क्या है रेअर अर्थ, जिसकी चाबी चीन के पास है
डॉनल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात पर दुनियाभर की नजरें थीं. मीटिंग के सबसे अहम एजेंडा में रेअर अर्थ भी शामिल था. क्या है रेअर अर्थ? दुनिया को इसकी इतनी ज्यादा जरूरत क्यों है, और सप्लाई की चाबी चीन के पास क्यों है?

17 धातुओं का एक समूह है रेअर अर्थ
डॉनल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की ताजा मुलाकात से दो चर्चित हासिल निकले. एक, टैरिफ घटाने का एलान. और दूसरा, रेअर अर्थ देने पर चीन की रजामंदी. रेअर अर्थ, या दुर्लभ खनिज संपदा 17 एलिमेंट्स का एक समूह है. इनमें ज्यादातर हैवी-मैटल हैं.
सभी 17 रेअर अर्थ एलिमेंट्स के नाम
पीरियॉडिक टेबल के क्रम अनुसार इन तत्वों के नाम हैं: स्कैंडियम, इट्रियम, लैंथनम, सेरियम, प्रेजियोडिमियम, नियोडिमियम, प्रॉमीथियम, समैरियम, यूरोपियम, गैडोलिनियम, टेर्बियम, डिस्प्रोजियम, होल्मियम, एर्बियम, थूलियम, इटैर्बियम और लूटीशियम.
कहां मिलता है ये?
हमारी पृथ्वी की तीन परतें हैं: क्रस्ट, मैंटल और कोर. क्रस्ट सबसे बाहरी परत है. ये सख्त चट्टानों और खनिजों से बनी है. रेअर अर्थ इसी हिस्से में पाया जाता है. यूनाइटेड स्टेट्स जिओलॉजिकल सर्वे का अनुमान है कि हमारी दुनिया में तकरीबन 110 मिलियन मीट्रिक टन रेअर अर्थ का भंडार है. इसमें से 44 मिलियन मीट्रिक टन अकेले चीन के पास है. वही इसका सबसे बड़ा उत्पादक है.
इतना बड़ा भंडार, फिर रेअर क्यों कहते हैं
आमतौर पर ऐसा कुछ जो बहुत कम या असामान्य हो, दुर्लभ कहलाता है. रेअर अर्थ इस आशय में रेअर नहीं हैं. लेकिन, ये पृथ्वी के क्रस्ट में छोटी-छोटी मात्रा में फैले हैं. ऊपर से, ये दूसरे खनिजों के साथ मिले होते हैं. ऐसे में, कोयले की तरह एक जगह पर इनका विशाल भंडार मिलना मुश्किल है. नतीजतन, इसकी माइनिंग महंगी पड़ती है.
किन चीजों में जरूरत पड़ती है?
रेअर अर्थ या उनसे बने रेअर अर्थ मैग्नेट, जरूरत की ऐसी ढेरों चीजों के लिए चाहिए जो बड़ी जरूरी हैं. इनमें रोजमर्रा की जरूरत की चीजें भी हैं, जैसे कि आईफोन, वॉशिंग मशीन, इलेक्ट्रिक गाड़ियां.
इनकी सप्लाई ना मिले, तो क्या होगा?
काफी उन्नत उपकरण और मशीनरी में भी इनकी जरूरत है. जैसे कि मिसाइल, रेडार सिस्टम, मेडिकल उपकरण, तेल की रिफाइनिंग. इनकी उपलब्धता ना हो, तो सप्लाई चेन रुक जाएगी. मसलन, इस साल अप्रैल में जब चीन ने इनके निर्यात पर मुट्ठी बंद की, तो कई कार निर्माताओं को अपना उत्पादन रोकना पड़ा.
कब से हो रही है इनकी माइनिंग?
दिलचस्प है कि रेअर अर्थ्स को बाकी खनिजों से अलग करने और उनसे अशुद्धियां-मिलावट दूर करने की प्रक्रिया विकसित करने में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने मदद की. ये बात है 1950 के दशक की. लेकिन, 1980 के दशक से ही चीन का इस इंडस्ट्री में दबदबा बनने लगा. इसकी कई वजहें थीं. जैसे कि कम लागत, पर्यावरण संबंधी कमजोर नियम और सरकारी मदद.
रेअर अर्थ्स की माइनिंग से पर्यावरण पर क्या असर?
रेअर अर्थ्स की प्रॉसेसिंग में अक्सर बहुत भारी रसायन इस्तेमाल होते हैं. इनसे निकला विषैला कचरा मिट्टी, पानी और आबोहवा को प्रदूषित कर सकता है. अब ज्यादा ईको-फ्रेंडली तकनीकें विकसित की जा रही हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल बहुत कम ही होता है. प्रदूषण संबंधी चिंताओं के कारण कई देशों में इस सेक्टर को विकसित करने की राह में पर्यावरण कानूनों की अड़चन आती है.
अभी बना रहेगा चीन का दबदबा
आज दुनिया में खनन के हिसाब से जितना उत्पादन होता है, उसका 60 फीसदी हिस्सा चीन में होता है. रिफाइन्ड प्रॉडक्शन और रेअर अर्थ मैग्नेट उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी लगभग 90 प्रतिशत है. वैकल्पिक सप्लाई चेन विकसित करने के लिए अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में नई परियोजनाएं चल रही हैं. लेकिन इन्हें संतोषजनक उत्पादन शुरू करने में कई साल लगेंगे. और, इस वजह से रेअर अर्थ में अभी चीन का दबदबा बरकरार रहेगा.