क्या है ट्रांसजेंडर अधिकार संरक्षण बिल जिस पर ट्रांसजेंडर समुदाय सरकार से नाराज है | भारत | DW | 22.11.2019
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भारत

क्या है ट्रांसजेंडर अधिकार संरक्षण बिल जिस पर ट्रांसजेंडर समुदाय सरकार से नाराज है

ट्रांसजेंडर अधिकार संरक्षण बिल लोकसभा में 5 अगस्त 2019 को पास करवा लिया गया था. राज्यसभा में इस बिल पर बहस चल रही है. ट्रांसजेंडर घोषित करने सहित कई प्रावधानों पर बहस और विवाद चल रहा है.

 साल 2014 में भारत सरकार की संस्था नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी और भारत सरकार के बीच हुए एक मुकदमे का फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर को थर्ड जेंडर माना. कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि ट्रांसजेंडर को अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी में रखा जाए और इसके लाभ उन्हें दिए जाएं. इस फैसले के बाद तमिलनाडु से डीएमके पार्टी के राज्यसभा सांसद तिरुची शिव ने सदन में ट्रांसजेंडरों के लिए एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया. केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री थावरचंद गहलोत ने शिव के बिल पर कहा कि सरकार इस मुद्दे पर नीति बना रही है. इसलिए इस बिल को वो वापस ले लें लेकिन ऐसा शिव ने ऐसा नहीं किया और ये प्राइवेट बिल अप्रैल 2015 में राज्यसभा से पास हो गया.

लोकसभा में तत्कालीन बीजेडी सांसद बैजयंत पांडा ने यह प्राइवेट बिल पेश किया. वहां इस बिल को सरकार ने टेक ओवर कर लिया. इस बिल को संसद की स्टैंडिंग समिति को भेज दिया गया. इस समिति ने बिल में कई बदलाव सुझाए. इनमें से 27 बदलावों को सरकार ने माना और दिसंबर 2018 में यह बिल लोकसभा में पास हो गया. हालांकि लोकसभा का कार्यकाल खत्म होने तक यह राज्यसभा में पेश नहीं हो सका और बिल अमान्य हो गया.

5 अगस्त को राज्यसभा में जब जम्मू कश्मीर के विशेष अधिकार को खत्म करने पर बहस चल रही थी तब लोकसभा में इस बिल को ट्रांसजेंडर अधिकार एवं संरक्षण बिल 2019 के नाम से लोकसभा में पेश किया जहां यह पास हो गया. लेकिन ट्रांसजेंडर अधिकार की वकालत करने वालों ने इस बिल का विरोध किया. इन संगठनों ने इस दिन को 'जेंडर जस्टिस मर्डर डे' कहा. इस बिल पर 20 नवंबर को राज्यसभा में बहस हुई. बहस में विपक्ष के नेताओं ने बिल के कई प्रावधानों पर आपत्ति जताई और इसे स्टैंडिंग कमिटी को भेजने की मांग की.

क्या है इस बिल में

ट्रांसजेंडर वो इंसान होते हैं जिनका लिंग जन्म के समय तय किए गए लिंग से मेल नहीं खाता. इनमें ट्रांस मेन, ट्रांस वीमन, इंटरसेक्स और किन्नर भी आते हैं. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक इन लोगों के पास अपना लिंग निर्धारित करने का भी अधिकार होता है. ट्रांसजेंडरों को समाज में भेदभाव और हिंसा का सामना करना पड़ता है. इसको रोकने के लिए सरकार कानून बनाना चाहती है. इस बिल में ट्रांसजेंडरों की परिभाषा तय की गई है.

बिल के मुताबिक ट्रांसजेंडर व्यक्ति ऐसा व्यक्ति है जो ना तो पूरी तरह से महिला है और ना ही पुरुष. वह महिला और पुरुष, दोनों का संयोजन भी हो सकता है या फिर दोनों में से कोई नहीं. इसके अतिरिक्त उस व्यक्ति का लिंग जन्म के समय नियत लिंग से मेल नहीं खाता और जिसमें ट्रांस-मेन (परा-पुरुष), ट्रांस-वीमन (परा-स्त्री) और इंटरसेक्स भिन्नताओं और लिंग विलक्षणताओं वाले व्यक्ति भी आते हैं.

ऐसे व्यक्तियों को स्वतः अनुभव से अपने लिंग का निर्धारण करना होगा. इसके बाद इस पहचान के लिए उन्हें एक प्रमाण पत्र हासिल करना होगा जो इन्हें ट्रांसजेंडर के रूप में मान्यता देगा. यह प्रमाण पत्र जिला कलेक्टर ऑफिस में आवेदन करने से हासिल होगा. यह आवेदन एक स्क्रीनिंग कमेटी को भेजा जाएगा. इस कमेटी में चीफ मेडिकल ऑफिसर, जिला सामाजिक कल्याण अधिकारी, एक मनोचिकित्सक, एक सरकारी अधिकारी और ट्रांसजेंडर समुदाय का एक प्रतिनिधि होगा. कमिटी के सुझाव पर कलेक्टर ट्रांसजेंडर सर्टिफिकेट जारी करेंगे. इस सर्टिफिकेट के आधार पर ही व्यक्ति का लिंग सरकारी दस्तावेजों में दर्ज होगा. अगर व्यक्ति अपने लिंग में कोई परिवर्तन महसूस करता है तो फिर से इसी प्रक्रिया को अपना कर नए सर्टिफिकेट के लिए आवेदन कर सकता है.

