क्या होता है वक्फ बोर्ड जो राम मंदिर विवाद में मुस्लिमों का पक्षकार है | भारत | DW | 17.10.2019
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भारत

क्या होता है वक्फ बोर्ड जो राम मंदिर विवाद में मुस्लिमों का पक्षकार है

क्या वक्फ बोर्ड फतवा जारी कर सकते हैं? क्या वक्फ बोर्ड मुस्लिमों के प्रतिनिधि हैं? क्या वक्फ बोर्ड का चेयरमैन अपनी मर्जी से कोई फैसला ले सकते हैं? क्या होता है वक्फ बोर्ड और ये कैसे बनता है, जानते हैं.

अयोध्या के जमीन विवाद की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में पूरी हो चुकी है. इस सुनवाई में एक पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड भी है. इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले में विवादित जमीन का एक हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को भी दिया गया था. भारत में मुस्लिमों के अधिकारों की जब बात आती हैं तो वक्फ बोर्ड का नाम भी सामने आता है. लेकिन ये वक्फ होता क्या है और मुस्लिमों की पक्षकारी करने के लिए इस संस्था के पास कौन से अधिकार हैं.

क्या है वक्फ?

वरिष्ठ पत्रकार शाजेब जिलानी के मुताबिक वक्फ शब्द का अर्थ किसी भी धार्मिक काम के लिए किया गया कोई भी दान होता है. यह दान पैसे, संपत्ति या काम का हो सकता है. कानूनी शब्दावली में बात करें तो इस्लाम को मानने वाले किसी इंसान का धर्म के लिए किया गया किसी भी तरह का दान वक्फ कहलाता है. इस दान को धार्मिक और पवित्र माना जाता है. इसके अलावा अगर किसी संपत्ति को लंबे समय तक धर्म के काम में इस्तेमाल किया जा रहा है तो उसे भी वक्फ माना जा सकता है. वक्फ शब्द का इस्तेमाल अधिकतर इस्लाम से जुड़ी हुए शैक्षणिक संस्थान, कब्रिस्तान, मस्जिद और धर्मशालाओं के लिए भी किया जाता है. अगर कोई एक बार किसी संपत्ति को वक्फ कर देता है तो उसे वापस नहीं लिया जा सकता है. एक गैर मुस्लिम भी वक्फ कर सकता है लेकिन उसकी इस्लाम में आस्था होना जरूरी है. साथ ही वक्फ करने का उद्देश्य भी इस्लामिक होना चाहिए.

वक्फ काम कैसे करते हैं

सभी वक्फ बोर्ड की निगरानी करने का काम केंद्रीय वक्फ परिषद का होता है. इस संस्था को केंद्रीय सरकार ने वक्फ एक्ट 1954 के जरिए स्थापित किया था. इसका काम देशभर के वक्फ बोर्डों की निगरानी करना होता है. इस परिषद के अध्यक्ष केंद्र सरकार में वक्फ मामलों के मंत्री होते हैं. उनके अलावा इस परिषद में 20 सदस्य हो सकते हैं. परिषद राज्य के वक्फों की भी मदद करता है. इस मदद को मुशरुत उल खिदमत कहा जाता है. मुशरुत उल खिदमत का शाब्दिक अर्थ एक प्रयोजन के लिए दी जाने वाली मदद होता है. वक्फ एक्ट में 1995 में एक नियम और जोड़ा गया था. अब वक्फ बोर्ड की निगरानी 1995 के कानून के तहत की जाती है. एक सर्वे कमिशनर वक्फ घोषित की गई सभी संपत्तियों की जांच करता है. इसके लिए वो गवाहों और कागजातों की भी मदद लेते हैं. वक्फ का काम देखने वाले शख्स को मुतावली कहा दाता है.

वक्फ बोर्ड के पास दी गई किसी भी संपत्ति पर कब्जा रखने या उसे किसी और को देने का अधिकार होता है. वक्फ को कोर्ट द्वारा समन किया जा सकता है. भारत में अधिकांश राज्यों के वक्फ बोर्ड हैं. गोवा और पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों में वक्फ बोर्ड नहीं हैं. राज्य वक्फ बोर्ड में एक चेयरमैन के साथ राज्य सरकार द्वारा मनोनीत कुछ सदस्य, मुस्लिम नेता और विधायक, राज्य बार काउंसिल के मुस्लिम सदस्य, स्कॉलर और एक लाख से ज्यादा वार्षिक आय वाले वक्फ के मुतावली शामिल होते हैं. वक्फ बोर्ड अपनी किसी भी संपत्ति को किसी और के नाम हस्तांतरित कर सकता है. इसके लिए वक्फ के दो तिहाई सदस्यों की सहमति होना जरूरी है. फतवा जारी करना वक्फ का काम नहीं होता है.

क्या वक्फ बोर्ड मुस्लिमों का पक्षकार हो सकता है

वक्फ किसी भी मामले में एक संस्था के तौर पर पक्षकार तो हो सकता है. लेकिन ये पक्षकार मुस्लिम समुदाय का नहीं माना जाएगी. वक्फ के अध्यक्ष या कोई सदस्य अगर अपनी तरफ से किसी अदालत में कोई केस करते हैं तो इसकी मुस्लिम समुदाय के लिए कोई बाध्यता नहीं होती. बोर्ड की इजाजत के बिना किसी भी सदस्य या अध्यक्ष बोर्ड की तरफ से कोई मुकदमा करना गैर कानूनी है. ऐसे विवाद की सुनवाई के लिए विशेष प्राधिकरण बने हैं. अयोध्या जमीन विवाद मामले में मुस्लिम पक्ष की सात याचिकाएं हैं. इनमें छह याचिका छह अलग अलग लोगों ने और एक सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दाखिल की है. सुन्नी वक्फ बोर्ड की किसी भी याचिका को वापस लेने जैसा फैसला वक्फ बोर्ड की वोटिंग में दो तिहाई के बहुमत के बाद ही लिया जा सकता है. सुन्नी वक्फ बोर्ड मुस्लिम पक्ष की तरफ से मुकदमा लड़ रहा है इसलिए इसे मुस्लिमों का प्रतिनिधि माना जा रहा है.

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