100 में तीन महिलाएं ही वैज्ञानिक, क्यों? | दुनिया | DW | 13.02.2020
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दुनिया

100 में तीन महिलाएं ही वैज्ञानिक, क्यों?

हाल ही में दुनियाभर में 'वुमेन इन साइंस डे' मनाया गया. लेकिन सच्चाई यह है कि रिसर्च के क्षेत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी काफी घटी है. रिसर्चरों को डर है कि नई पीढ़ी के सामने महिला रोल मॉडलों की कमी हो सकती है.

गरिमा एक खुश गृहणी हैं. वह घर से ही बेकरी का छोटा सा बिजनस चलाती हैं. वह ऑर्डर पर केक, पेस्ट्री और कुकीज बनाती हैं लेकिन वह बेकर नहीं बनना चाहती थीं. केमिस्ट्री में गोल्ड मेडलिस्ट रही गरिमा कभी भारत के लिए नोबेल पुरस्कार जीतने का सपना देखा करती थीं. इसके लिए उन्होंने पीएचडी में एडमिशन लिया और इसी बीच उनकी शादी हो गई. फिर बच्चों की जिम्मेदारी आई. चार साल बाद गरिमा ने पीएचडी छोड़ दी. गरिमा कहती हैं, "विज्ञान पर रिसर्च करने के लिए एकाग्रता की जरूरत पड़ती है. शादी, बच्चों और विज्ञान के बीच संतुलन बनाना बेहद मुश्किल है." अब गरिमा चाहती हैं कि उनकी चार साल की बेटी आगे चलकर विज्ञान के क्षेत्र में नाम कमाए.

सन 1901 से 2019 के बीच फिजिक्स, केमिस्ट्री और मेडिसिन के क्षेत्र में 334 नोबेल पुरस्कार दिए गए. ये सम्मान कुल 616 लोगों को मिला. इनमें सिर्फ 20 महिलाएं शामिल हैं. फ्रांस की महान वैज्ञानिक मैरी क्यूरी को दो बार यह पुरस्कार मिला है.

विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं को प्रोत्साहन देने के लिए हर साल 11 फरवरी को संयुक्त राष्ट्र वुमेन इन साइस डे मनाता है. यह दिन विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं को समान अवसर देने और उनकी भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए तय किया गया है. दुनिया के कई महान वैज्ञानिक और गणितज्ञों में महिलाएं भी शामिल हैं. अपने पुरुष समकक्षों और शीर्ष वैज्ञानिकों जैसी उपलब्धि हासिल करने के बाद भी बड़ी रिसर्चों में उनका प्रतिनिधित्व ना के बराबर होता है.

क्या महिलाएं सफल शोधकर्ता नहीं हैं

यूनेस्को ने 2018 में विज्ञान में महिलाओं की भागीदारी पर एक फैक्ट शीट तैयार की. इसके मुताबिक दुनिया में केवल 28. 8 प्रतिशत महिलाएं ही शोधकर्ता हैं. यह वह शोधकर्ता हैं जो नया ज्ञान या विचार 'पैदा' करने के लिए काम कर रही हैं. भारत में यह आंकड़ा और भी कम है. वहां केवल 13.9 फीसदी महिला वैज्ञानिक हैं जो इस दिशा में काम कर रही हैं. 118 सालों में अब तक तीन महिलाओं को फिजिक्स में नोबेल पुरस्कार मिला है, केमिस्ट्री में पांच और मेडिसिन के क्षेत्र में 12 महिलाओं को इस पुरस्कार से नवाजा गया है. वहीं गणित के क्षेत्र में दिया जाने वाला एबेल पुरस्कार जिसे गणित का नोबेल भी कहा जाता है, 2019 में पहली बार किसी महिला गणितज्ञ को दिया गया. अमेरिका की कैरेन उहलेनबेक यह सम्मान पाने वाली पहली गणितज्ञ हैं. कैरेन को यह पुरस्कार 16 अन्य पुरुष गणितज्ञों के साथ दिया गया. फील्ड्स मेडल भी अब तक केवल एक महिला गणितज्ञ को ही मिला है. ईरान की मिरयम मिर्जाखानी ने 59 पुरुषों का पछाड़ कर यह खिताब जीता था.