बिल के प्रावधान के मुताबिक सरकारी और सरकारी मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में ट्रांसजेंडरों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जाएगा. ट्रांसजेंडरों को संस्था की सभी गतिविधियों में सामान्य रूप से भाग लेने का पूरा अधिकार होगा.

कोई भी संस्था लिंग और शारिरिक भिन्नताओं के आधार पर ट्रांसजेंडरों को नौकरी या प्रमोशन देने में भेदभाव नहीं कर सकती है. इसके लिए 100 से ज्यादा कर्मचारियों वाली हर संस्था में एक शिकायत अधिकारी होगा जो ट्रांसजेंडरों के हितों की रक्षा करेगा और किसी भी तरह की शिकायत पर कार्रवाई करेगा.

ट्रांसजेंडरों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाने के लिए भी सरकार कदम उठाएगी. उनके लिए मेडिकल इंश्योरेंस की सुविधा उपलब्ध होगी. ट्रांसजेंडरों के लिए अलग से एचआईवी टेस्ट सेंटर और सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी सेंटर भी खोले जाएंगे. उन्हें हारमोनल थेरेपी काउंसिलिंग की सुविधा भी दी जाएगी.

ट्रांसजेंडरों को अपने परिवार और अपने घर में रहने का अधिकार दिया जाएगा. अगर उनका परिवार उनकी देखभाल करने में नाकाम होता है तो वो पुनर्वास केंद्र में या किराए के मकान में रह सकते हैं. कोई भी मकान मालिक ट्रांसजेंडरों को उनके लिंग की वजह से मकान किराए पर देने से मना नहीं कर सकता है. ट्रांसजेंडरों को अपने नाम से संपत्ति खरीदने का अधिकार भी इस बिल में दिया गया है.

ट्रांसजेंडरों को सारी सरकारी सुविधाओं का लाभ मिलना सुनिश्चित किया जाएगा. उन्हें विरोध प्रदर्शन और आंदोलन करने का अधिकार दिया जाएगा. साथ ही ट्रांसजेंडरों के पास पब्लिक या प्राइवेट ऑफिस खोलने का अधिकार होगा. इसका प्रावधान भी बिल में है.

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से संबंधित नीतियों और विधानों पर केंद्र सरकार को परामर्श देने के लिए एक राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद बनाई जाएगी. यह परिषद सरकारी नीतियों की निगरानी और मूल्यांकन करेगी. एनसीटी में सामाजिक न्याय एवं सशक्तीकरण, स्वास्थ्य, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री, नीति आयोग, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग और राज्य सरकार के प्रतिनिधि, ट्रांसजेंडर समुदाय के नामित सदस्य और गैर सरकारी संगठनों के विशेषज्ञ शामिल होंगे.

इस बिल में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से भीख मंगवाना, बलपूर्वक या बंधुआ मजदूरी करवाना (इसमें सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अनिवार्य सरकारी सेवा शामिल नहीं है), उन्हें सार्वजनिक स्थान का प्रयोग करने से रोकना, उन्हें परिवार, गांव इत्यादि में निवास करने से रोकना और उनका शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक उत्पीड़न करना अपराध की श्रेणी में रखा गया है. ऐसे अपराधों के लिए छह महीने से लेकर दो वर्ष तक कारावास और जुर्माने का प्रावधान है.

क्यों हो रहा है बिल का विरोध

इस बिल का विरोध कर रहे ट्रांसजेंडर संगठनों का कहना है कि उन्हें अपने लिंग की पहचान के लिए स्क्रीनिंग कमिटी से सर्टिफिकेट लेना होगा जो अपमानजनक है. इससे उनका सेल्फ आइडेंटिफिकेशन का अधिकार खत्म हो जाता है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश से उन्हें ये अधिकार मिलता है. साथ ही उनके साथ हुई यौन हिंसा में अपराधी को अधिकतम दो साल की सजा होगी. जबकि बलात्कार के लिए न्यूनतम सजा सात साल है. ऐसे में यह उनके मानवाधिकारों का भी उल्लंघन है. कांग्रेस सांसद राजीव गौड़ा ने कहा कि बिल में लिंग को एक मानसिक मुद्दा कहा गया है जो लिंग की पूरी संकल्पना के खिलाफ है.

लिंग का निर्धारण एक जैव वैज्ञानिक मुद्दा है. साथ ही बिल में लिखा है कि बच्चों को लिंग के आधार पर परिवार से अलग नहीं किया जा सकेगा. जबकि ऐसा भेदभाव बड़ों के साथ भी किया जाता है. ऐसे में ट्रांसजेंडर बच्चे के बड़े होते ही उन्हें घर से निकाल दिया जाएगा. बीजेडी सांसद संस्मित पात्रा ने कहा कि बिल में ट्रांसजेंडरों को सरकारी संस्थानों में पढ़ने का अधिकार दिया गया है जो एक सीमित अधिकार हो जाता है. साथ ही इस बिल में ट्रांसजेंडरों के साथ होने वाले भेदभाव को परिभाषित नहीं किया गया है. इस बिल को फिलहाल स्टैंडिंग कमिटी को भेजे जाने की संभावना है.

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