सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप क्यों बन गया है यूरोप
२९ मई २०२६
पश्चिमी यूरोप का एक बड़ा हिस्सा इस समय वसंत के मौसम में ही पड़ रही भीषण गर्मी से जूझ रहा है. उत्तर में ब्रिटेन और आयरलैंड से लेकर जर्मनी और फ्रांस, और सुदूर दक्षिण में स्पेन तथा इटली तक तापमान इस समय रहने वाले औसत तापमान से काफी ज्यादा बढ़ गया है.
वसंत के मौसम में आई इस अजीब और बेमौसम गर्मी की वजह एक ‘हीट डोम' है. उत्तरी अफ्रीका से आया हवा के भारी दबाव वाला यह सिस्टम बहुत मजबूत है और धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है. इसने यूरोप के ऊपर गर्म हवा को बिल्कुल उसी तरह कैद कर लिया है, जैसे उबलते हुए पानी के बर्तन पर ढक्कन लगा दिया गया हो. यूरोपीय संघ की कॉपरनिकस जलवायु परिवर्तन सेवा के मुताबिक, पिछले 25 वर्षों में यूरोप में इस तरह की मौसम प्रणालियां सामान्य हो गई हैं, जिससे ज्यादा बार और ज्यादा तेज गर्म लहरें चलने लगी हैं.
इंपीरियल कॉलेज लंदन में क्लाइमेट साइंस की प्रोफेसर फ्रीडेरिक ओटो ने एक बयान में कहा, "इस स्तर का तापमान पहले कभी-कभार ही देखने को मिलता था, वो भी तब जब कड़कड़ाती गर्मियां अपने चरम पर होती थीं. इस बार के रिकॉर्ड तोड़ने वाले तापमान साफ तौर पर जलवायु परिवर्तन के असर को दिखा रहे हैं.”
दोगुनी रफ्तार से गर्म हो रहा यूरोप
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि जीवाश्म ईंधन से होने वाले उत्सर्जन से पैदा हुए ग्रीनहाउस इफेक्ट ने इस बार की रिकॉर्ड तोड़ गर्मी को कितना और ज्यादा भड़काया या खतरनाक बनाया है. हालांकि, साल 2003 के बाद से यूरोप में हीट वेब से जुड़ी आधा दर्जन से ज्यादा जिन घटनाओं पर स्टडी की गई है वह कुछ और ही कहानी बयां करती है. ब्रिटेन की संस्था ‘वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन' के मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसानों की वजह से जो जलवायु परिवर्तन हो रहा है, उसी के कारण मौसम का यह खतरनाक रूप अब कहीं ज्यादा देखने को मिल रहा है और इसकी तीव्रता भी बहुत बढ़ गई है. ओटे इस संस्था की सह-संस्थापक हैं.
अप्रैल में जारी हुई ‘यूरोपियन स्टेट ऑफ द क्लाइमेट' की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में यूरोप के कम से कम 95 फीसदी हिस्से में औसत से ज्यादा सालाना तापमान दर्ज किया गया. भीषण गर्मी का आलम यह था कि आर्कटिक सर्कल (ध्रुवीय क्षेत्र) जैसे ठंडे इलाकों में भी तापमान 30 डिग्री सेल्सियस के पार चला गया. इसके अलावा, समुद्र की सतह का तापमान भी इतिहास में अब तक का ‘सबसे गर्म' दर्ज किया गया. इस रिपोर्ट को तैयार करने वाली एजेंसियों में से एक ‘यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट्स' के प्रमुख फ्लोरियान पैपेनबर्गर ने कहा, "यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप है और इसके बुरे असर अभी से ही काफी खतरनाक रूप में दिखने लगे हैं.”
हकीकत तो यह है कि यूरोप पूरी दुनिया के मुकाबले दोगुनी रफ्तार से गर्म हो रहा है. 19वीं सदी के आखिर के पूर्व-औद्योगिक स्तर के मुकाबले, आज यूरोप का औसत तापमान 2.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है. वहीं, अगर पूरी दुनिया की बात करें, तो विशेषज्ञों ने यह वैश्विक औसत बढ़ोतरी सिर्फ 1.4 डिग्री सेल्सियस ही दर्ज की है.
आखिर इतनी गर्मी क्यों बढ़ रही है?
यूरोप में इतनी तेज रफ्तार से बढ़ती गर्मी की एक वजह उसकी भौगोलिक स्थिति भी है. दरअसल, यूरोप सीधे आर्कटिक (उत्तरी ध्रुव) से जुड़ा हुआ है और आर्कटिक दुनिया की इकलौती ऐसी अन्य जगह है जो पहले से कहीं ज्यादा तेजी से गर्म हो रही है.
ईयू की कॉपरनिकस जलवायु परिवर्तन सेवा के डेटा के मुताबिक, उत्तरी ध्रुव के आस-पास का औसत तापमान पहले ही 3.3 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ चुका है. इसकी एक वजह यह भी है कि आर्कटिक महासागर का पानी गहरा होने और बर्फ न होने की वजह से, बर्फ के मुकाबले सूरज की रोशनी ज्यादा सोख लेता है. जबकि बर्फ सूरज की रोशनी को वापस लौटा देता है.