विज्ञान में महिलाएं

यूनेस्को के 2014 से 2016 के बीच के आंकड़े बताते हैं कि केवल 30 प्रतिशत छात्राएं ही, उच्च शिक्षा एसटीईएम ( विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित ) में प्रवेश लेती हैं. सूचना प्रौद्योगिकी में महिलाओं का एडमिशन तीन प्रतिशत है. प्राकृतिक विज्ञान, गणित और सांख्यिकी में यह पांच फीसदी और इंजीनियरिंग और अप्लाइड साइंस में सिर्फ आठ प्रतिशत है.

भारत के नीति आयोग की रिपोर्टें भी कुछ ऐसी ही तस्वीर सामने लाती हैं. 2015-16 में ग्रेजुएट कोर्स में 9.3% छात्राओं ने इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था. 4.3 फीसदी महिलाओं ने चिकित्सा विज्ञान में दाखिला लिया. मास्टर और डॉक्टरेट स्तर पर महिलाओं का पंजीकरण और भी कम रहा. चिकित्सा विज्ञान में डॉक्टरेट के दाखिले की संख्या सबसे कम रही. आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, "यह दर्शाता है कि अंडर ग्रेजुएट से मास्टर कोर्स और फिर शोध कार्यक्रमों में महिलाओं की रुचि कम होती चली गई. मोटे तौर पर महिलाओं ने आर्ट्स के विषयों को प्राथमिकता दी."

दूसरे शब्दों में कहें तो भारत की आधी आबादी की भागीदारी उच्च संस्थानों में भी बहुत कम है. आयोग की रिपोर्ट बताती है कि आईआईटी, एनआईटी, इसरो और डीआरडीओ सहित 620 से अधिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों में महिला वैज्ञानिक और प्रशासनिक कर्मचारियों की संख्या भी चौंकाने वाली है. इन संस्थानों में महिला वैज्ञानिकों की संख्या 20 प्रतिशत, पोस्ट डॉक्टरेट में 28.7 फीसदी और पीएचडी महिलाओं की संख्या 33.5 प्रतिशत है.

क्यों है यह खाई

शोध में पता चला कि लड़कियां स्कूल में गणित और विज्ञान के विषयों में लड़कों से बेहतर प्रदर्शन करती हैं लेकिन लड़के आगे की पढ़ाई में इन विषयों को पसंद बनाकर भविष्य को आकार देते हैं. फिजिक्स के रिसर्चर अनुपम का मानना है, "जहां महिलाओं की भागीदारी कम होगी वहां उनके खिलाफ भेदभाव भी ज्यादा होगा." वह कहते हैं कई बार रिसर्च गाइड, महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले कम तरजीह देते हैं. यह सोचते हुए कि अगर परिवार की वजह से महिला रिसर्चर पीएचडी छोड़ देंगी तो उनकी मेहनत बेकार हो जाएगी.  

2015 में आर्थिक सहयोग और विकास संगठन ने अंतरराष्ट्रीय छात्र मूल्यांकन कार्यक्रम के तहत 15 साल से कम उम्र के बच्चों पर गणित संबंधी शोध किया. गणित में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले छात्र और छात्राओं ने करीब छह महीने तक एक जैसा प्रदर्शन किया. लेकिन साल के खत्म होने तक जिन छात्राओं ने गणित में अच्छा प्रदर्शन करने की चिंता की, उन पर नकारात्मक असर हुआ. नीति आयोग का कहना है कि विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं के प्रवेश की समस्या पूरे देश में एक जैसी नहीं है. सरकार को शहर और गांव, दोनों स्तरों पर इंजीनियरिंग, फिजिक्स या केमिस्ट्री जैसे विषयों को छात्राओं के लिए लोकप्रिय बनाने की शुरुआत स्कूल में ही करनी करनी होगी.

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