जब हमलावरों ने इस्लाम की सबसे पवित्र जगह मक्का पर कब्जा कर लिया | दुनिया | DW | 20.11.2019
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दुनिया

जब हमलावरों ने इस्लाम की सबसे पवित्र जगह मक्का पर कब्जा कर लिया

1979 में मक्का पर सैकड़ों हथियारबंद लोगों ने हमला कर हजारों लोगों को बंधक बना लिया था. 14 दिन तक लोगों को बंधक बनाए रखा गया. हमलावरों के खिलाफ अल हरम मस्जिद में सैन्य कार्रवाई की गई. इसके बाद सऊदी अरब की सूरत ही बदल गई.

अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से 20 नवंबर 1979 और इस्लामिक कैलेंडर के हिसाब से साल 1400 का पहला दिन. इस्लाम में सबसे पवित्र जगहों में शामिल मक्का. दुनियाभर से लाखों की संख्या में मुस्लिम वहां इकट्ठा हुए थे. हज यात्रा दो सप्ताह पहले खत्म हो गई थी लेकिन नए साल के ऐतिहासिक मौके का गवाह बनने के लिए वहीं रुक गए थे. सुबह करीब 5 बजकर 15 मिनट का वक्त. सुबह की पहली नमाज जिसे फज्र कहते हैं, हो चुकी थी. इमाम शेख मोहम्मद अल सुबाइल ने नमाज अदा करवाई. नमाज खत्म होते ही सफेद कपड़े पहने मस्जिद में पहले से मौजूद सैकड़ों हथियारबंद लोग नजर आने लगे. इनमें से कुछ लोग इमाम की तरफ बढ़े और माइक को अपने कब्जे में लिया. माइक पर वो अपने लोगों को पॉजीशन लेने के निर्देश देने लगे. माइक पर निर्देश दे रहे आदमी का नाम जुहेमान अल ओतायबी था. ओतायबी सऊदी अरब की सेना में रह चुका था और वो इस्लामिक शिक्षा देने वाले छात्रों के एक समूह का नेता था. वो माइक पर कह रहा था कि मेहदी आ गए हैं. अब अन्याय और अत्याचार से भरी इस धरती पर निष्पक्षता के साथ न्याय होगा. वो अल्लाह हू अकबर के नारे लगाने लगे.

इस्लामिक मान्यताओं में मेहदी को पृथ्वी के रक्षक के रूप में माना गया है. मेहदी को महादी या माहदी भी बोला जाता है. मेहदी का जिक्र कुरान में नहीं है. मेहदी के बारे में हदीस में कहा गया है. इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार कुरान में वो बातें लिखी हैं जो अल्लाह ने पैगंबर मोहम्मद से कहीं थी जबकि हदीस में पैगंबर मोहम्मद द्वारा दी गई मौखिक शिक्षाएं हैं. हदीस में कहा गया है कि जब धरती पर अत्याचार ज्यादा बढ़ जाएगा तब कयामत के दिन से पहले मेहदी धरती पर आएंगे. मेहदी ना कभी घायल हो सकते हैं और ना ही मर सकते हैं. कयामत का दिन उस दिन को माना जाता है जब धरती का अंत हो जाएगा. अब्राहमिक धर्मों में मेहदी जैसी मान्यताएं हैं. खुद को मेहदी बताने वाले इन लोगों ने मक्का मस्जिद में हमला किया जहां काबा का पवित्र स्थान है. काबा को अल्लाह का घर माना जाता है.

ओतायबी ने भीड़ को एक आदमी की ओर इशारा कर कहा कि ये मेहदी हैं. उस आदमी का नाम मोहम्मद अबदुल्ला अल कहतानी था. इस एलान के बाद कहतानी माइक की तरफ आगे बढ़ा. ओतायबी ने भीड़ के सामने कहतानी का सम्मानपूर्वक अभिवादन किया जिससे भीड़ को उसके दावे पर और भी यकीन हो जाए. ओतायबी एक कट्टर सुन्नी इस्लामिक धड़े सलाफी से ताल्लुक रखता था. उसका कहना था कि सऊदी साम्राज्य इस्लाम के रास्ते से भटक गया है. वो भ्रष्ट हो गए हैं और पश्चिमी देशों के इशारे पर चल रहे हैं. काबा जिस मस्जिद में स्थित है उसका नाम अल हरम मस्जिद है. अफरा तफरी की खबर लगते ही पुलिस वहां पहुंची. ये पुलिसकर्मी निहत्थे थे जो मस्जिद की सुरक्षा में तैनात थे. हथियारबंद हमलावरों से झड़प में ये पुलिसकर्मी मारे गए. उस वक्त मस्जिद में करीब एक लाख लोग मौजूद थे. और ये सब अब बंधक थे.

