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सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता करने से पाकिस्तान का क्या फायदा

आदर्श शर्मा रॉयटर्स, एपी
१९ सितम्बर २०२५

दक्षिण एशियाई मामलों के जानकार माइकल कूगलमैन का कहना है कि अब तीन बड़ी शक्तियां - चीन, तुर्की और सऊदी अरब पूरी तरह से पाकिस्तान के पक्ष में आ गई हैं. वहीं, भारत ने इस समझौते के प्रभावों का अध्ययन करने की बात कही है.

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समझौता करने के बाद गले मिलते पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस सलमान
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस सलमान ने समझौते पर हस्ताक्षर किएतस्वीर: Saudi Press Agency/REUTERS

सऊदी अरब और भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान ने बुधवार को एक आपसी रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसमें कहा गया है कि अगर दोनों में किसी भी देश पर हमला होता है तो इसे दोनों देशों पर हमला माना जाएगा. परमाणु-संपन्न देश पाकिस्तान और सऊदी अरब ने इसके जरिए अपनी दशकों पुरानी साझेदारी को काफी मजबूती दी है.

कतर पर इस्राएल के हमले के कुछ दिन बाद ही यह समझौता हुआ है. अरब के एक अधिकारी ने इस समझौते के बारे में कहा कि यह किसी विशेष देश या विशेष घटना का जवाब नहीं है, बल्कि इसके जरिए दोनों देशों के बीच पुराने और गहरे सहयोग को संस्थागत रूप दिया गया है.

पाकिस्तान और सऊदी अरब ने न्यूज एजेंसी एपी के उस सवाल का जवाब नहीं दिया कि क्या यह समझौता पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को भी कवर करता है. हालांकि, सऊदी अरब के एक वरिष्ठ अधिकारी ने न्यूज एजेंसी रॉयटर्स से कहा, "यह एक व्यापक रक्षा समझौता है, जिसमें सभी सैन्य साधन शामिल हैं."

पाकिस्तान की एक मिलिट्री परेड में दिखाई जा रही बैलेस्टिक मिसाइल
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच लंबा सैन्य सहयोग रहा हैतस्वीर: Anjum Naveed/AP Photo/picture alliance

पाकिस्तान का क्या फायदा है

दक्षिण एशियाई मामलों के जानकार माइकल कूगलमैन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस बारे में अपनी राय रखी है. उन्होंने लिखा कि पाकिस्तान ने यह रक्षा समझौता अपने करीबी सहयोगी और भारत के शीर्ष साझीदार के साथ किया है. उन्होंने आगे लिखा, "यह समझौता भारत को पाकिस्तान पर हमला करने से नहीं रोक पाएगा. लेकिन तीन प्रमुख शक्तियों - चीन, तुर्की और अब सऊदी अरब - के पूरी तरह से पाकिस्तान के पक्ष में होने से, पाकिस्तान बहुत अच्छी स्थिति में आ गया है."

पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक हुसैन हक्कानी ने एक्स पर लिखा, "इस बात की काफी संभावना है कि अब पाकिस्तान सऊदी अरब के पैसों से अपनी जरूरत के अमेरिकी हथियार खरीद पाएगा, जिन्हें ट्रंप प्रशासन बेचना भी चाहता है." उन्होंने आगे लिखा कि ऐसी ही खरीदारी 1970 के दशक में भी हुई थी, जब अमेरिकी कांग्रेस विदेशी सैन्य वित्तपोषण के तहत पाकिस्तान को कर्ज देने के लिए तैयार नहीं थी.

भारत की प्रतिक्रिया

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि हम इस घटनाक्रम से हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करेंगे. उन्होंने आगे कहा, "सरकार भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने और सभी क्षेत्रों में व्यापक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है.”

रणनीतिक मामलों के प्रोफेसर डॉ. ब्रह्मा चेलानी ने एक्स पर लिखा कि पीएम मोदी ने पिछले सालों में सऊदी अरब को लुभाया है, दोनों देशों के बीच एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी बनाई है और सऊदी अरब के कई दौरे भी किए हैं. उन्होंने आगे लिखा, "फिर भी, मोदी के जन्मदिन पर क्राउन प्रिंस सलमान ने उन्हें एक अप्रिय आश्चर्य दिया है.”

चेलानी ने एक अन्य पोस्ट में लिखा कि सऊदी अरब जानता था कि भारत इस समझौते को अपनी सुरक्षा के लिए प्रत्यक्ष खतरा समझेगा, फिर भी उसने ऐसा किया. उनका मानना है कि यह पाकिस्तान की मजबूती नहीं बल्कि सऊदी अरब की महत्वाकांक्षा को दर्शाता है. उन्होंने लिखा कि सऊदी अरब अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए पाकिस्तान की कमजोरी को हथियार बनाना चाहता है.

कितना मजबूत है सऊदी अरब-पाकिस्तान का सैन्य रिश्ता

पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ लंबे समय से करीबी आर्थिक, धार्मिक और सुरक्षा संबंध रहे हैं. माना जाता है कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के लिए भी फंड दिया था. अभी भी सऊदी अरब ने पाकिस्तान को तीन अरब डॉलर का कर्ज दे रखा है, ताकि पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार संतुलित रहे.

सऊदी अरब में लंबे समय से पाकिस्तान के सैनिक भी तैनात रहे हैं. फिलहाल, इनकी संख्या 1,500 से 2,000 के बीच में है. ये पाकिस्तानी सैनिक सऊदी अरब की सेना को संचालन, तकनीकी और प्रशिक्षण से जुड़ी सहायता देते हैं. इसमें सऊदी अरब की थलसेना और वायुसेना को दी जाने वाली सहायता भी शामिल है.

पाकिस्तानी सैनिक पहली बार 1960 के दशक के आखिर में सऊदी अरब गए थे. उस दौरान, यमन में मिस्र के युद्द को लेकर चिंताएं थी. 1979 में इस्लामिक क्रांति के दौरान ये संबंध मजबूत हुए. उस समय सऊदी अरब को इराक के साथ युद्ध होने की चिंता थी. तब से दोनों देशों के सैन्य संबंध मजबूत ही रहे हैं, जिनके अब और मजबूत होने की संभावना विशेषज्ञ जता रहे हैं.

आदर्श शर्मा
आदर्श शर्मा डीडब्ल्यू हिन्दी के साथ जुड़े आदर्श शर्मा भारतीय राजनीति, समाज और युवाओं के मुद्दों पर लिखते हैं.
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