैं.

वर्ष 1966 में बने इस वन क्षेत्र में एक गैर-सरकारी संगठन नेचर्स फोस्टर के सदस्यों ने पहला गोल्डन लंगूर 5 नवंबर 1995 को देखा था. उस समय उनकी आबादी सौ से भी कम थी. संगठन के पदाधिकारी रहे अर्णब बसु बताते हैं, "अस्सी के दशक में होने वाला असम आंदोलन भी इलाके में जंगल के कटने और इन लंगूरों की आबादी में गिरावट का सबसे प्रमुख कारण था. आंदोलन के नाम पर लोगों ने बड़े पैमाने पर पेड़ों की अवैध कटाई की. उस समय इस जंगल का करीब 95 फीसदी हिस्सा बंजर जमीन में बदल गया था."

भारत सरकार की नई योजना से आदिवासी भूमि अधिकारों और जैव विविधता को खतरा

उसके बाद इन लंगूरों के संरक्षण के लिए अमेरिकी संरक्षण कार्यकर्ता डा. रॉबर्ट हॉर्विच के नेतृत्व में कुछ गैर-सरकारी संगठनों ने काकोइजना वन क्षेत्र और गोल्डन लंगूरों के संरक्षण के लिए वर्ष 1998 में एक योजना शुरू की थी. इस काम में स्थानीय लोगों को भी शामिल किया गया. उसका बेहतरीन नतीजा सामने आया. अब जहां जंगल की तस्वीर बदलने के साथ ही लंगूरों की आबादी भी बढ़ कर पांच सौ के पार पहुंच गई है.

एक सींग वाले गैंडों के संरक्षण में कामयाबी

विरोध क्यों?

असम के वन विभाग ने हाल में इलाके के 19.85 वर्ग किमी वन क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने की प्राथमिक अधिसूचना जारी की है. लेकिन गांव वालों ने इसके विरोध में जिला प्रशासन को ज्ञापन दिया है. उसमें कहा गया है कि जंगल के भीतर के कुछ इलाके बेहद पवित्र है और उसकी पवित्रता सुनिश्चित की जानी चाहिए. इलाके के लोग जंगल के संरक्षण की दिशा में बेहतर काम कर रहे हैं.

गांव वालों का कहना है कि वन्यजीव अभयारम्य का दर्जा मिलने के बाद वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के कड़े प्रावधानों के कारण उनके पारंपरिक रीति-रिवाज प्रभावित होंगे और जंगल से उनका अधिकार छिन जाएगा. इसके अलावा उससे संरक्षण की प्रक्रिया भी प्रभावित होगी. स्थानीय लोग वन्यजीव अभयारण्य के बदले इलाके को वन अधिकार अधिनियम के तहत कम्युनिटी फॉरेस्ट रिसोर्सेज में बदलने पर जोर दे रहे हैं. ग्रामीणों को अपनी इस मुहिम में गैर-सरकारी संगठनों का साथ भी मिल रहा है.

वन्यजीव विशेषज्ञ मनोतोष चक्रवर्ती कहते हैं, "कोई भी फैसला करने से पहले जंगल और लंगूरों के संरक्षण में ग्रामीणों की भूमिका को ध्यान में रखा जाना चाहिए. फैसले की प्रक्रिया में उनको भी शामिल करना जरूरी है. साथ ही इस बात का ध्यान रखना होगा कि सरकार के फैसले से स्थानीय आदिवासी समाज की परम्पराओं और रीति-रिवाजों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़े."

संबंधित सामग्री