मुहर्रम पर प्रतिमा विसर्जन रोकने से टकराव के आसार | दुनिया | DW | 31.08.2017
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दुनिया

मुहर्रम पर प्रतिमा विसर्जन रोकने से टकराव के आसार

बीते साल मुहर्रम की वजह से दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन पर रोक के फैसले के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी सरकार को अदालत की फटकार सुननी पड़ी थी. लेकिन ममता ने इस साल भी मुहर्रम के चलते विसर्जन पर पाबंदी लगी दी है.

उन्होंने कहा है कि विजयादशमी के दिन शाम छह बजे के बाद कोई प्रतिमा विसर्जित नहीं होगी. अगले दिन यानी एक अक्तूबर को मुहर्रम है. सरकार के इस फैसले पर विवाद शुरू हो गया है. बीजेपी ने इसके खिलाफ अदालत में जाने की धमकी दी है. लेकिन ममता अपने फैसले पर अड़ी है.

दूसरी ओर, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) भी राज्य में अपने पांव मजबूत करने की कवायद शुरू कर रहा है. बीते साल की तरह उसने अबकी भी पूजा के दौरान शस्त्र पूजा आयोजित करने का फैसला किया है. उधर, बजरंग दल इसी दौरान त्रिशूल दीक्षा आयोजित करेगा. इससे यहां सांप्रदायिक तनाव बढ़ने का अंदेशा है. बीते साल भी पूजा और मुहर्रम के दौरान राज्य के कई इलाकों में सांप्रयादिक हिंसा की घटनाएं हुई थीं.

फैसले का विरोध

बीजेपी ने मुख्यमंत्री के प्रतिमा विसर्जन पर रोक के फैसले की आलोचना करते हुए इसे तुष्टिकरण की नीति करार दिया है. सोशल मीडिया पर भी ममता के इस फैसले की आलोचना हो रही है. सरकार ने बीते साल भी ऐसी ही पाबंदी लगायी थी. लेकिन कलकत्ता हाईकोर्ट ने इसके विरोध में दायर जनहित याचिकाओं के आधार पर पाबंदी तो खारिज कर ही दी थी, सरकार को भी खरी-खोटी सुनाई थी. हाईकोर्ट ने सरकार के फैसले को एकतरफा और अल्पसंख्यक तबके के तुष्टिकरण का प्रयास बताते हुए सरकार को फटकार लगायी थी.

न्यायमूर्ति दीपंकर दत्त वाली एक-सदस्यीय पीठ ने छह अक्तूबर, 2016 को अपने फैसले में कहा था कि एक समुदाय को दूसरे के मुकाबले खड़ा करने वाला ऐसा कोई भी फैसला नहीं लिया जाना चाहिए. अदालत ने धर्म और राजनीति के घालमेल की प्रवृत्ति को खतरनाक करार दिया था.

इसके बावजूद अबकी भी पूजा आयोजकों के साथ यहां एक बैठक में मुख्यमंत्री ने मुहर्रम के जुलूस को ध्यान में रखते हुए विसर्जन पर पाबंदी लगा दी है. इस बीच, भाजपा ने सरकार के इस फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए इसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाने की चेतावनी दी है.

भाजपा के राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा कहते हैं, "हिंदुओं के त्योहारों पर पाबंदी लगा कर ममता अल्पसंख्यक तबके को खुश करने का प्रयास कर रही हैं." पार्टी के प्रदेश सचिव सायंतन बसु ने कहते हैं, "सरकार ने बीते साल भी विसर्जन की तारीख आगे बढ़ा दी थी. अदालत के आदेश के बावजूद उसने इस साल भी मुहर्रम के चलते विसर्जन पर पाबंदी लगा दी है."

Bangladesch Mamta Bannerjee in Dhaka (Getty Images/AFP/M. Uz Zaman)

ममता के फैसले का विरोध

ममता की दलील

इस साल विजयादशमी 30 सितंबर को है जबकि मुहर्रम एक अक्तूबर को. ममता ने कहा है कि विजयादशमी के दिन शाम छह बजे के बाद प्रतिमाओं का विसर्जन नहीं किया जा सकेगा. इसकी वजह यह है कि उसके बाद मुहर्रम का जुलूस निकलेगा. दोनों एक साथ होने की स्थिति में समस्याएं पैदा हो सकती हैं.

मुख्यमंत्री की दलील है कि प्रतिमा का विसर्जन तो चार दिनों तक चलेगा. लेकिन अगर एक दिन अल्पसंख्क तबके को मुहर्रम के लिए छोड़ दिया जाए तो इसमें नुकसान ही क्या है? उनका कहना है कि सांप्रदायिक सद्भाव कायम रखने के लिए उन्होंने यह फैसला किया है.

बीजेपी के विरोध पर ममता ने उसे दंगे भड़काने का प्रयास करने वाली पार्टी करार दिया है. उनका आरोप है कि पार्टी राम-रहीम के नाम पर बंगाल में हमेशा दंगे फैलाने का प्रयास करती रही है. वह कहती हैं, "बंगाल में धार्मिक आधार पर विभाजन या दो तबके के बीच सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिशों से कड़ाई से निपटा जाएगा."

संघ की बढ़ती सक्रियता

इस बीच, अगले लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए आरएसएस भी सक्रिय हो गया है. संघ प्रमुख मोहन भागवत अक्तूबर में दुर्गापूजा के ठीक बाद एक दिन के लिए यहां आएंगे. इसके बाद वह दिसंबर में राज्य के पांच दिन के दौरे पर आएंगे. यह भागवत का अब तक का सबसे लंबा दौरा होगा. आरएसएस सूत्रों ने बताया कि उस दौरान राज्य में संघ के प्रमुख पदाधिकारियों के लिए एक प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया जाएगा. भागवत के उस दौरे के दौरान ही संघ राज्य में आगामी लोकसभा चुनावों की रणनीति को अंतिम रूप देगा. उसके बाद अगले साल जनवरी में संघ के एक वरिष्ठ नेता भैयाजी जौशी उत्तर बंगाल के कई जिलों का दौरा करेंगे.

बीजेपी ने अगले लोकसभा चुनावों में जिन राज्यों पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया है उनमें बंगाल भी शामिल है. पार्टी प्रमुख अमित शाह ने तो राज्य की 42 लोकसभा लोकसभा सीटों में से 22 पर जीत की मंशा जतायी है. फिलहाल यहां उसके महज दो सांसद हैं.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि अगले चुनावों को ध्यान में रखते हुए बंगाल में अपनी जमीन मजबूत करने की बीजेपी और संघ की कवायद से यहां सत्तारुढ़ पार्टी के साथ उसका टकरवा बढ़ना तय है. अब सरकार इस टकराव से कैसे निपटती है और बीजेपी व संघ परिवार इस मामले को अपने सियासी हित में कैसे भुनाता है, राजनीतिक पर्यवेक्षकों की निगाहें इसी पर टिकी हैं.

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