इस पूरी प्रक्रिया को ‘अल्बेडो इफेक्ट' कहा जाता है और यही चीज इस समय पूरे यूरोप में भी हो रही है. यूरोप के वे इलाके जहां पहले पूरे साल या फिर गर्मियों के अंत तक बर्फ जमा रहता था, जैसे आल्प्स के ऊंचे पहाड़ी इलाके, वहां अब बर्फ तेजी से गायब हो रहा है. जब बर्फ हट जाता है, तो नीचे की गहरे रंग की जमीन सूरज की गर्मी को अंतरिक्ष में वापस नहीं भेज पाती, बल्कि खुद सोख लेती है. इसी वजह से वहां गर्मी और तेजी से बढ़ने लगी है.
बदलती हवाओं से मौसम के पैटर्न में बदलाव
वैज्ञानिकों ने यूरोप में बढ़ती गर्मी का नाता ‘जेट स्ट्रीम' के बदलते मिजाज से भी जोड़ा है. जेट स्ट्रीम आसमान में बहुत ऊंचाई पर बहने वाली हवा की एक तेज धारा जैसी है, जो पश्चिम से यूरोप की तरफ बहती है. पहले ये हवाएं काफी शांत और स्थिर हुआ करती थीं, लेकिन जलवायु परिवर्तन से इसमें भी काफी बदलाव हुआ है. कभी काफी हद तक स्थिर रहने वाली ये हवाएं अब जलवायु परिवर्तन के कारण बाधित हो गई हैं, जिससे मौसम के ऐसे चरम पैटर्न बन रहे हैं जो लंबे समय तक बने रहते हैं. जैसे, कई दिनों तक लगातार भीषण गर्मी पड़ना.
जर्मनी के ‘पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च' में पोस्टडॉक्टोरल रिसर्चर रहीं एफी राउसी की अगुवाई में साल 2022 में एक स्टडी हुई थी. इसमें पाया गया कि वह समय अब बहुत बढ़ गया है जब आसमान की ये तेज हवाएं (जेट स्ट्रीम) दो हिस्सों या शाखाओं में बंट जाती हैं. इसका नतीजा यह होता है कि पूरे यूरोप में और खासकर पश्चिमी हिस्से में भीषण गर्मी के दिनों की संख्या काफी बढ़ जाती है.
उस समय दिए गए एक बयान में राउसी ने कहा था, "यह क्षेत्र उस जगह पर पड़ता है जहां उत्तर अटलांटिक से यूरोप की ओर आने वाले तूफानी मौसम का रास्ता खत्म होता है. आम तौर पर, यहां का मौसम अटलांटिक महासागर से तय होता है, इसलिए इसका असर ठंडक देने वाला होता है. लेकिन जब जेट स्ट्रीम दो हिस्सों में बंट जाती है, तो ये ठंडी हवाएं उत्तर की तरफ मुड़ जाती हैं और इस वजह से पश्चिमी यूरोप में लगातार भीषण गर्मी बनी रहती है.”
साफ हवा से बढ़ रहा धरती का तापमान
हैरानी की बात यह है कि पर्यावरण की एक दूसरी समस्या को कम करने की कोशिशों ने यूरोप में गर्मी बढ़ाने में भी योगदान दिया है. 2025 की ‘यूरोपियन स्टेट ऑफ द क्लाइमेट' रिपोर्ट में बताया गया है कि 1980 के दशक से हवा की गुणवत्ता को लेकर लागू किए गए सख्त नियमों से वायु प्रदूषण तो कम हुआ है, लेकिन अब यही नियम तापमान बढ़ने का कारण बन रहे हैं.
साफ हवा से जुड़े नियम लागू होने से पहले, गाड़ियों के धुएं और फैक्ट्रियों की चिमनियों से निकलने वाले बहुत छोटे सल्फेट और नाइट्रेट कण सूरज की रोशनी को वापस परावर्तित कर देते थे. इस वजह से यूरोप को कुछ हद तक ठंडक मिलती थी और यह ‘ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी के कारण होने वाली गर्मी के असर को कुछ हद तक कम कर देते थे.' हालांकि, जलवायु वैज्ञानिकों ने इस बात पर जोर दिया है कि इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया को उत्सर्जन कम करने की कोशिशें छोड़ देनी चाहिए.
दुनिया को और ज्यादा गर्म होने से बचाना कितना जरूरी है, इस बात को संयुक्त राष्ट्र की ‘विश्व मौसम विज्ञान संगठन' और ब्रिटेन के ‘मेट ऑफिस' की ओर से गुरुवार को जारी की गई एक नई रिपोर्ट में जोर देकर बताया गया है. इस स्टडी में अनुमान लगाया गया है कि अगले पांच सालों में दुनिया का औसत तापमान रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस बात की ‘पूरी आशंका' है कि साल 2031 से पहले ही दुनिया अब तक के इतिहास का सबसे गर्म साल देख लेगी.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने इस महीने की शुरुआत में कहा था, "हमें क्या काम करना है, यह बिल्कुल स्पष्ट है.” उन्होंने तापमान में बढ़ोतरी को कम करने के प्रयासों का आह्वान किया, ताकि ‘सभी के लिए एक सुरक्षित, न्यायपूर्ण और बेहतर भविष्य बनाया जा सके.' हाल ही में संयुक्त राष्ट्र ने जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को कम और खत्म करते हुए एक ‘तेज, निष्पक्ष और न्यायसंगत बदलाव' का समर्थन जारी रखने के लिए वोट किया. इस बीच, साल 2000 के बाद से अक्षय ऊर्जा के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल ने मौसम के बिगड़ने की रफ्तार को धीमा किया है, जिससे हम ग्लोबल वार्मिंग के सबसे भयानक और डरावने दौर में पहुंचने से बच गए हैं.