कोरोना वायरस के मरीज को वेंटिलेटर क्यों लगाना पड़ता है? | विज्ञान | DW | 08.04.2020
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विज्ञान

कोरोना वायरस के मरीज को वेंटिलेटर क्यों लगाना पड़ता है?

दुनिया भर के देश कोविड-19 के मरीजों के लिए वेंटिलेटर का इंतजाम करने में लगे हैं. कई कंपनियां जल्द से जल्द काम चलाऊ वेंटिलेटर बनाने में भी लग गई हैं. लेकिन इनकी इतनी जरूरत है ही क्यों?

कोरोना वायरस शरीर की श्वसन प्रणाली पर हमला करता है. कोरोना के शिकार कम से कम 20 फीसदी मामलों में देखा गया है कि वायरस फेफड़ों के इतनी अंदर बैठा होता है कि मरीज के लिए सांस लेना ही मुश्किल हो जाता है. ऐसे में जल्द से जल्द वेंटिलेटर लगाने की जरूरत पड़ती है. समस्या तब शुरू होती है जब मरीजों की संख्या वेंटिलेटर से ज्यादा हो जाए. दुनिया के विकसित देश भी इस वक्त इस समस्या से जूझ रहे हैं. इटली और स्पेन में डॉक्टरों को तय करना पड़ रहा है कि किसे वेंटिलेटर लगाएं और किसे नहीं.

कैसे काम करते हैं वेंटिलेटर?

फेफड़े जब काम करना बंद कर दें तब शरीर को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और ना ही शरीर के अंदर मौजूद कार्बन डायऑक्साइड बाहर निकल पाती है. साथ ही फेफड़ों में तरल भर जाता है. ऐसे में कुछ ही देर में दिल भी काम करना बंद कर देता है और मरीज की मिनटों में ही मौत हो जाती है.

वेंटिलेटर के जरिए शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाई जाती है. यह ऑक्सीजन फेफड़ों में वहां पहुंचती है जहां बीमारी के कारण तरल भर चुका होता है. सुनने में यह आसान लग सकता है लेकिन यह एक बेहद पेचीदा काम है. आधुनिक वेंटिलेटर मरीज की जरूरतों के हिसाब से शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाते हैं. पीसीवी यानी प्रेशर कंट्रोल्ड वेंटिलेटर सांस की नली और फेफड़ों की कोशिकाओं के बीच कुछ इस तरह से दबाव बनाते हैं कि शरीर में ज्यादा से ज्यादा ऑक्सीजन पहुंच सके. जैसे ही सही प्रेशर बनता है शरीर से कार्बन डायऑक्साइड निकलने लगती है. इस तरह से वेंटिलेटर की मदद से इंसान सांस लेने लगता है. 

वेंटिलेटर लगे मरीज का क्या हाल होता है?

वेंटिलेटर अलग अलग तरह के होते हैं. नॉन इनवेसिव वेंटिलेशन में नाक और मुंह को ढंकता हुआ एक मास्क लगाया जाता है जो सांस लेने में मदद करता है. इंवेसीज वेंटिलेशन जिसे इंट्यूबेशन भी कहा जाता है में नाक या मुंह के जरिए एक ट्यूब को सांस की नली यानी विंड पाइप में डाला जाता है. अगर मरीज की हालत बहुत ज्यादा खराब हो तो ट्रेकिआटमी का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें गले में एक छोटा सा सुराख कर ऑक्सीजन वाली ट्यूब को सीधे विंड पाइप में डाला जाता है.

जिस मरीज को वेंटिलेटर लगा हो वह ना बोल सकता है, ना कुछ खा सकता है. एक अलग ट्यूब के जरिए उसके शरीर में ग्लूकोस पहुंचाया जाता है. इनवेसिव वेंटिलेशन मरीज के लिए काफी असहज होती है. इसलिए अधिकतर मामलों में एनेसथीसिया दे कर मरीज को आर्टिफिशियल कोमा में डाल दिया जाता है.

वेंटिलेटर की इतनी कमी क्यों है?

दुनिया भर के देश वेंटिलर की किल्लत से गुजर रहे हैं. कम समय में वेंटिलेटर की संख्या बढ़ाना विकसित देशों के लिए भी मुश्किल हो रहा है. एक हाय परफॉर्मेंस वेंटिलेटर की कीमत यूरोप में 50,000 यूरो तक होती है यानी करीब 40 लाख रुपये. साथ ही ऐसी गिनी चुनी कंपनियां हैं जो इस तरह के अत्याधुनिक वेंटिलेटर बनाती हैं जो कृत्रिम फेफड़े की तरह काम करने में सक्षम हैं. हालांकि इन कंपनियों ने इस बीच तेजी से वेंटिलेटर का उत्पादन शुरू कर दिया है लेकिन यह अभी भी काफी नहीं है.

और अगर भारी मात्रा में वेंटिलेटर मिल भी जाएं तो भी समस्या खत्म नहीं होती है क्योंकि अस्पताल का हर स्टाफ इन पेचीदा वेंटिलेटर का इस्तेमाल नहीं जानता है. ऐसे में प्रशीक्षित स्टाफ की कमी भी एक मुद्दा है. जर्मनी की बात की जाए तो यहां कुल 1160 अस्पताल ऐसे हैं जहां आईसीयू हैं. एक लाख लोगों पर यहां 33.7 इंटेंसिव केयर बेड हैं. यूरोप के बाकी के देशों के मुकाबले यह काफी ज्यादा है. 2010 के आंकड़ों के मुताबिक इटली में एक लाख पर महज 12.5 इंटेंसिव केयर बेड थे. 2018 में नीदरलैंड्स में एक लाख लोगों पर मात्र 7.1 बेड ही थे. हालांकि कोरोना संकट के शुरू होने के बाद इनकी तादाद को बहुत तेजी से बढ़ाया गया है. 

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