दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों के बॉस भारतीय ही क्यों? | भारत | DW | 10.12.2021

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भारत

दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों के बॉस भारतीय ही क्यों?

जानकार मानते हैं कि भारत के बड़े आकार से अलग इस तरह की प्रवृत्ति के पीछे कई तरह की खींचतान और अनोखी काबिलियत है. प्रॉब्लम सॉल्विंग, अंग्रेजी भाषा का ज्ञान और लगातार कड़ी मेहनत करने की क्षमता भी इसमें अहम रोल निभाती है.

ट्विटर के नए सीईओ पराग अग्रवाल भारत के प्रतिष्ठित आईआईटी संस्थान के भूतपूर्व स्टूडेंट्स के क्रम में नए जुड़ गए हैं, जिन्हें अमेरिका की सबसे बड़ी अमेरिकी टेक कंपनियों में से एक की कमान सौंपी गई है. अब शिवानी नंदगांवकर उन्हीं के पदचिन्हों पर चलना चाहती हैं.

22 साल की शिवानी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, बॉम्बे की स्टूडेंट हैं जिस संस्थान से पराग अग्रवाल ने भी पढ़ाई की है. शिवानी को भी गूगल में प्लेसमेंट मिल गया है और वे भी उन हजारों आईआईटी ग्रैजुएट्स में शामिल हो चुकी हैं, जो भारतीय संस्थानों से निकलकर बड़ी अमेरिकी टेक कंपनियों में जाते हैं.

वे कहती हैं, "जब मैंने पराग के बारे में सुना तो मुझे बहुत खुशी हुई. एक आईआईटीयन गूगल का भी सीईओ है, सुंदर पिचाई. इसलिए अब मेरे लिए सफलता की सीढ़ियों का यही मतलब था."

बड़ी कंपनियों के सबसे बड़े पदों पर

पराग अग्रवाल, एस ऐंड पी 500 में शामिल किसी कंपनी के सबसे कम उम्र के सीईओ हैं. वे अभी मात्र 37 साल के हैं. गूगल की पेरेंट कंपनी अल्फाबेट के 49 साल के सीईओ सुंदर पिचाई की तरह ही उन्होंने भी भारत को अपनी आईआईटी की पढ़ाई पूरी करने के बाद छोड़ दिया था. फिर उन्होंने अमेरिका से ही पोस्टग्रैजुएशन किया और यहां कई कंपनियों में काम भी किया.

अन्य भारतीय, जो ऊंचे कॉरपोरेट पदों पर रहे हैं, उनमें हैं आईबीएम के अरविंद कृष्णा और पॉलो ऑल्टो नेटवर्क्स के निकेश अरोड़ा. ये दोनों भी आईआईटी के ही स्टूडेंट रहे हैं. माइक्रोसॉफ्ट के सत्या नडेला और अडोबी के शांतनु नारायण का नाम भी इसी क्रम में आता है.

भारतीय सबसे आगे क्यों?

बड़ी कंपनियों के अधिकारी और एक्सपर्ट कहते हैं कि भारत के बड़े आकार से अलग इस तरह की प्रवृत्ति के पीछे कई तरह की खींचतान और अनोखी काबिलियत है. साथ ही प्रॉब्लम सॉल्विंग की संस्कृति, अंग्रेजी भाषा का ज्ञान और लगातार कड़ी मेहनत कर सकने की क्षमता भी इसमें अहम रोल निभाती है.

आईआईटी ग्रैजुएट और सन माइक्रोसिस्टम्स के को-फाउंडर विनोद खोसला मानते हैं कि अलग-अलग समुदायों, रिवाजों और भाषाओं के बीच बड़े होने की वजह से भारतीयों में कठिन परिस्थितियों में भी रास्ता निकाल लेने की समझ होती है.

अरबपति वेंचर कैपिटलिस्ट खोसला कहते हैं, "आईआईटी की कठिन भारत में पढ़ाई में प्रतिस्पर्धा और सामाजिक उठापटक उनकी काबिलियत को बढ़ाने में मदद करती हैं."

भारत से निकले बॉस सफल

सिलिकॉन वैली में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों में टेक्निकल विशेषज्ञता के साथ ही, अलग-अलग समुदायों को संभालने और अनिश्चितता के बीच आंतरप्रेन्योरशिप जैसी विशेषताओं की जरूरत होती है. अकादमिक जगत से जुड़े भारतीय-अमेरिकी विवेक वाधवा कहते हैं, रचनात्मकता दिखाते हुए आपको हमेशा नियम तोड़ने होते हैं, आपको निडर होना चाहिए. और... आप भारत में हर रोज बिना कोई नियम तोड़े, बिना अक्षम नौकरशाही और भ्रष्टाचार से जूझे बिना रह ही नहीं सकते.