सऊदी अरब के गुप्तचर विभाग के प्रमुख प्रिंस टर्की तब अरब लीग में भाग लेने क्राउन प्रिंस फहद बिन अब्दुल अजीज के साथ ट्यूनिशिया गए थे. वहीं सऊदी नेशनल गार्ड्स के प्रमुख प्रिंस अब्दुल्ला बिन अब्दुल अजीज मोरक्को में थे. उन्हें इस हमले के बारे में जानकारी दी गई. सुबह आठ बजे के करीब मस्जिद की तरफ बढ़ रहे एक पुलिस अधिकारी को मस्जिद में तैनात एक स्नाइपर ने गोली मार दी. इससे साबित हो गया कि हमलावर पूरी तैयारी के साथ आए थे. वो लगातार फायरिंग कर रहे थे. हमलावर ट्रकों में सवार होकर यहां तक पहुंचे थे. उन्होंने पहले ही मस्जिद में बड़ी संख्या में हथियार और खाने पीने का सामान पहुंचा दिया था. बाद में पता चला कि इन लोगों ने ताबूतों के अंदर रखकर मस्जिद में हथियार भेजे थे.  बंधकों में सऊदी अरब के अलावा दूसरे देशों के भी लोग थे. हमलावरों ने दूसरे देशों के बंधंकों को छोड़ना शुरू किया लेकिन सऊदी निवासियों को ऐसी कोई रियायत नहीं दी.

Juhayman al-Otaibi (public domain)

जुहेमान अल ओतायबी.

सऊदी अरब की सरकार ने इस हमले को लेकर किसी भी तरह के प्रसारण पर पाबंदी लगा दी. लोगों को पता नहीं चल पा रहा था कि हो क्या रहा है. सऊदी अरब के साथ परेशानी ये थी कि वो मस्जिद पर हमला नहीं कर सकते थे. इसी उहापोह के बीच समय गुजरता गया. सऊदी सरकार ने इस्लामिक धर्म गुरुओं से बात की और मस्जिद में सैन्य कार्रवाई करने की इजाजत मांगी. इजाजत मिलने के बाद सऊदी सेना ने हमले शुरू किए लेकिन हमलावरों की तैयारी बेहद पुख्ता थी. मस्जिद के बाहरी इलाके में तैनात कई हमलावर मारे गए. मस्जिद की मीनारों पर तोपों से हमला किया गया. सऊदी सरकार ने मस्जिद की बिजली काट दी. इससे सेनाओं को मस्जिद में घुसने में आसानी हुई और दूसरे दिन की रात में उन्हें मस्जिद में अंदर घुसने में कामयाबी मिली.

मेहदी होने का दावा करने वाला कहतानी खुद भी लड़ाई में हिस्सा ले रहा था. वो लगातार हमलावरों को गोलियां पहुंचा रहा था और घायल हमलावरों की मदद कर रहा था. इस दौरान कहतानी भी घायल हो गया जबकि इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार मेहदी घायल नहीं हो सकते. कहतानी को मस्जिद के दूसरे फ्लोर पर गोली लगी थी. गोली लगते ही शोर मच गया कि मेहदी घायल हैं. हालांकि हमलावर चिल्लाते रहे कि ये झूठ है. इसी बीच पाकिस्तान और फ्रांस ने अपनी कमांडो टीम को सऊदी अरब भेजा. पाकिस्तान की इस कमांडो टीम का नाम रहबर था. इसका नेतृत्व मेजर परवेज मुशर्रफ ने किया जो बाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने. इस कार्रवाई को चलते हुए कई दिन बीत गए थे. अभी मस्जिद के कुछ हिस्से पर सऊदी सेना और कुछ हिस्से पर हमलावरों का कब्जा था. कुछ हमलावर मस्जिद के अंडरग्राउंड में भी छिपे थे. दूसरे देशों की मदद मिलने के बाद सऊदी सेनाओं की स्थिति और मजबूत हो गई. इस सैन्य कार्रवाई में सैकड़ों हमलावर मारे गए. मारे गए लोगों में बड़ी संख्या में आम लोग भी शामिल थे. 14 दिन तक चलने के बाद 4 दिसंबर को यह लड़ाई खत्म हो गई. जिंदा बचे हमलावरों ने आत्मसमर्पण कर दिया. इनमें ओतायबी और कहतानी भी शामिल थे. सऊदी सरकार ने इनमें से ओतायबी और कहतानी समेत 63 लोगों को गिरफ्तार कर 9 जनवरी 1980 के दिन सार्वजनिक रूप से मौत की सजा दी. 

1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई थी. इस इस्लामिक क्रांति के बाद से ही उदार समझे जाना वाला सऊदी राजपरिवार चिंताग्रस्त था. ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता अयातोल्लाह खोमैनी ने इस हमले को अमेरिका की साजिश बताया. गुस्साई भीड़ ने इस्लामाबाद में अमेरिकी दूतावास में आग लगा दी. साथ ही कई मुस्लिम देशों में अमेरिका विरोधी प्रदर्शन भी हुए. ऐसा पहली बार नहीं था जब किसी ने खुद के मेहदी होने का दावा किया हो. सूडान के नेता मोहम्मद अहमद, भारत के मिर्जा गुलाम अहमद और मेहदी जौनपुरी, धार्मिक नेता मोहम्मद जुमात इमाम समेत सैकड़ों लोग इस तरह के दावे कर चुके थे. लेकिन इस हमले ने सऊदी अरब की परिस्थितियों को काफी हद तक बदल दिया. इस हमले के बाद वहां कट्टरपंथ और जिहाद का प्रसार होने लगा और वहाबी कट्टरपंथ को बढ़ावा मिला. माना जाता है इस हमले में एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए लेकिन आधिकारिक आंकड़ा 330 का बताया गया.

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