वह कहते हैं, "जब आपको सिलिकॉन वैली में रचनात्मकता दिखानी होती है तब ये काबिलियत काफी काम आती हैं क्योंकि आपको हमेशा सत्ता को चुनौती देनी होती है. और ये चीजें कीमती हैं, टैक्सी सेवाएं देने वाली बड़ी कंपनी उबर ने इस महीने आईआईटी बॉम्बे के स्टूडेंट्स को अमेरिका में प्लेसमेंट के दौरान 2.74 लाख डॉलर यानी 2 करोड़ रुपये से ज्यादा का पैकेज दिया है.

अच्छे से अच्छा टैलेंट

130 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या वाले देश में इस तरह के इनामों का कॉम्पटीशन पढ़ाई पर ध्यान दिए जाने के साथ काफी पहले ही शुरु हो गया था. आईआईटी को भारत की सबसे अच्छी यूनिवर्सिटी के तौर पर देखा जाता है और इसकी 16 हजार सीटों के लिए हर साल 10 लाख से भी ज्यादा स्टूडेंट्स अप्लाई करते हैं.

पिछले डेढ़ साल से नंदगांवकर हफ्ते के सातों दिन 14 घंटों से भी ज्यादा पढ़ाई करती हैं. वे बताती हैं कि कुछ स्टूडेंट्स तो इसके लिए 14-15 साल की उम्र से ही पढ़ाई शुरु कर देते हैं.

विवेक वाधवा कहते हैं, "एक ऐसी प्रवेश परीक्षा के बारे में सोचिए जो एमआईटी और हार्वर्ड से 10 गुना ज्यादा कठिन हो. बस वही आईआईटी है. तो इसमें देश के बेहतर से बेहतर टैलेंट आते हैं."

भारत से बाहर क्यों निकले आईआईटीयन

आईआईटी का नेटवर्क 1950 में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने स्थापित किया गया था, जो 1947 में ब्रिटिश शासन के अंत के बाद नए भारत के निर्माण के लिए विज्ञान और इंजीनियरिंग के ग्रैजुएट्स का एक समूह बनाना चाहते थे.

लेकिन इंजीनियर्स की सप्लाई सीमित घरेलू मांग से आगे निकल गई. तो ये ग्रैजुएट्स भारत के बाहर, खासकर अमेरिका में नौकरी के अवसर ढ़ूंढ़ने लगे, जहां डिजिटल क्रांति के शुरु होने के बाद बेहद काबिल कर्मचारियों की जरूरत थी.

आईआईटी बॉम्बे के डिप्टी डायरेक्टर एस सुदर्शन कहते हैं, "60, 70 और 80 ही नहीं बल्कि 90 के दशक में भी भारतीय उद्योग उतने एडवांस नहीं थे और... जो नई टेक्नोलॉजी पर काम करना भी चाहते थे, उन्हें विदेश जाने की जरूरत महसूस हुई."

अग्रवाल, पिचाई और नडेला ने इन बड़ी कंपनियों में अपना रास्ता बनाने में दशकों का समय गुजारा है और अमेरिकियों की बनाई इन कंपनियों का विश्वास हासिल करते हुए अंदरूनी जानकारियां जुटाई हैं. और सालों तक, अमेरिका के कौशल आधारित इमिग्रेंट वीजा एच-1 बी के आधे से ज्यादा एप्लीकेंट्स भारत से रहे और उनमें भी ज्यादातर टेक सेक्टर से रहे.

भारत ही बन गया टेक हब तब क्या होगा?

जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर देवेश कपूर, जो खुद एक आईआईटी ग्रैजुएट हैं, कहते हैं, "इसके उलट भारत से ज्यादा जनसंख्या वाले चीन के इंजीनियरों के पास घर में ही नौकरियां खोजने या अमेरिका में पोस्ट ग्रैजुएशन करने के बाद घर लौटने का ही विकल्प था क्योंकि उनकी घरेलू अर्थव्यवस्था तेजी से फैल रही थी."

यह परिघटना धीरे-धीरे खत्म भी हो सकती है क्योंकि भारत में अब खुद टेक सेक्टर तेजी से तरक्की कर रहा है. जिससे भारत के सबसे अच्छे और होनहार दिमागों को अपने देश में ही अच्छे अवसर मिल जा रहे हैं. लेकिन नंदगांवकर के लिए अग्रवाल या पिचाई जैसा टेक सेक्टर का बॉस बनना कोई बहुत दूर की कौड़ी नहीं है. वे कहती हैं, "क्यों नहीं हो सकता, बड़े सपने देखिए तो."

एडी/वीके (एएफपी)

 

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